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ऐसी क्या मजबूरी की मासूम को छोड़ गई मां, सामने आई तो पल्लू से लिपटकर रोया लाल

Mohammed Iliyas

Publish: Sep 20, 2019 13:10 PM | Updated: Sep 20, 2019 13:10 PM

Udaipur

ऐसी क्या मजबूरी की मासूम को छोड़ गई मां, सामने आई तो पल्लू से लिपटकर रोया लाल

मोहम्मद इलियास/उदयपुर
चार साल के बाद मिली मां के पल्लू से वह ऐसा लिपटा कि वहां मौजूद हर शख्स की आंख नम हो गई। मां मासूम को पिता का साया सिर उठने के बाद उसकी दो बहनों को थमाकर किसी अन्य के साथ चली गई। पालनहारों ने भी कुछ दिनों के बाद उसे बालश्रम की भट्टी में झोंक दिया, जहां प्रताडऩा झेलने एवं दर-दर की ठोकरे खाने के बाद वह कई अनाथ आश्रमों में पलता रहा लेकिन उसके जहन से मां की याद कभी नहीं निकल पाई। अनाथाश्रमों में प्यार-दुलार के बीच भी वह मां को यादकर सुबकता रहा। मां को ढूंढऩे के लिए वह कई आश्रमों से भी भाग गया। चार वर्ष के बाद जब मां सामने आई तो एकाएक वह लिपट पड़ा। मां भी उसे देखकर रोई लेकिन मजबूरी के चलते अगले ही पल वह कुछ समय मांगकर चली गई। मंगलवार को जब वह लौटी तो पूरे साहस के साथ शपथ पत्र व आवेदन देकर अपने लाल हो साथ ले गई। बाल कल्याण समिति की अध्यक्ष डॉ.प्रीति जैन, सदस्य राजकुमारी भार्गव व सुशील दशोरा ने करण (बदला हुआ नाम) को उसकी मां के सुपुर्द किया।

सिटी रेलवे स्टेशन पर मिला था लावारिस
करण 21 जनवरी 2015 को आठ साल की उम्र में सिटी स्टेशन रोड पर लावारिस हालत में मिला। बाल कल्याण समिति से उसे आसरा विकास संस्थान के ओपन शेल्टर भिजवाया गया। एक वर्ष वहां रहने के बाद उसे राजकीय किशोर गृह में भेजा गया लेकिन दो दिन के बाद ही वह ओपन शेल्टर में लौट आया। बाद में समिति ने उसे जीवन ज्योति निराश्रित बालगृह में भिजवाया, जहां से वह दिसम्बर 2016 में भाग निकला। इधर-उधर घूमने के बाद खुद ही वह पुन: आसरा संस्थान में पहुंच गया। समिति के आदेश पर उसे वहीं रखा गया लेकिन जुलाई 2017 में यह विद्यालय से अपनी मां को ढूंढऩे निकल गया। कुछ दिनों बाद बस स्टैण्ड पर लावारिस मिलने पर समिति ने उसे जनभारती निराश्रित गृह कानपुर में रखवाया। 30 मई को बच्चे को वापस आसरा संस्थान भेजा गया।

संस्थान ने ढूंढा मां को
आसरा संस्थान के संस्थापक भोजराज पदमपुरा ने बताया कि करण के बार-बार मां के बारे में पूछने पर संस्थान ने उसके ननिहाल का पता लगाते हुए मां को बाड़मेर में ढूंढ़ निकाला। परिजनों ने बताया कि पति की मौत के बाद करण व उसकी छोटी दो बहनों को छोडकऱ उसकी मां बाड़मेर में एक ठेकेदार के नाते चली गई और उसने पीछे मुडकऱ नहीं देखा। संस्थान के सदस्यों ने सम्पर्क उसे उदयपुर लाते हुए करण से मिलवाया। दोनों मां-बेटे फूटकर रोने लगे।

बहुत ही विडम्बना है कि परिजन अपने बच्चे को छोडकऱ चले जाते है। इस केस में बच्चे का जीवन प्रभावित हुआ। चाहकर भी मां उसे अपना नहीं पा रही है। इस केस में मां ने आवेदन के साथ ही साथ रखने का शपथ पत्र दिया था, जिसके चलते उसे बच्चा सुपुर्द किया गया।
डॉ.प्रीति जैन, बाल कल्याण समिति अध्यक्ष