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बारिश रूठी तो सूख गई सैकड़ों गांवों की जीवनदायिनी बनास

Laxman Singh Rathore

Publish: Jul 20, 2019 12:42 PM | Updated: Jul 20, 2019 12:42 PM

Rajsamand

क्षेत्र के कुओं का जलस्तर भी गिरा

प्रमोद भटनागर/गिरिश पालीवाल

खमनोर. राजस्थान की प्रमुख नदियों में शुमार बनास नदी जिले के सैकड़ों गांवों के लिए प्रत्यक्ष-ंअप्रत्यक्ष रूप में जीवनदायिनी है। लेकिन, बारिश क्या रूठी नदी का वैभव ही सिमटने लगा है।
अरावली की गोद में वेरों का मठ से निकलने वाली बनास नदी के वैभव का अंदाजा इस बात से लगाया जा सकता है कि इसकी कुल लंबाई 512 किलोमीटर है। जलग्रहण क्षेत्रफल 45 हजार 833 किलोमीटर आंका गया है। ये आंकड़ा राजस्थान की अन्य प्रमुख नदियों माही, चंबल, बाणगंगा व लूणी से कहीं ज्यादा है। जिले में बाघेरी नाका व नंदसमंद बांध इसके बिना अधूरे हैं तो खारी फीडर के सहारे भरने वाली राजसमंद झील (गोमती के अलावा) भी काफी हद तक इस पर निर्भर है। अनगिनत नाले व झरने बनास की गोद में समाकर इसको और विशाल बनाते हैं। बनास अपने किनारों पर अथाह वनसंपदा पैदा करती है। वहीं, कुओं-बावडिय़ों का सेजा बनाए रखती है। ये न केवल मानव, बल्कि पेड़-पौधों, पशु-पक्षियों के लिए भी वरदान है। इसीलिए इसे वन की आशा उपनाम से भी जाना जाता है। सदियों से अपने जल से मानव, पशु-पक्षियों, पेड़ों का पोषण करती रही बनास संपदाओं के अत्यधिक दोहन से बर्बाद होने लगी है। इस बार बारिश कम हुई तो नदी पूरी तरह सूख गई है। ऐसे में इसके दायरे में आने वाले सभी प्रकार के जलस्त्रोतों का स्तर पाताल छू गया है। जबकि, एक समय था जब यह नदी बारह महीने बहती थी।

 

अंतिम सांसें गिन रही धरतीपुत्र की आस खरीफ की फसल
देलवाड़ा. सावन माह चल रहा है और मानसून की बेरुखी हर किसी को खल रही है। आमजन की नजरें बारिश की आस में आसमान ताक रही है। वहीं, खेतों में खड़ी खरीफ मुरझाने के कगार पर है, जिससे धरतीपुत्रों की चिंता भी बढ़ती जा रही है।
क्षेत्र में करीब एक पखवाड़े से बारिश नहीं होने से अब खरीफ की की प्रमुख मक्का की फसल को जल्द से जल्द पानी नहीं मिला तो पूरी फसल चौपट हो जाएगी। वर्तमान में फसल मुरझाने लगी है और अंतिम सांसें गिर रही है। किसान बुवाई के बाद खरपतवार हटाने के लिए दो बार खुदाई कर चुके हैं और अब मक्का को पानी की सख्त जरूरत है। लेकिन, बीते पन्द्रह दिनों से बारिश की एक बूंद भी नसीब नहीं होने से खरीफ को बारिश के लिए एक दिन का इंतजार भी भारी पड़ रहा है। क्षेत्र में पहले से ही पानी की किल्लत होने से कुओं में भी इतना पानी नहीं है कि धरतीपुत्र सिंचाई करके फसल को बचा सके। ऐसे में अब किसानों के साथ ही सभी की नजरे इंद्रदेव की मेहरबानी पर ही टिकी है। क्षेत्र के देलवाड़ा, कालीवास, बिलोता, नेगडिय़ा, रठूंजणा, कोटड़ी, बेरण, कोलर, कमली का गुड़ा, लीलेरा, वापड़ा सहित दो दर्जन गांवों में मक्का की फसल सूखने के कगार पर पहुंच चुकी है।

River drained by no rain