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'चल रे कांवड़िया शिव के धाम' उद्घोष के साथ लाखों कांवड़िए पहुंच रहे पांडव कालीन विभूतिनाथ मंदिर

Abhishek Gupta

Publish: Sep 01, 2019 19:47 PM | Updated: Sep 01, 2019 19:47 PM

Shravasti

कांवड़ शिव की आराधना का ही एक रूप है। इस यात्रा के जरिए जो शिव की आराधना कर लेता है, वह धन्य हो जाता है।

श्रावस्ती. कांवड़ शिव की आराधना का ही एक रूप है। इस यात्रा के जरिए जो शिव की आराधना कर लेता है, वह धन्य हो जाता है। कांवड़ का अर्थ है परात्पर शिव के साथ विहार। अर्थात ब्रह्म यानी परात्पर शिव, जो उनमें रमन करे वह कांवरिया।

‘कस्य आवरः कावरः 'अर्थात परमात्मा का सर्वश्रेष्ठ वरदान। एक अन्य मीमांसा के अनुसार 'क' का अर्थ जीव और 'अ' का अर्थ विष्णु है, वर अर्थात जीव और सगुण परमात्मा का उत्तम धाम। इसी तरह 'कां' का अर्थ जल माना गया है और आवर का अर्थ उसकी व्यवस्था। जलपूर्ण घटों को व्यवस्थित करके विश्वात्मा शिव को अर्पित कर परमात्मा की व्यवस्था का स्मरण किया जाता है। 'क' का अर्थ सिर भी है, जो सारे अंगों में प्रधान है, वैसे ही शिव के लिए कांवड़ का महत्व है जिससे ज्ञान की श्रेष्ठता का प्रतिपादन होता है। 'क' का अर्थ समीप और आवर का अर्थ सम्यक रूप से धारण करना भी है। जैसे वायु सबको सुख, आनंद देती हुई परम पावन बना देती है वैसे ही साधक अपने वातावरण को पावन बनाए।

इन तमाम अर्थों के साथ कांवड़ यात्रा का उल्लेख एक रूपक के तौर पर भी करते हैं। गंगा शिव की जटाओं से निकली है। उसका मूल स्रोत विष्णु के पैर है। भगीरथ के तप से प्रसन्न होकर विष्णु ने गंगा से जब पृथ्वी पर जाने के लिए कहा तो वह अपने इष्ट के पैर छूती हुई स्वर्ग से पृथ्वी की ओर चली। वहां उसके वेग को धारण करने के लिए शिव ने अपनी जटाएं खोल दी और गंगा को अपने सिर पर धारण किया।
वहां से गंगा सगरपुत्रों का उद्धार करने के लिए बहने लगी। कांवड़ यात्रा के दौरान साधक या यात्री वही गंगाजल लेकर अभीष्ट शिवालय तक जाते हैं और शिवलिंग का अभिषेक करते हैं। शिवमहिम्न स्तोत्र के रचयिता आचार्य पुष्पदंत के अनुसार यह यात्रा गंगा का शिव के माध्यम से प्रत्यावर्तन है- अभीष्ट मनोरथ पूरा होने के बाद उस अनुग्रह को सादर श्रद्धा पूर्वक वापस करना। कांवर से गंगाजल ले जाने और अभिषेक द्वारा शिव को सौंपने का अनुष्ठान शिव और गंगा की समवेत आराधना भी है।

श्रावस्ती जिले के तमाम हिस्सों से लोग उमस भरी गर्मी के बीच सीने में आस्था और विश्वास की अग्नि जलाए कांवड़िए पांडवकालीन विभूतिनाथ मंदिर की ओर जा रहे हैं। कजरी तीज पर्व पर पूरा जिला धर्म, आस्था-विश्वास और संस्कृति का महापर्व बन जाता है। श्रावस्ती के हर कंकड़ में शिव विद्यमान हैं। मान्यता वैसे तो बहुत पुरानी है पर इसका जीवंत रूप यहां कजरी तीज में दिखाई पड़ता है। मुख्यालय भिनगा से विभूतिनाथ मंदिर तक लगभग 35 किमी का पूरा रास्ता शिवमय बन गया है। शिव की महिमा जानने वाले भक्त विभूतिनाथ धाम पर जल चढ़ाने के लिए जाते हैं। बोल बम की गगन भेदी गूंज से माहौल भक्तिमय बन जाता है। लाखों कांवड़िए गंगा जल लेकर चल रे कांवड़िया शिव के धाम उद्घोष से वातावरण को गुंजायमान रखते हैं। बच्चों, महिलाओं से लेकर बुजुर्गो तक का उत्साह देखते ही बनता है। जगह-जगह पंडाल लगा कर कांवड़ियों व श्रद्धालुओं को शिव भक्त प्रसाद का वितरण भी करते रहते है।

पांडवकालीन विभूतिनाथ मंदिर पर कजरी तीज के त्यौहार पर लाखों श्रद्धालू पहुंचते हैं। वहीं लाखों श्रद्धालुओं व कांवड़ियों की सुरक्षा के लिए प्रशासन ने भी कमर कस रखी है। प्रशासन ने चिल्हरिया से विभूतिनाथ मंदिर पर पहुंचने के मार्ग पर 15 बैरियर लगाए गए हैं। वहीं वाहनों के लिए 5 स्थानों पर पार्किंग व्यवस्था की गई है। साथ ही मेला परिक्षेत्र को 13 सेक्टरों में बांटा गया है।

पीडब्ल्यूडी विभाग की अनदेखी के चलते जलभराव से गुजर रहे कांवड़िए -

कांवड़ लेकर विभूतिनाथ मंदिर जा रहे हजारों कांवड़ियों को भिनगा मुख्यालय के खैरी मोड़ के पास जलभराव से होकर गुजरना पड़ रहा है। दरअसल बीते तीन चार महीने से भिनगा के खैरी मोड़ के पास जलभराव के कारण कुछ दूर तक सड़क कट गई थी। जहां से गुजरने वाले लोगो को काफी परेशानियों का सामना करना पड़ रहा है। कई साइकिल और मोटरसाइकिल सवार लोग इस गढ्ढे में गिर भी चुके हैं। मगर विभाग द्वारा कोई ठोस कदम नही उठाया गया। यही नही कजरी तीज पर कांवड़िए इसी जलभराव वाले गढ्ढे युक्त सड़क से पैदल कांवड़ लेकर गुजर रहे हैं। बावजूद इसके विभाग ने इसके लिए केवल खाना पूर्ति की। जिसकी वजह से हजारों कांवड़िए उसी जलभराव वाले रास्ते से होते हुए कांवड़ लेकर विभूतिनाथ मंदिर जा रहे हैं।