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आत्मा का हित करना है तो बस यह स्वीकार कर लो...

Gourishankar Jodha

Publish: Oct 21, 2019 10:28 AM | Updated: Oct 20, 2019 21:58 PM

Ratlam

नीमचौक स्थानक पर गुरुदेव प्रियदर्शनश्री महाराज ने बताई आत्मा हित की बातें

रतलाम। जीवन में और कुछ हो न हो विनय का होना बहुत जरूरी है। सुगंध पाने के लिए गंदगी के पास नहीं बगीचे में जाना पड़ेगा। दुकान अच्छे से चलाने के लिए दुकान पर बैठकर ताशपत्ती, नहीं मोबाइल गेम्स नहीं, पड़ोस की दुकान पर टाइम पास नहीं, खुद की दुकान पर बैठकर मन लगाकर व्यापार करना होगा। आत्मा का हित करना है तो विनय को स्वीकार करना होगा। यह विचार नीमचौक स्थानक पर प्रवचन में धर्मसभा को संबोधित करते हुए गुरुदेव प्रियदर्शनश्री महाराज ने व्यक्त किए।

विनय मर्यादा है सुरक्षा कवच है
महाराजश्री ने बताया कि उत्तराध्ययन सूत्र का पहला सूत्र है विनय सूत्र विनय का अर्थ है धागा । एक अर्थ है विशेष रूप से मुक्ति मार्ग की और ले जाने वाला । तीसरा अर्थ है उखाडऩा। विनय के द्वारा साधक अपने कर्मों को उखाड़ कर फेंक देता है। इसलिए उत्तराध्यायन सूत्र को पहला स्थान दिया गया है । जैसे हम खुजली वाले कुत्ते को घर में घुसने नही देते है घर के बाहर भी बैठे तो डंडा मारकर भगा देते है, कुछ वैसी ही हालत अविवेकी इंसान की इस दुनिया में होती है । विनय बन्धन नही है, चापलूसी नही है। विनय मर्यादा है सुरक्षा कवच है । विनयवान शिष्य को गुरु आवाज दे तो शिष्य बैठे -बैठे काम नहीं पूछता है, बल्कि गुरु के सम्मुख तुरन्त खड़ा होकर गुरु का आदेश सविनय पूछता है।

आत्मा को शुध्द करने के लिए परिषय सहना जरूरी
गुरुदेव प्रियदर्शन मुनि ने भगवान महावीर की अंतिम देशना उत्तराध्ययन सूत्र व महावीर के महावीर बनने की जीवन यात्रा की प्रवचन माला की शुरुआत की। यह श्रृंखला दीपावली तक चलेगी। मुनिश्री ने कहा कि बच्चा सालभर पढाई करता है । उसने बराबर पढाई की या नहीं ये देखने के लिए बच्चे की परीक्षा ली जाती है । वैसे ही साधक साधना करते है, लेकिन उस साधना को चेक करने के लिये परिषय बहुत जरूरी है। जैसे सोना खदान से निकलता है तो उसके साथ धूल मिट्टी कचरा सब होता है वो सोना तपने के बाद शुध्द हो जाता है। घी निकालने के लिए भी मक्खन को तपना पड़ता है । इसी प्रकार आत्मा को शुध्द करने के लिए परिषय सहना जरूरी है । मनुष्य जन्म, मनुष्यत्व, धर्म , धर्म के मार्ग पर चलना दुर्लभ है ।

महावीर को जाने बिना समझे बिना महावीर नहीं बना जा सकता
महावीर को जाने बिना समझे बिना महावीर नहीं बना जा सकता है। भगवान महावीर की आत्मा ने भी अनंत-अनंत जन्म ग्रहण किए थे । पूर्ण तथा अनंत जन्मों का विवेचन तो हो नहीं सकता इसलिए भगवान महावीर के 27 भव सम्यक्त्व प्राप्ति के बाद के मुख्य भव हैं। एक बार भगवान महावीर की आत्मा को मानव जन्म मिला। उनका जन्म जम्बू द्वीप में पश्चिम महाविदेह में महावक्र विजय में जयंती नगरी में हुआ।नाम रखा नयसार। नयसार अपने साथियों के साथ लकड़ी काटने जंगल गया, वहां भोजन करने बैठा और किन्ही संतों को देखा कि रास्ता भूल गए लगते हैं। उन्हें भोजन कराया और मार्ग बताया। साधुओं ने भी नयसार को धर्म मार्ग बताया। धर्म सार सुनकर नयसार को सम्यक्त्व की लब्धि हुई और वहां से सम्यक्त्व में आयुष्य बंध कर वैमानिक देव बना। यह महावीर के महावीर बनने का पहला जन्म नयसार के रूप में था।