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नहीं जागे किसानों के भाग, वर्षों से जलाशयों का नहीं हो रहा उपयोग, जानिए क्या है मामला

Amit Pandey

Publish: Oct 19, 2019 15:42 PM | Updated: Oct 19, 2019 15:42 PM

Singrauli

सुविधा से वंचित किसान.....

सिंगरौली. चितरंगी तहसील में एक लंबे-चौड़े क्षेत्र के किसानों की तकदीर में खेतों के लिए पानी दिखाई नहीं पड़ता। वहां करीब डेढ़ दशक से सिंचाई के लिए बने चितरंगी जलाशय के अधीन आसपास के किसानों की यही व्यथा है। लगभग डेढ़ दशक पहले वर्ष 2006 में चितरंगी तहसील मुख्यालय के पास शासन की आेर से सिंचाई सुविधा के लिए जलाशय का निर्माण कराया गया मगर जलाशय बनने के बाद इसका उद्देश्य पूरा नहीं हुआ और इससे किसी भी खेत को कभी सिंचाई के लिए एक बूंद पानी नसीब नहीं हो पाया। इस प्रकार तत्कालीन समय में किसानों के लिए सिंचाई सुविधा देने का प्रयास विफल हो गया और जलाशय पर आई लागत व्यर्थ चली गई। इसके बाद जलाशय मेें जल संग्रह के लिए बनी फीडर नहर की दशा तो और भी बिगड़ गई।

बताया गया कि शासन के निर्देश पर वर्ष 2006 में जल संसाधन विभाग की ओर से सिंचाई व्यवस्था के लिए तहसील मुख्यालय चितरंगी में जलाशय का निर्माण कराया गया। इस कच्चे जलाशय के निर्माण पर तत्कालीन समय में लगभग सवा लाख रुपए लागत आई। बताया गया कि इसका निर्माण लगभग एक वर्ष पहले पूरा हुआ। डिजाइन के समय इस जलाशय से आसपास के 80 हेक्टेयर क्षेत्र में सिंचाई सुविधा देना तय किया गया। इसके साथ ही वर्षा के दौरान निकट के पहाड़ी क्षेत्र से जलाशय तक पानी पहुंचाने के लिए फीडर नहर का निर्माण भी कराया गया। मगर दुर्भाग्य से यह प्रयास विफल हो गया और जलाशय अपना मकसद पूरा नहीं कर पाया।

बताया गया कि निर्माण के बाद तल में कोई कमी छूट गई। इस कारण जलाशय में संकलित जल का जमीन में ही रिसाव हो गया और कुछ ही दिन में जलाशय फिर खाली हो गया। हर मानसून में इस जलाशय की यही हालत है। इस प्रकार जलाशय में वर्षा काल में पानी संग्रह तो होता है मगर तल में कमी के कारण सारा पानी कुछ दिन में ही जमीन में सजा जाता है और जलाशय सूखने की हालत बनी हुई है।

इस प्रकार निर्माण के बाद एक बार भी इस जलाशय से आसपास के किसानों को सिंचाई के लिए पानी नहीं मिल सका। इसके चलते जलाशय अनुपयोगी और नाकारा हो गया और उस पर आई लागत भी व्यर्थ चली गई। जल संसाधन विभाग के स्थानीय सूत्र बताते हैं कि दो वर्ष पहले रीवा से आई विभाग की तकनीकी टीम ने जलाशय का मौका देखा तथा उसके तल का कुछ अध्ययन किया। इस टीम की ओर से बाद में अधीक्षण अभियंता कार्यालय को रिपोर्ट दी गई मगर उसके बाद कुछ नहीं हुआ।

नहर का बिगड़ा स्वरूप
जलाशय का उपयोग नहीं हो पाया तो इसकी फीडर नहर भी खतरे में आ गई। बताया गया कि उपयोग नहीं होने के चलते ही वर्ष 2010 के बाद जलाशय की फीडर नहर पर अतिक्रमण होने लगे और कुछ वर्ष में ही नहर किनारे और कहीं-कहीं तो नहर की धार में ही अवैध झौंपड़े या कच्चे मकान तक बन गए। हालत यह है कि आज कुछ जगह तो नहर का अस्तित्व ही नहीं बचा। इसके साथ ही जलाशय तक जल पहुंचाने की प्रणाली भी भंग हो गई और अब इसके दुरुस्त होने की आस नहीं बची। इससे लगभग 80 हेक्टेयर क्षेत्रफल को हरा-भरा बनाने का एक सपना दम तोड़ गया। इस संबंध में पक्ष जानने के लिए जल संसाधन विभाग के कार्यपालन यंत्री से कई बार प्रयास के बाद भी संपर्क नहीं हो सका।