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विचार मंथन : मेरे भाग्य में गंगा का स्नान नहीं, मैं तो अपने कर्म को ही गंगा स्नान समझता हूं- संत रैदास

Shyam Kishor

Publish: Jun 12, 2019 15:05 PM | Updated: Jun 12, 2019 15:05 PM

Religion and Spirituality

मेरे भाग्य में गंगा का स्नान नहीं, मैं तो अपने कर्म को ही गंगा स्नान समझता हूं- संत रैदास

 

सोमवती अमावस्या पर गंगा स्नान

सन्त रैदास मोची का काम करते थे। अपने काम को संत रैदास भगवान की पूजा मानकर ही पूरी लगन एवं ईमानदारी से पूरा करते थे। एक बार एक साधु रैदास के पास आकर बोला कुछ ही दिनों बाद सोमवती अमावस्या आने वाली है हम दोनों गंगा स्नान करने के लिए साथ-साथ चलेंगे, संत रैदास ने साधु को आश्वासन दे दिया की जरूर गंगा स्नान के लिए साथ-साथ चलेंगे। संत रैदास अपने काम में और वह साधु सदा जप-तप में तल्लीन रहते थे।

 

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मेरे भाग्य में गंगा का स्नान नहीं

जैसे ही सोमवती अमावस्या के स्नान का दिन निकट आया, वह साधु संत रैदास के पास पहुंचकर गंगा स्नान की बात याद दिलायी। लेकिन उसी बीच संत रैदास कुछ लोगों के जूते सीने का काम हाथ में ले चुके थे, जो उन्हें समय पर देना था। अपनी असमर्थता व्यक्त करते हुए संत रैदास ने कहा 'महात्मन्! आप मुझे क्षमा करें। मेरे भाग्य में गंगा का स्नान नहीं है। मेरी तरफ से मां गंगा के लिए यह एक पैसा लेते जाएं और गंगा मां में मेरे नाम से चढ़ा देना।

 

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गंगा मैया की कृपा

अब वह साधु गंगा स्नान के लिए समय पर पहुंच गया। स्नान करने के बाद साधु को संत रैदास की बात स्मरण हो आयी। मन ही मन गंगा से बोले 'मां यह पैसा आपके रैदास ने भेजा है- स्वीकार करें। इतना कहना था कि गंगा की अथाह जल राशि से दो विशाल सुंदर से हाथ बाहर उभरे और पैसे को हथेली में ले लिया। साधु यह दृश्य देखकर विस्मित रह गये और सोचने लगे मैंने इतना जप-तप किया, गंगा आकर स्नान किया तो भी गंगा माँ की कृपा नहीं प्राप्त हो सकी, जब कि गंगा के बिना स्नान किए ही रैदास को अनुकुम्पा प्राप्त हो गयी।

 

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गंगा स्नान के बाद वह साधु संत रैदास के पास पहुंचा और पूरी बात बतायी। रैदास बोले- 'महात्मन्! यह सब कर्त्तव्य धर्म के निर्वाह का प्रतिफल है। इसके मुझ अकिंचन के तप, पुरुषार्थ की कोई भूमिका नहीं।

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