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जमीनों की 'कुण्डली' पर कुण्डली मार बैठा राजस्व विभाग

Jitendra Paliwal

Publish: Dec 07, 2019 22:42 PM | Updated: Dec 07, 2019 22:42 PM

Udaipur

आबादी, बिलानाम भूमि ग्राम पंचायतों के नाम दर्ज करने के सरकार बार-बार दे रही आदेश, पटवारी से लेकर कलक्टर तक नहीं कर रहे पालना, दशकों से काबिज लोग नियमितीकरण के लिए भटक रहे

जितेन्द्र पालीवाल @ उदयपुर. जमीनों का रिकॉर्ड भू-राजस्व विभाग के मनमाने कर्मचारी-अधिकारियों के लिए लगता है सोने की मुर्गी बना हुआ है। राज्य सरकार बार-बार आबादी और बिलानाम भूमि ग्राम पंचायतों के नाम करने के आदेश दे रही है, लेकिन राजस्व अधिकारी नामांतरण खुलवा नहीं रहे हैं। ऐसे में बड़े पैमाने पर पटवारियों की मनमानी रिपोर्टों के आधार पर फर्जी पट्टे भी जारी किए जा रहे हैं। दूसरी तरफ अकेले उदयपुर-राजसमंद जिले में तकरीबन सात हजार से ज्यादा लोगों को नियमानुसार पट्टे जारी नहीं किए जा रहे हैं।
राजस्व विभाग के उप शासन सचिव कमलेश आबुसरिया ने गत 28 नवम्बर को एक आदेश जारी कर बताया कि कई गांवों की आबादी भूमि राज्य सरकार के नाम दर्ज है। ग्रामीण इलाकों में आबादी भूमि का विकास व रखरखाव ग्राम पंचायतों द्वारा किया जाता है। ऐसे में राजस्थान भू-राजस्व अधिनियम 1956 की धारा 102 'कÓ में प्रदत्त अधिकारियों का प्रयोग करते हुए ऐसी सभी जमीनों, जो आबादी के रूप में दर्ज हैं, जिन पर मौके पर आबादी बसी हुई है व राज्य सरकार के नाम दर्ज है, जमाबंदी की खाता संख्या एक में दर्ज है या बिलानाम दर्ज है, उन्हें आबादी के प्रयोजनार्थ ग्राम पंचायत के अधीन किया जाए। आबादी भूमि के नक्शा ट्रेस, खसरा नम्बर होने से पंचायतों को सीमाज्ञान हो सकेगा। पालना में सम्बंधित तहसीलदारों को ऐसी भूमियों का कब्जा सम्बंधित ग्राम पंचायत को सम्भलवाकर नामांतरण स्वीकृति कार्यवाही सुनिश्चित करने के निर्देश तमाम जिला कलक्टरों को दिए हैं।
मालिकाना हक पंचायतों को
वर्तमान में राजस्व रिकॉर्ड में गांवों में शेष आबादी, बिलानाम आबादी, बिलानाम गैरकाबिल काश्त आबादी किस्म की भूमियां राज्य सरकार के खाते में हैं। हरेक पंचायत में नया खाता खोलकर ऐसी जमीनों का वास्तविक मालिकाना हक पंचायतों को देने की सरकार की मंशा है, ताकि भविष्य में आवेदकों को भूखण्ड आवंटन, पट्टा आवंटन जैसी कार्यवाहियां पंचायत खुद कर सकें। खाता संख्या एक की जमीनें राज्य सरकार के हक में होने से पंचायतों को सीधे यह अधिकार नहीं है। नामांतरण पंचायतों के नाम होने से आराजी नम्बर के हिसाब से भूखण्ड आवंटन, पट्टा आवंटन व एनओसी के लिए टाइटल क्लियर हो जाएंगे।
पंचायती राज विभाग का आरोप
पंचायती राज विभाग में काम कर रहे अधिकारी-कर्मचारियों का कहना है कि कई जगह पटवारी हर बार-अलग-अलग रिपोर्टें दे देते हैं। कभी पट्टा बनाने योग्य जमीन बताते हैं, कभी अयोग्य बता देते हैं। नए रिकॉर्ड तैयार कर वास्तविक स्थिति बताने की राजस्व विभाग की मंशा ही नहीं है। पंचायतें किन जमीनों की मालिक है, यह खुद उन्हें नहीं पता।
राजस्व विभाग यह कह रहा
दूसरी ओर राजस्व विभाग के जमीनी स्तर के कार्मिक-अधिकारियों का कहना है कि पंचायतों के पास जमीनों का हिसाब-किताब जाने से भ्रष्टाचार बढऩे का खतरा रहेगा। पट्टे व भूखण्ड आवंटन में अनियमितताओं के मामले बेतहाशा बढ़ जाएंगे।
यह थी सरकार की मंशा
2016 से पूर्व सालों से जमीन पर काबिज लोगों (नल-बिजली कनेक्शन हो चुके) को सेट अपार्ट करना था। ऐसे मामलों के नामांतरण नहीं खोले जा रहे हैं। अकेले राजसमंद जिले के राजसमंद ब्लॉक में तीन साल में केवल दो नामांतरण खुले, जबकि पूरे जिले में करीब दो हजार सेट अपार्ट हुए हैं। पहले ऐसी भूमि आबादी में दर्ज करके पंचायत के नाम खाता खोलना था, बाद में पंचायत डीएलसी दर से शुल्क वसूलकर कब्जेधारी के नाम करने का प्रावधान है।
कतिपय पटवारी खेल रहे यह खेल
सूत्रों ने बताया कि सेट अपार्ट के आदेश होने के बाद आबादी भूमि की डीएलसी दर ज्यादा ज्यादा होने का डर दिखाकर मिलीभगत के जरिये कतिपय पटवारी गलत रिपोर्ट पेश कर देते हैं। रिपोर्ट के आधार पर पंचायतें दर्जनों फर्जी पट्टे जारी कर चुकी है। कई मामले पुलिस और अदालतों में चल रहे हैं।

एक मंशा, कई आदेश
- एक जुलाई, 2011 : जरूरत के अनुसार आबादी भूमि का नामांतरण राज्य सरकार से पंचायतों को किया जाए।
- 5 अप्रेल, 2017 : पंचायती राज विभाग ने कलक्टरों को जारी पट़्टा-भूखण्ड आवंटन अभियान के आदेश में मार्गदर्शन दिया।
10 अगस्त, 2019 : पटवारी-तहसीलदारों को आबादी का सीमाज्ञान पंचायतों को करवाने के निर्देश।
21 अगस्त, 2019 : ग्राम पंचायतों की आबादी भूमि का इन्द्राज ग्राम पंचायतों के नाम करवाएं।

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