स्लो इंटरनेट स्पीड होने पर आपको पत्रिका लाइट में शिफ्ट कर दिया गया है ।
नॉर्मल साइट पर जाने के लिए क्लिक करें ।

विचार मथन : लक्ष्मी पुरुषार्थी, उद्योगी पुरुष-सिंहों को ही प्राप्त होती है- डॉ. प्रणव पण्डया

Shyam Kishor

Publish: May 24, 2019 17:34 PM | Updated: May 24, 2019 17:34 PM

Religion and Spirituality

उन्नति, प्रगति, सफलता और सम्पन्नता का एकमात्र आधार पुरुषार्थ ही है

लक्ष्मी श्रम और उद्योग की ही अनुगामिनी होती है

‘लक्ष्मी उद्योगी पुरुष-सिंहों को प्राप्त होती है’- यह केवल सूक्ति नहीं, बल्कि एक सिद्धान्त है। ऐसा सिद्धान्त जो युग-युग के बाद स्थिर किया गया है। उन्नति, प्रगति, सफलता और सम्पन्नता का एकमात्र आधार उद्योग अथवा पुरुषार्थ ही है। जब तक मनुष्य पुरुषार्थ नहीं करेगा, परिश्रम में अपना पसीना नहीं बहायेगा, तब तक किसी प्रकार के श्रेय का अधिकारी नहीं बन सकता। लक्ष्मी श्रम और उद्योग की ही अनुगामिनी होती है।

 

प्रेम तो आत्मा में ही हो सकता है

हर मनुष्य में एक जन्मजात महापुरुष छिपा होता है, लेकिन वह आसुरी तत्त्वों के कारागार में बंद होता है। मनुष्य का कर्त्तव्य है कि वह उसे देवतत्त्वों की सहायता से मुक्त कर उठाये और महान् कृत्यों द्वारा महानता की ओर बढ़े। भोगेच्छा को प्रेम कहना एक बहुत बड़ी प्रवंचना है। प्रेम तो आत्मा में ही हो सकता है और भोग शरीर का किया जाता है। इसलिए जिनके प्रेम के पीछे भोग की लालसा छिपी है, उनकी दृष्टि शरीर तक ही है। आत्मा का भाग नहीं हो सकता। वह स्वतंत्र है, वह किसी बंधन में नहीं आती।

 

ये भी पढ़े- गंभीर बीमारी से अंतिम सांस लेने वाला भी इस तांत्रिक यज्ञ से उठ खड़ा होगा, अपनी उम्र बढ़ा लेता है

 

इसे कहते हैं आत्मबल

आदर्शों एवं सिद्धान्तों पर अड़े रहने, किसी भी प्रलोभन और कष्ट के दबाव में कुमार्ग पर पग न बढ़ाने, अपने आत्म-गौरव के अनुरूप सोचने और करने, दूरवर्ती भविष्य के निर्माण के लिए आज की असुविधाओं को धैर्य और प्रसन्न चित्त से सह सकने की दृढ़ता का नाम आत्मबल है।

 

संसार में सुख-शान्ति की अजस्र धारा बहती ही रहेगी तो

सतयुग और कुछ नहीं, मानवीय आस्थाओं में, मान्यताओं में, गतिविधियों में आदर्शवादिता और उत्कृष्टता के समुचित समावेश की प्रतिक्रिया मात्र है। समाज का निर्माण उच्च आदर्शों पर आधारित होगा और व्यक्ति अपनी मानवीय उत्कृष्टता का गौरव अनुभव करते हुए तदनुरूप आचरण करेगा तो इस संसार में सुख-शान्ति की अजस्र धारा बहती ही रहेगी। अभाव, कष्ट, क्लेश, संघर्ष, द्वेष, दुर्भाव और शोक-संताप का तब कोई कारण ही शेष न रहेगा।

 

खबर काम की है- हनुमान चालीसा लाइफ मैनेजमेंट की पाठशाला, इस तरह से पढ़ने वाला हो जाता है मालामाल

********************