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Up Travel Guide : देवभूमि जहां गौतम बुद्ध ने बिताये थे 24 साल, जैनियों और हिंदुओं का भी है पवित्र स्थान

Hariom Dwivedi

Publish: Oct 22, 2019 18:34 PM | Updated: Oct 22, 2019 18:34 PM

Shravasti

लवकुश की राजधानी थी पवित्र भूमि श्रावस्ती

श्रावस्ती. राप्ती नदी के तट पर बसी श्रावस्ती का ऐतिहासिकता के साथ ही पौराणिक महत्व भी है। भगवान बुद्ध ने यहीं से दुनिया को शांति का संदेश दिया था। यहीं पर महावीर स्वामी के चार कल्याणक हुए। भगवान राम के पुत्र लवकुश ने श्रावस्ती को ही अपनी राजधानी बनाया था और सालों-साल तक निष्कंटक राज्य किया। रामायण में श्रावास्ती का वर्णन करते हुए लिखा है, 'श्रावस्तीति पुरी रम्या श्रावीता च लवस्य च।' वायु पुराण में कहा गया है, 'उत्तर कोसले राज्ये लवस्य च महात्मन:, श्रावस्ती लोक विख्याता कुशवंश निबोधत:।

श्रावस्ती में ही भगवान बुद्ध ने अपने जीवन काल के सर्वाधिक 24 वर्षावास श्रावस्ती में बिताए और यहीं से दुनिया को सत्य, अहिंसा व शांति का संदेश दिया। जैन धर्म के प्रवर्तक महावीर स्वामी को भी चार कल्याणक भी यहीं हुआ था। मर्यादा पुरुषोत्तम श्रीराम के पुत्र लव की राजधानी भी श्रावस्ती थी। इसका जिक्र रामायण के उत्तर कांड में है। श्रावस्ती से चंद दूरी पर स्थित इकौना के सीताद्वार को लव व कुश की जन्मस्थली भी माना जाता है, जहां स्थित माता जानकी मंदिर व वाल्मीकि आश्रम तथा सीताद्वार झील ऐतिहासिकता को प्रमाणित करती है। वेदव्यास द्वारा रचित महाभारत के अलावा हरिवंश पुराण और मत्यस्य पुराण में श्रावस्ती का जिक्र है। भगवान बुद्ध ने यहीं पर अंगुलिमाल जैसे दुर्दांत डाकू को बौद्ध धर्म की दीक्षा दी थी। यहां अंगुलिमाल का स्तूप विशेष आकर्षण का केंद्र है।

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जैन धर्म के तीसरे तीर्थांकर भगवान संभवनाथ व आठवें तीर्थांकर भगवान चंद्रप्रभा नाथ की जन्मस्थली भी श्रावस्ती है। जैन धर्म काल में श्रावस्ती को चंद्रपुरी व चंद्रिका पुरी के नाम से जाना जाता था। महावीर स्वामी ने भी यहां एक वर्ष बिताया था। भगवान सम्भवनाथ के गर्भ, जन्म, तप व ज्ञान कल्याणक यहीं सम्पन्न हुआ था।

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श्रावस्ती में प्रतिवर्ष हिंदुओं और जैनियों के साथ ही बौद्ध धर्म के अनुयायी बड़ी संख्या में यहां पहुंचते हैं और विश्व शांति की कामना करते हैं। भारत ही नहीं यहां श्रीलंका, म्यांमार, थाईलैंड, जापान, कोरिया, वियतनाम, वर्मा, नेपाल, कंबोडिया व भूटान सहित अन्य देशों के बौद्ध धर्मावलंबी विश्व शांति की कामना व विशेष पूजा के लिए श्रावस्ती आते हैं।

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