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बोलती तस्वीरें लेने का सात पीढ़ी से हुनरमंद है अली परिवार

Sunil Vandewar

Publish: Aug 20, 2019 12:13 PM | Updated: Aug 20, 2019 12:13 PM

Seoni

-मौजूद है ब्लैक एण्ड व्हाइट से रंगीन होती तस्वीरों में हर यादगार पल

सिवनी. आधुनिक तकनीक ने भले ही हर हाथ में मोबाइल और साथ में कैमरा दे दिया है, लेकिन फोटोग्राफी का हुनर हर किसी के बस की बात नहीं। सात पीढ़ी से अली परिवार स्वेत-श्याम से रंगीन फोटोग्राफी तक की बोलती तस्वीरें और बदलते दौर के फोटो-वीडियो कैमरों का हुनरमंद है। अब से करीब सवा सौ साल पहले सैयद सैफ अली से शुरु सिवनी में शुरु हुआ फोटोग्राफी का ये सफर सातवीं पीढ़ी में सैफ अली तक चल रहा है।
जिले ने बीते सौ सालों में आजादी से लेकर प्रदेश के गठन, संसदीय सीट मिलना और छिनना, संभाग बनना और कई तरह के दौर देखे हैं। जिले के इन सौ सालों का इतिहास शहर के अली परिवार के पास तस्वीरों की शक्ल में अबतक जिंदा है। इन तस्वीरों में कहीं आजादी की अलख जगाने आए गांधी हैं तो कहीं लौह महिला इंदिरा गांधी...। कैमरे की आंखों के जरिए सिवनी के अली परिवार ने बीती सदी के हर खास पल को कैद किया है।
19१३ से जारी है फोटोग्राफी
सिवनी के दादू धर्मशाला के पास अमरदीप फोटो स्टूडियो है। बाहर से देखने से सामान्य सी ही दुकान लगती है लेकिन भीतर जाते ही सिवनी के इतिहास से जुड़े कई पहलू नजर आने लगते हैं। स्टूडियो में लगी तस्वीरों में कहीं गांधी दिखते हैं तो कहीं इंदिरा गांधी दहाड़ती नजर आती हैं। कहीं स्वामी स्वरुपानंद सरस्वती नजर आते हैं तो कहीं टुरिया का आदिवासी सत्याग्रह। स्टूडियो संचालक ६४ साल की उम्र और ५२ साल के फोटोग्राफी के अनुभवी अबरार अली बताते हैं कि ये सारी तस्वीरें उनके पास रखे पुराने कैमरों से दादा-परदादा के हाथों खींची गई हैं।
हर दौर के कैमरों का संग्रह -
स्टूडियो में साल 19१३ से अबतक के अधिकतर कैमरे देखने मिल जाएंगे। उनके पास फ्रेंच ब्लो कैमरा, लाइका कंपनी का एम सीरीज, रोलि फ्लैक्स टीएलआर, कैनन, जैसे कैमरे हैं। इसके अलावा वी मीनिट कैमरा भी है। आज की डिजीटल दुनिया के लिहाज से यह कैमरा आकार में काफी बड़ा होता था। इस कैमरे में बड़े आकार की तस्वीरें उतारी जाती थीं। कैमरे को बाहर पार्क जैसी जगहों में ले जाकर तस्वीरें उतारी जाती थीं। उनके पास मौजूद अधिकतर कैमरों में तस्वीरें कैसे उतारी जाती थीं,इसे समझाने के लिए निगेटिव और कांच की प्लेटें भी मौजूद हैं।
यह है सातवीं पीढ़ी
इस दुकान की शुरुआत साल 19१३ में नागपुर से आए दादा सैय्यद सैफ अली ने की थी। उनके बाद कामकाज दादा सैफ अली, नाना सुजात अली ने संभाला। मामा जफर, पिता सगीर अली से होते हुए अब अबरार अली स्टूडियो को संभाल रहे हैं। इससे आगे सातवीं पीढ़ी में अबरार अली अपने बेटे सैफ अली को भी फोटोग्राफी के हुनर की बारीकियां सिखा रहे हैं। बेटे की शानदार फोटोग्राफी से अबरार अली भी बहुत खुश हैं।
मौजूद है हर इतिहास -
अबरार अली के पास आजादी के पहले के काले-सफेद रंग के दौर से वर्तमान रंगीन फोटोग्राफी के दौर की हर याद मौजूद है। 20 मार्च 1921 को जब गांधीजी पहली बार महाकौशल क्षेत्र की यात्रा में आए थे तबकी उनकी तस्वीर अबतक अबरार अली के पास सुरक्षित है। भारत में आजादी के आंदोलन ने 1940 के आसपास जोर पकड़ा लेकिन उससे पहले 1930 में जिले के टुरिया में आदिवासी सत्याग्रह हो चुका था। भारत को जब आजादी मिली तब पहला तिरंगा शुक्रवारी चौक में फहराया गया था। शुक्रवारी से जयस्तंभ तक की प्रभातफेरी की तस्वीर उनके पास है। कई लम्हे, कुछ अच्छे, कुछ बुरे सभी उनके पास हैं। कई तस्वीरें कई संग्रहालयों में रखी हैं तो कई फोटोग्राफ किताबों में भी प्रकाशित हुए हैं।
कर रहे डिजीटलीकरण -
अपने पास रखे इस अमूल्य खजाने को ६४ वर्षीय अबरार अली का बेटा सैफ और फैज कंप्यूटर में सुरक्षित कर रहे हैं, ताकि वक्त की धूल में इनका रंग न उड़े। अबरार अली बताते हैं कि उनके कैमरों को कई लोगों ने खरीदने के लिए हजारों रुपए की पेशकश कर चुके हैं, लेकिन अबतक उन्होंने हर ऑफर को ठुकरा दिया है। पीढिय़ों के हुनर और बोलती तस्वीरें अबरार अली और उनके परिवार के लिए पुरखों की धरोहर हैं।