स्लो इंटरनेट स्पीड होने पर आपको पत्रिका लाइट में शिफ्ट कर दिया गया है ।
नॉर्मल साइट पर जाने के लिए क्लिक करें ।

'हिम्मत और साहस की दम पर समाज में लिखी सफलता की इबारतÓ

Kuldeep Saraswat

Publish: Jan 12, 2020 12:01 PM | Updated: Jan 12, 2020 16:29 PM

Sehore

युवा दिवस पर विशेष: विसम परिस्थितियों में भी तय किए रास्ते, पहुंचे मुकाम पर

सीहोर. स्वामी विवेकानंद की जयंती पर रविवार को सामूहिक सर्य नमस्कार का आयोजन होगा। जिला मुख्यालय पर सूर्य नमस्कार का मुख्य आयोजन टाउन हॉल में सुबह 8.30 बजे से होग, जिला प्रशासन ने तैयारियां कर ली हैं। सरकारी और निजी स्कूलों में छात्र-छात्रओं को सूर्य नमस्कार का अभ्यास कराया जा रहा है। स्वामी विवेकानंद की जयंती युवा दिवस के रूप में मनाई जाती है और युवा दिवस पर पत्रिका ने शहर के कुछ ऐसे युवाओं से बात की है, जिन्होंने कड़ी मेहतन से मुकाम हासिल कर अपनी पहचान बनाई है। इन युवाओं में शिक्षक, सिविल जज, डॉक्टर, सैनिक और रंगकर्मी तक को शामिल किया है।

[MORE_ADVERTISE1]'हिम्मत और साहस की दम पर समाज में लिखी सफलता की इबारतÓ[MORE_ADVERTISE2]

प्राइवेट जॉव की दम पर बनी डॉक्टर
आष्टा सिविल अस्पताल में पदस्थ डॉ. नेहा अरोरा की कहानी संघर्ष भरी है। बैतूल के मध्यम वर्गीय परिवार से तालुक रखने वाली डॉक्टर अरोरा के पिता जयदयाल झाम बाइक से गांव-गांव किराने का सामान बेचते थे, उस समय किसी ने नहीं सोचा था कि इनकी बेटी डॉक्टर बनेगी। परिवार की आर्थिक स्थिति ज्यादा अच्छी नहीं थी, फिर भी नेहा की हिम्मत नहीं हारी। भोपाल के एक निजी अस्पताल में 6 साल तक प्राइवेट नौकरी कर रुपए जमा किए और फिर 2011 में एमबीबीएस की परीक्षा पास की और अब तीन अक्टूबर 2019 सेे सिविल अस्पताल आष्टा में पदस्थ हैं।

[MORE_ADVERTISE3]
'हिम्मत और साहस की दम पर समाज में लिखी सफलता की इबारतÓ

पांच नेशनल जीतकर बने मिस्टर एमपी
मिस्टर एमपी के अवार्ड से सम्मानित अमित बायत पांच बार नेशनल प्रतियोगिता जीतकर शहर का नाम रोशन कर चुके हैं। बॉडी बिल्डिंग के शौकीन बोयत ने खेल के क्षेत्र में मुकाम तो बना लिया है, लेकिन इसके लिए काफी मेहनत की है। बोयत का तो यहां तक कहना है कि यदि उनके दोस्त मदद नहीं करते तो वे अपनी पहचान ही नहीं बना पाते। यह खेल शौक बहुत महंगा है। बोयत भाटापारा छत्तीसगढ़, श्रीनगर जम्मू कश्मीर, हैदराबाद, बैग्लोर जैसे महानगरों में आयोजित नेशनल प्रतियोगिताओं में विजेता बने हैं। वेस्टर्न इंडिया विदिशा का अवार्ड भी अमित बोयत को ही मिला है।

'हिम्मत और साहस की दम पर समाज में लिखी सफलता की इबारतÓ

रंगमंच को बचाने की कवायद
शहर में रंगमंच और रंगकर्मी के नाम पर कुछ है तो सिर्फ अध्यापक प्रदीप नागिया। ये रंगमंच से लेकर टेली फिल्म बनाने तक का हुनर जानते हैं। नागिया की फिल्म का प्रदर्शन ओरछा में आयोजित इंडिया फिल्म महोत्सव में भी किया गया था। इनकी शार्ट फिल्म सफलता की कहानी दो अनाथ बच्चों के जीवन पर आधारित थी। नागिया रंगमंच और भोपाल दूरदर्शन में बी ग्रेड आर्टिस्ट के रूप में अपनी पहचान बना चुके हैं। यह अभी तक यक्ष के पांच प्रश्न, पत्रकार की मौत, ऐसेम्बली बम कांड, नशे की धुंध, फिर जागा विश्वास, जय जवान जय किसान नाटक में न केवल अभिनय किया है।

'हिम्मत और साहस की दम पर समाज में लिखी सफलता की इबारतÓ

दृढ़ इच्छा शक्ति से हासिल किया मुकाम
सीहोर की बेटी सृष्टि चौरसिया सिविल जज बनी हैं। साल 2019 में सृष्टि की मध्यप्रदेश में ओबीसी कोटे में 21वीं रैंक आई थी। सृष्टि इंग्लिशपुरा निवासी रमाशंकर चौरसिया की बेटी की।सृष्टि चौरसिया का सिलेक्शन से पहले का साल बहुत संघर्ष भरा रहा है। पहले तो जवान भाई की मौत का दुख झेला, उसके बाद हौंसला ऐसा टूट कि खुद तबियत खराब होने को लेकर छह महीने तक बेड पर पड़ी रही। इसके बाद भी सृष्टि ने हिम्मत नहीं हारी और वे सब कुछ भूलकर पढ़ाई में लगी रही, नतीजन वह सिविल जज बन गई।

'हिम्मत और साहस की दम पर समाज में लिखी सफलता की इबारतÓ

गरीबी से लड़ पाया मुकाम
धार के डिप्टी कलेक्टर विजय राय शहर के किसान रमेश राय के बेटे हैं। विजय जिस समय पीएससीसी की तैयारी कर रहे थे, उनके परिवार की स्थिति ज्यादा अच्छी नहीं थी। इन्होंने गरीबी से लड़कर मुकाम हासिल कर युवाओं के लिए मिसाल पेश की है। विजय ने 12वीं तक की पढ़ाई सरकारी स्कूल में की। इसके बाद जब पीएससीसी की तैयारी की तो पहली बार असफल हो गए, लेकिन हिम्मत नहीं हारी और जब दूसरी बार परीक्षा दी तो अच्छे अंक से चयन हो गया।

'हिम्मत और साहस की दम पर समाज में लिखी सफलता की इबारतÓ

पिता के साथ मजदूरी कर पूरा किया सपना
देशभक्ति का जज्बा हर युवा के मन में होता है, लेकिन मातृभूमि की सेवा करने का मौका हर किसी को नहीं मिलता है। आष्टा के बरछापुरा निवासी कृपाल बकोरिया ने भी मातृभूमि की सेवा का सपना देखा, लेकिन सपना पूरा करने के लिए 10वीं की परीक्षा उत्तीर्ण करना जरूरी थी। परिवार की आर्थिक स्थिति इतनी खराब थी कि स्कूल जाना तो दूर घर पर भी एक घंटे पढ़ाई के लिए समय नहीं मिलना था, पूरा दिन पिता के साथ मजदूरी में निकल जाता था। इसके बाद भी कृपाल सिंह ने बढ़ाई की और अप्रैल 2019 में उनका यह सपना पूरा हो गया, इस समय वे सिकंदराबाद में तैनात हैं।