स्लो इंटरनेट स्पीड होने पर आपको पत्रिका लाइट में शिफ्ट कर दिया गया है ।
नॉर्मल साइट पर जाने के लिए क्लिक करें ।

विचार मंथन : एक पाप से सारे पुण्यों का फल नष्ट हो जाता है- भगवान श्रीकृष्ण

Shyam Kishor

Publish: Jul 06, 2019 17:50 PM | Updated: Jul 06, 2019 17:50 PM

Religion and Spirituality

bhagwan shri krishna महाभारत युद्ध के बाद माता रुक्मणी जी से कहते हैं, जब किसी व्यक्ति के आसपास कुछ गलत हो रहा होता है और वह कुछ नहीं करता, वह लोग भी पापी ही कहलाते हैं।

पाप और धर्म

महाभारत के युद्ध पश्चात जब श्री भगवान श्रीकृष्ण ( bhagwan shri krishna ) लौटे तो रोष में भरी रुक्मणी जी ने उनसे पूछा? युद्ध में बाकी सब तो ठीक था किंतु आपने द्रोणाचार्य और भीष्म पितामह जैसे धर्मपरायण लोगों के वध में क्यों साथ दिया? श्री भगवान ने उत्तर दिया- ये सही है की उन दोनों ने जीवन पर्यंत धर्म का पालन किया किन्तु उनके किये एक पाप ने उनके सारे पुण्यों को हर लिया। रुक्मणी जी ने पूछा वो कौन से पाप थे?

 

ये भी पढ़ें : रथयात्रा के तीसरे दिन रूठी हुई माता लक्ष्मी को ऐसे मनाते हैं भगवान जगन्नाथ

 

भगवान श्रीकृष्ण ने कहा- जब भरी सभा में द्रोपदी का चीर हरण हो रहा था तब ये दोनों भी वहां उपस्थित थे, और बड़े होने के नाते ये दुशासन को आज्ञा भी दे सकते थे किंतु इन्होंने ऐसा नहीं किया। उनके इस एक पाप से बाकी सभी धर्मनिष्ठता छोटी पड़ गई। रुक्मणी जी ने पुछा- और कर्ण? वो तो अपनी दानवीरता के लिए प्रसिद्ध था, कोई उसके द्वार से खाली हाथ नहीं गया उसकी क्या गलती थी?

 

विचार मंथन : जब विवेकानन्द के जन्म से पूर्व में मुझें एक अद्भूत दिव्य दर्शन हुआ- रामकृष्ण परमहंस

 

भगवान श्रीकृष्ण ने कहा, वस्तुतः वो अपनी दानवीरता के लिए विख्यात था और उसने कभी किसी को ना नहीं कहा, किन्तु जब अभिमन्यु सभी युद्धवीरों को धूल चटाने के बाद युद्धक्षेत्र में आहत हुआ भूमि पर पड़ा था तो उसने कर्ण से, जो उसके पास खड़ा था, पानी मांगा, कर्ण जहां खड़ा था उसके पास पानी का एक गड्ढा था किंतु कर्ण ने मरते हुए अभिमन्यु को पानी नहीं दिया!

 

ये भी पढ़ें : गुप्त नवरात्रि की अष्टमी : 8 जुलाई को कर लें इन 8 में से कोई भी एक उपाय, माँ दुर्गा भर देंगी धन के भंडार

 

इसलिये उसका जीवन भर दानवीरता से कमाया हुआ पुण्य नष्ट हो गया। बाद में उसी गड्ढे में उसके रथ का पहिया फंस गया और वो मारा गया। हे रुक्मणी अक्सर ऐसा होता है की जब मनुष्य के आसपास कुछ गलत हो रहा होता है और वे कुछ नहीं करते। वे सोचते हैं की इस पाप के भागी हम नहीं हैं, अगर वे मदद करने की स्थिति में नही है तो सच्ची बात बोल तो सकते हैं परंतु वे ऐसा भी नही करते, ऐसा ना करने से वे भी उस पाप के उतने ही हिस्सेदार हो जाते हैं, जितना दूसरा कर रहा होता है।

*****************