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भारत का संविधान श्रेष्ठता और प्रगति का प्रतीक- जस्टिस माथुर

Jitendra Paliwal

Publish: Dec 14, 2019 22:35 PM | Updated: Dec 14, 2019 22:35 PM

Udaipur

इलाहाबाद हाइकोर्ट के मुख्य न्यायाधीश ने विधि छात्रों को दिए विधि क्षेत्र में आगे बढऩे के टिप्स, सुखाडिय़ा सभागार में लॉ जर्नल ऑफ मोहनलाल सुखाडिय़ा यूनिवर्सिटी का विमोचन, नए लॉ कॉलेज भवन का शिलान्यास

जितेन्द्र पालीवाल @ उदयपुर. इलाहाबाद हाइकोर्ट के मुख्य न्यायाधीश जस्टिस गोविन्द माथुर ने कहा कि दुनिया में, खासकर एशिया में भारत के संविधान के जैसा स्थायित्व किसी देश के कानून में नहीं है। भारत और पाकिस्तान एक दिन के अंतराल में ही आजाद हुए, लेकिन वहां की संविधान निर्मात्री सभा अपेक्षित संविधान नहीं दे सकी और 1947 के कुछ वर्षों बाद 1958 में ही मार्शल लॉ लग गया। चार सैन्य शासकों ने देश पर राज किया। वहां लोकतंत्र के ऊपर भी सैन्य शासन हावी है। हमारे भारत में ऐसा नहीं होता।
जस्टिस माथुर ने शनिवार को मोहनलाल सुखाडिय़ा विश्वविद्यालय के सभागार में 'न्यायिक प्रवर्तन के द्वारा राज्य नीति के सामाजिक आर्थिक अधिकार दिलाने में नीति निर्देशक तत्वों की महत्ताÓ विषयक व्याख्यान में कहा कि हमारे यहां एक थलसेना अध्यक्ष सरकार में मंत्री बन सकते हैं, उनके अधीनस्थ रहे व्यक्ति उनके सहायक बनकर मंत्रिमण्डल में काम कर सकते हैं। पाकिस्तान में हर जनरल राष्ट्राध्यक्ष बनना चाहता है। यही हमारे लोकतंत्र का अंतर और खूबसूरती है। पश्चिम में तो एक तरह से संविधान की रवायत ही नहीं है। भारत का संविधान श्रेष्ठता और प्रगति का प्रतीक है।
- राज्य धर्मनिरपेक्ष, लेकिन व्यक्ति को धार्मिक स्वतंत्रता
संविधान में स्टेट सेक्युलर है, लेकिन व्यक्ति स्वतंत्र है कि उसका धर्म, पूजा पद्धति और मान्यताएं क्या होंगी। हमारे यहां ईश निंदा का कोई कानून नहीं है। यही वे मूल्य हैं, जिनकी तुलना करने पर साफ हो जाता है कि 70 साल में हमने पड़ोसी मुल्क से बेहतर स्थिति हासिल की। विकृतियां आई होंगी, लेकिन इसका मतलब यह नहीं कि स्वस्थ प्रगति नहीं हुई। आज और आजादी के समय में रात-दिन का फर्क है।
- संविधान में वेलफेयर और फेयरवेल की अवधारणा
माथुर ने कहा कि भारतीय संविधान के शुरुआती आर्टिकल्स राज्य के कल्याण की बात करते हैं और बाद के कानून बुराइयों की विदाई (फेयरवेल) की। भारत का कानून, जिसे हम पॉलिटिकल डॉक्युमेंट कहते हैं, यह एक सामाजिक दस्तावेज भी है। उन्होंने अदालती फैसलों पर बदलती स्थिति को लेकर कहा कि न्यायिक सक्रियता की बजाय इसे न्यायिक रचनात्मकता कहना ज्यादा उचित होगा। न्याय क्षेत्र में ऐसा कोई विषय नहीं, जो समाज की प्रगति से जुड़ा न हो।
- रोज राजस्थान पत्रिका उदयपुर-जोधपुर पढ़ता हूं
जस्टिस माथुर ने कहा कि उदयपुर की झीलों में मूर्तियां, ताजिये विसर्जिन करने के निर्णय की आज पालना हो रही है। स्थितियां न्यायिक निर्णयों से बदली। देशभर में न्यायिक फैसले नहीं होते, तो मौजूदा जंगल में से आधे खत्म हो चुके होते। मैं नियमित तौर पर राजस्थान पत्रिका के उदयपुर और जोधपुर संस्करण पढ़ता हूं। पिछले दिनों उदयपुर के माछला मगरा पर खुदाई का फोटो लगा था। ऐसे मामलों में कितनी सामाजिक जागरूकता रही, यह महत्वपूर्ण है।
- तुलसीदासजी के हस्तलिखित फैसले मौजूद
मुख्य न्यायाधीश माथुर ने कहा कि तुलसीदास जी रामचरित मानस लेखन के लिए जाने जाते हैं, लेकिन वह एक न्यायाधिकारी भी थे। इलाहाबाद हाइकोर्ट के पास उनके हस्तलिखित फैसले हैं। विधि छात्र उन्हें देख सकते हैं, पढऩे की कोशिश कर सकते हैं और उन्हें छूने की अनुमति भी है। उन्होंने विद्यार्थियों से कहा कि हिन्दी बोलने में सम्मान का अनुभव होता है, लेकिन न्यायिक क्षेत्र में कार्य करने के लिए अंग्रेजी पर भी पकड़ मजबूत करें। एक अधिवक्ता और न्यायाधीश के लिए संवाद कौशल, सम्प्रेषण कला का बेहतर होना जरूरी है।
- लॉ जर्नल का विमोचन
विधि महाविद्यालय के अधिष्ठाता डॉ. आनंद पालीवाल ने बताया कि जाने-माने विधि महाविद्यालयों की श्रेणी में इस कॉलेज को लाने का प्रयास है। लॉ जर्नल इसकी एक कड़ी है। इसमें देश के अलग-अलग लॉ यूनिवर्सिटी के प्रतिष्ठित व्यक्ति के आलेख शामिल किए जाएंगे। वार्षिक लॉ जर्नल का जस्टिस माथुर, एमएलएसयू के कुलपति डॉ. एन.एस. राठौड़ ने विमोचन किया। कार्यक्रम के बाद उन्होंने कॉलेज के प्रस्तावित नए भवन का शिलान्यास किया।

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