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2024 में चांद पर कदम रख सकती है पहली महिला अंतरिक्ष यात्री

Mohmad Imran

Publish: Sep 07, 2019 19:17 PM | Updated: Sep 07, 2019 19:17 PM

Science and Tech

2024 में चांद पर कदम रख सकती है पहली महिला अंतरिक्ष यात्री

-अमरीका समेत चीन, रूस और भारत भी अभी तक चांद पर महिला अंतरिक्ष यात्री नहीं भेज पाएं हैं, हाल के मिशनों में मिली सफलता से आने वाले सालों में इसकी प्रबल संभावनाएं बन रही हैं कि जल्द ही कोई महिला एस्ट्रोनॉट चांद पर भी दुनिया की आधी आबादी का प्रतिनिधत्व करे।

अमरीका के ऐतिहासिक लूनर मिशन को हाल ही 50 साल पूरे हुए हैं। इन पांच दशकों में अमरीकी अंतरिक्ष एजेंसी नासा ने कई सफल अभियान भेजे हैं जिसमें बीते साल का सौर मिशन भी शामिल है। लेकिन आज तक अमरीका समेत चीन, रूस और भारत या अन्य देश चांद पर दुनिया की पहली महिला अंतरिक्ष यात्री नहीं भेज पाएं हैं। हाल के मिशनों में मिली सफलता से आने वाले सालों में इसकी प्रबल संभावनाएं बन रही हैं कि जल्द ही कोई महिला एस्ट्रोनॉट चांद पर भी दुनिया की आधी आबादी का प्रतिनिधत्व कर सकती है। हाल ही नासा ने भी इस बात के संकेत दिए हें कि साल 2024 तक एक महिला अंतरिक्ष यात्री चांद पर उतर सकती है। अंतरिक्ष मिशनों के लिए राष्ट्रपति डॉनल्ड ट्रम्प ने नासा के बजट में 160 करोड़ (1.6 बिलियन डॉलर) रुपए की वृद्धि की है। गौरतलब है कि नासा मंगल और चांद पर पुन: अभियान की तैयारी कर रहा है जिसके लिए उसे करीब 2100 करोड़ (21 बिलियन डॉलर) रुपए की जरुरत है। नासा के प्रशासक जिम ब्रिडेनस्टाइन ने भी इस मिशन और संभावित बजट के बारे में ट्वीट किया था। जिम के मुताबिक इस बजट का उपयेाग अंतरिक्ष मिशन के लिए डिजायन, निर्माण और खोज के लिए किया जाएगा। वहीं नासा की संचार निदेशक बैटिना इनक्लैन का कहना है कि अभी तक 12 अमरीकी मूल के पुरुष अंतरिक्ष यात्री ही चांद पर उतर सके हैं। गौरतलब है कि अमरीका का अंतिम चांद मिशन 1972 में पूरा हुआ था। लेकिन आज तक कोई भी महिला चांद के धरातल पर कदम नहीं रख सकी है। राष्ट्रपति डॉनल्ड ट्रंप ने भी इसे नासा वैज्ञानिकों के लिए चुनौती बताया है। इसके बाद से ही नासा साल 2024 तक एक महिला अंतरिक्ष यात्री को चांद दक्षिण ध्रुव पर उतारने की तैयारियों में जुट गया है।

'आर्टेमिस' होगा मिशन का नाम
नासा ने अपने ***** नए मिशन का नाम 'आर्टेमिस' तय किया है। यह यूनान के पौराणिक पात्रों में चांद की देवी का नाम है जो देवता अपोलो की जुड़वा बहन थी। इतना ही नहीं आर्टेमिस युवा लड़कियों की रक्षक भी थी। नासा के इस नाम को रखने के पीछे का कारण भी बहुत दिलचस्प है। दरअसल 1969 में अमरीका के पहले मानव चंद्र मिशन अपोलो 11 ने इतिहास रचा था और अमरीका को विश्व शक्ति बनने में मदद की थी। इसी मिशन से पहली बार इंसान ने नील आर्मस्ट्रॉन्ग और अज एड्रिन के रूप में चांद पर कदम रखा था। इसलिए जुड़वा बहन होने के नाते नासा को इस मिशन की सफलता की भी पूरी उम्मीद है। क्योंकि 52 साल बाद अमरीका दोबारा चांद पर लौटेगा और बार कदम रखने वाली पहली महिला अंतरिक्ष यात्री हो सकती है। इसके लिए सहयोगी एजेंसियां पूरे देश में काम कर रही हैं।

2028 तक भेजेंगे स्थाई मिशन
नासा का कहना है कि वे पहले 2024 में 52 साल बाद चांद पर एक पुरुष और पहली अंतरिक्ष यात्री को उतारने पर ध्यान केन्द्रित कर रहे हें। इसके बाद वे 2028 में पूर्णतया महिलाओं के लिए स्थायी चंद्र मिशन लॉन्च करेंगे। आर्टेमिस के साथ नासा चंद्रमा पर मनुष्यों की स्थायी उपस्थिति के लिए साल 2022 तक नासा चांद के चारों ओर कक्षा में एक छोटा-सा स्पेस स्टेशन बनाएगा। नासा इस अभियान के लिए खास ओरियन स्पेस क्रॉफ्ट तैयार कर रहा है जिस पर अभी तक 65 करोड़ रुपए खर्च हो चुके हैं। अभियान के साथ-साथ नासा नई पीढ़ी के वैज्ञानिकों को भी तैयार कर रहा है। 2024 में एक महिला अंतरिक्ष यात्री के चांद पर पहला कदम रखने के साथ ही अंतरिक्ष में भी लैंगिक समानता की ओर यह पहला महत्त्वपूर्ण कदम होगा।

भारत भी कर रहा तैयारी
जहां अमरीका के पहले महिला चंद्र मिशन में अभी पांच साल हैं वहीं भारतीय स्पेस एजेंसी इसरो 2021 में जाने वाले पहले मानवयुक्त गगनयान मिशन के साथ ही महिला अंतरिक्ष यात्री भेजने की भी तैयारी कर रहा है। इसरो का प्रयास चार अंतरिक्ष यात्रियों में से एक महिला यात्री को भेजना है। इसरो प्रमुख के. सिवन ने इस बारे में बैंगलुरू में बताया है। इसके लिए एजेंसी भारतीय वायु सेना से संभावित अंतरिक्ष यात्रियों का चुनाव करेगी। चुने हुए लोगों को इंस्टीट्यूट ऑफ एयरोस्पेस मेडिसिन, बैंगलुरू में प्रशिक्षण दिया जाएगा। वहीं अंतरिक्ष मिशन की एडवांस ट्रेनिंग विदेशी स्पेस एजेंसियों के सहयोग से की जाएगी। इस मिशन पर करीब 10 हजार करोड़ रुपए का खर्च आने की संभावना है।