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लालमहल के मनोरथ में उमड़ा श्रद्धालुओं का सैलाब

Laxman Singh Rathore

Publish: Aug 21, 2019 12:35 PM | Updated: Aug 21, 2019 12:35 PM

Rajsamand

laalamahal ke manorath mein umada shraddhaaluon ka sailaab श्रीनाथजी में तिलकायत के पौत्र के आगमन पर हो रहे हैं विविध मनोरथ

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नाथद्वारा. आराध्य प्रभु श्रीनाथजी मंदिर के तिलकायत राकेश महाराज के पौत्र एवं विशाल बावा के पुत्र लालगोविंद अधिराज बावा के नाथद्वारा में आगमन के अवसर पर तीन दिवसीय मनोरथ का श्रीगणेश मंगलवार को लालमहल के मनोरथ के साथ हुआ।
मनोरथ के तहत देर शाम पौने आठ बजे खुले इन विशेष मनोरथ के दर्शन के अवसर पर मंदिर के मोतीमहल चौक में पूरी लाल आभा से सजाते हुए निधि स्वरूप लाड़ले लालन को इसके साथ ही स्थापित की गई चांदी की विशेष हटड़ी में बिराजित किया गया। साथ ही लालन के सन्मुख चौक में ही नाथूवास स्थित गोशाला से गोमाता को भी लाकर मनोरथ को साकार किया। इस दौरान तिलकायत, उनके पुत्र विशाल बावा एवं अधिराज बावा सहित परिवार के सदस्य मौजूद रहे। मनोरथ के अवसर पर श्रीजी बावा को भी लालरंग की कांच की हटड़ी की आभा सुशोभित कराई गई। जबकि राजभोग की झांकी में श्रीजी बावा व लाड़ले लालन को सोने के बंगले की सेवा धराई गई। सुबह शृंगार के समय श्रीजी बावा को लाल चूंदड़ी आभा का विशेष शृंगार धराया गया। उधर, मंदिर में कार्य करने वाले ग्वाल-बाल नाथूवास से गोमाता को लेकर मोतीमहल आए।
आज नंद महोत्सव का मनोरथ laalamahal ke manorath mein umada shraddhaaluon ka sailaab Learn to

श्रीजी मंदिर में बुधवार को राजभोग की झांकी के समय नंद महोत्सव का आयोजन होगा। इसी प्रकार निधि स्वरूप लाड़ले लालन नंद महोत्सव के लिए राजभोग में कमल चौक में पधारेंगे। जबकि, सायंकाल सूखे मेवा की मंडली के साथ श्रीजी बावा एवं लाड़ले लालन के दर्शन होंगे।

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प्रवचन प्रतियोगिता का आयोजन
नाथद्वारा. श्रीकृष्ण जन्माष्टमी महोत्सव के उपलक्ष्य में श्रीवल्लभविलास में मंगलवार को पुष्टिमार्गीय प्रवचन प्रतियोगिता हुई। पुष्टि प्रसार अधिकारी दयाशंकर पालीवाल ने बताया कि विभिन्न संस्थानों के विविध वर्गों के संभागीयों ने उच्च स्तरीय प्रवचन करते हुए कृष्ण के जन्म, बाल लीला, गीता के कर्मज्ञान भक्ति योग के उपदेश और आज के परिवेश में कृष्ण की प्रासंगिकता तथा पुष्टिमार्ग के सेव्य प्रभु श्रीकृष्ण की अष्टयाम सेवा पर भाव व्यक्त किए। कार्यक्रम के मुख्य अतिथि वेदाचार्य पं. विष्णुुदत्त पुरोहित थे, जबकि अध्यक्षता डॉ. भगवान लाल ने की।