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दुनिया छोडऩे के बाद भी किसान का नहीं हुआ कर्जमाफ,मजदूरी कर मिटा रहे पेट की भूख

Veerendra Shilpi

Publish: Nov 06, 2019 11:18 AM | Updated: Nov 06, 2019 11:18 AM

Sehore

पत्रिका ने मृतक किसानों की पड़ताल की तो नजारा मिला चौकाने वाला

सीहोर. जिले में कर्ज और फसल नष्ट होने से मौत को गले लगाने वाले किसानों के परिवार की आर्थिक स्थिति खराब है। उनके दुनिया छोडऩे के बाद भी न कर्ज माफ हुआ और ना ही परिवार को आर्थिक सहायता मिली है। जिससे कोई परिवार मजदूरी तो कई उधारी के रुपए से पेट की भूख मिटा रहा है। उनको अफसर, जनप्रतिनिधियों ने मदद का भरोसा तो दिया, लेकिन झूठा साबित हुआ।

जिले में साल 2015 से 2019 के बीच 12 से अधिक किसानों ने अलग-अलग कारणों से जीवनलीला समाप्त की है। इसमें सबसे ज्यादा ने यह कदम प्राकृतिक आपदा से फसल खराब और कर्ज के चलते उठाया। किसानों के जाने के बाद पत्रिका ने उनके परिवारों के बीच जाकर पड़ताल की तो नजारा चौकाने वाला मिला। पड़ताल में सामने आया कि उनके नाम पर राजनीति तो जमकर हो रही है, लेकिन वास्तविक में मदद करने कोई आज तक आगे नहीं आया।

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केस-01: चार साल से चक्कर काट रही विधवा
आष्टा के पटारिया गोयल निवासी नगीनाबाई मेवाड़ा ने पत्रिका को बताया कि उनके पास 75 डेसीमल जमीन है। पति जीवनसिंह मेवाड़ा ने खेती और परिवार चलाने बैंक ऑफ इंडिया शाखा मैना से एक लाख, सोसायटी से 40 हजार और अन्य जगह से कर्ज लिया था। जिसे नहीं चुकाने से जीवन ने 7 अक्टूबर 2015 को फांसी लगाकर आत्महत्या कर ली थी।

 

नगीना बाई का कहना है कि घटना के समय आष्टा-देवास संसदीय क्षेत्र के तत्कालीन सांसद मनोहरसिंह ऊंटवाल संत्वाना देने आएं थे। वह एक लाख रुपए और आवास योजना का लाभ देने का कहकर गए थे। तत्कालीन आष्टा विधायक रंजीतसिंह गुणवान ने 5 हजार रुपए देने की घोषणा की थी। जो आज तक पूरी नहीं हुई है। वह चार साल से दफ्तरों के चक्कर काट रही है, लेकिन मायूसी मिली। यहां तक की आवास योजना का लाभ नहीं मिलने से कच्चे मकान में दिन काट रही है। आर्थिक स्थिति खराब होने से मजदूरी कर स्वयं और तीन बच्चों का पाल रही है। रुपए नहीं होने से बड़ी बेटी भावना की पढ़ाई छुट गई, वहीं बेटे सुधीर और सुमित की पढ़ाई रुक सकती है।

केस-02: दिखावा साबित हुए दावे
सीहोर के पचामा निवासी लक्ष्मीनारायण परमार ने बताया कि उनके पास 8 एकड़ जमीन है और घर के मुखिया की जिम्मेदारी बड़े भाई मेहताबसिंह संभालते थे। बड़े भाई ने खेती और परिवार का पालन पोषण करने दो बैंक से 2 लाख 50 हजार और 4 लाख रुपए साहूकारों से कर्ज लिया था। जिसे चुकाने में असमर्थ मेहताबसिंह परमार ने 23 मई 2019 को खेत पर फांसी लगाकर आत्महत्या कर ली थी।

 

मृतक किसान के छोटे भाई लक्ष्मीनारायण परमार का आरोप है कि भाई के जाने के बाद न कर्ज माफ हुआ और ना ही सहायता मिली। जिससे परिवार के 8 लोगों का भरण पोषण का संकट खड़ा हो गया है। इस बार भी सोयाबीन फसल को अतिवृष्टि ने नष्ट कर दिया, जिससे जमीन बेचना पड़ेगी। अफसर, जनप्रतिनिधियों के तमाम दावे सिर्फ दिखावा है। दावे सही होते तो मदद जरूर मिलती। मृतक किसान की पत्नी सविता बाई का कहना है कि भगवान ने पति छिना और अब ये दिन देखने मिल रहे हैं।

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किसानों को विभिन्न परिस्थितियों में मदद मुहैया कराने अलग-अलग प्रावधान है। उसकी गाइड लाइन के हिसाब से ही मदद मिलती है। इसमें आत्महत्या करने पर आर्थिक राशि देने का प्रावधान नहीं है।
वीके चर्तुवेदी, एडीएम सीहोर

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