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विचार मंथन : सफलता देवी के दर्शन चाहते हैं तो, लक्ष्य में तन्मय हो जाइए- डॉ. प्रणव पंड्या

Shyam Kishor

Publish: Jul 12, 2019 17:28 PM | Updated: Jul 12, 2019 17:28 PM

Religion and Spirituality

daily thought vichar manthan : जो लोग लक्ष्य की तरफ आंख रखकर शेष सभी ओर से अपनी इन्द्रियों को मोड़ लेते है और लक्ष्य की ओर ही समस्त शक्ति लगा देते हैं वे ही सफल होते हैं।

मन बड़ा शक्तिवान है परन्तु बड़ा चञ्चल। इसलिए उसकी समस्त शक्तियां छितरी रहती हैं और इसलिए मनुष्य सफलता को आसानी से नहीं पा लेता। सफलता के दर्शन उसी समय होते हैं, जब मन अपनी वृत्तियों को छोड़कर किसी एक वृत्ति पर केन्द्रित हो जाता है, उसके अलावा और कुछ उसके आमने-सामने और पास रहती ही नहीं, सब तरफ लक्ष्य ही लक्ष्य, उद्देश्य ही उद्देश्य रहता है।

 

विचार मंथन : जिसकी भावना श्रेष्ठ है उसका कर्मकाण्ड अशुद्ध होने पर भी वह ईश्वर को प्राप्त कर सकता है- चैतन्य महाप्रभु

 

मनुष्य अनन्त शक्तियों का घर है, जब मनुष्य तन्मय होता है तो जिस शक्ति के प्रति तन्मय होता है, वह शक्ति जागृत होती और उस व्यक्ति को वह सराबोर कर देती है। पर जो लोग तन्मयता के रहस्य को नहीं जानते अपने जीवन में जिन्हें कभी एकाग्रता की साधना का मौका नहीं मिला, वे हमेशा डाल-डाल और पात पात पर डोलते रहे परन्तु सफलता देवी के वे दर्शन नहीं कर सके।

 

विचार मंथन : जब विवेकानन्द के जन्म से पूर्व में मुझें एक अद्भूत दिव्य दर्शन हुआ- रामकृष्ण परमहंस

 

जिन्हें हम विघ्न कहते हैं, वे हमारे चित्त की विभिन्न वृत्तियां हैं जो अपने अनेक आकार प्रकार धारण करके सफल नहीं होने देतीं। यदि हम लक्ष्य सिद्ध करना चाहते हैं तो यह आवश्यक है कि लक्ष्य से विमुख करने वाली जितनी भी विचार धारायें उठें और पथ-भ्रष्ट करने का प्रयत्न करें हमें उनसे अपना सम्बन्ध विच्छेद करते जाना चाहिए। और यदि हम चाहें अपनी दृढ़ता को कायम रखें, अपने आप पर विश्वास रखें तो हम ऐसा कर सकते हैं, इसमें किसी प्रकार का कोई सन्देह नहीं है। एक ऐतिहासिक घटना इस सम्बन्ध में हमें विशेष प्रकाश दे सकती है।

 

विचार मंथन : एक पाप से सारे पुण्यों का फल नष्ट हो जाता है- भगवान श्रीकृष्ण

 

सिंहगढ़ जीतने के लिए मराठों के एक दल ने उस पर चढ़ाई कर दी। प्रसिद्ध तानाजी राव इसके सेनानी थे। अपने सैनिकों के साथ किले की दीवार पर रस्सी टांगकर चढ़ गये। शत्रुओं के साथ घोर युद्ध होने लगा। तानाजी खेत रहे। इस पर वीर मराठा चंचल हो गये और एकाग्रता भंग होते ही उन्होंने भागना आरम्भ कर दिया, जिस रास्ते आये थे उसी रास्ते से उतरने का प्रयत्न करने लगे। तानाजी के भाई सूर्याजी ने उस रास्ते को बन्द करने के लिए रस्सी को काट दिया और कह दिया कि भागने का रास्ता बन्द हो गया। भागने का रास्ता बन्द हो जाने पर जीत का ही रास्ता खुला मिला, इसलिए जो शक्ति भागने में लग गई थी उसने फिर जीत का बाना पहना। और सिंहगढ़ पर विजय प्राप्त की।

 

विचार मंथन : निम्न नहीं उच्च कोटि का स्वार्थ अपनाएं- आचार्य श्रीराम शर्मा

 

मन की अपरिमित शक्ति को जो लक्ष्य की ओर लगा देते हैं और लक्ष्य भ्रष्ट करने वाली वृत्तियों पर अंकुश लगा लेते हैं अथवा उनसे अपना मुँह मोड़ देते हैं वे ही जीवन के क्षेत्र में विजयी होते हैं, सफल होते हैं। शास्त्रों में इस सफलता को पाने के लिए बाण के समान गतिवाला बनने का आदेश दिया है-
“शर वत् तन्मयो भवेत्”
बाण की तरह तन्मय होना चाहिए।

 

विचार मंथन : महर्षि पतंजलि के ये योगसूत्र से बदल जाता है व्यक्ति का जीवन

 

धनुष से छूटा बाण अपनी सीध में ही चलता जाता है, वह आस-पास की किसी वस्तु के साथ अपना संपर्क न रख कर सीधा वहीं पहुंचता है जो कि उसके सामने होती है। अर्थात् सामने की तरफ ही उसकी आंख खुली रहती है और सब ओर से बन्द। इसलिये जो लोग लक्ष्य की तरफ आंख रखकर शेष सभी ओर से अपनी इन्द्रियों को मोड़ लेते है और लक्ष्य की ओर ही समस्त शक्ति लगा देते हैं वे ही सफल होते हैं। उस समय अर्जुन से पूछे गये द्रोण के प्रश्न-उत्तर में अर्जुन की तरह उनकी अन्तरात्मा में एक ही ध्वनि गूंजती है अतः अपना लक्ष्य ही दिखाई देता है।

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