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खमनोर-बलीचा मार्ग पर बारिश में गिर रहा मलबा

Laxman Singh Rathore

Publish: Aug 18, 2019 13:09 PM | Updated: Aug 18, 2019 13:09 PM

Rajsamand

Debris falling in the rain on the Khamanor-Balicha route

घाटी के शीर्ष पर टनों वजनी चट्टानें लटक रही, पर्यटक ले रहे खतरा मोल, प्रशासन नदारद
दरकती चट्टानों के बीच हल्दीघाटी का सफर

गिरिश पालीवाल/प्रमोद भटनागर
खमनोर. कभी संघर्ष का पर्याय रही हल्दीघाटी आज राहगीरों के लिए मुश्किलों और खतरों का सबब बनी हुई है। ऐतिहासिक रणभूमि देखने आने वालों को भले ही इसका अनुमान न हो, लेकिन दुर्गम घाटी को काटकर बनाई गई घुमावदार सड़क पर यदा-कदा गिरती चट्टानों से कभी भी बड़ा हादसा हो सकता है। Debris falling in the rain on the Khamanor-Balicha route
हल्दीघाटी को उसकी छवि के मुताबिक ढालने के लिए डेढ़ दशक से भी अधिक समय पहले सड़क निर्माण की इस योजना को तो अंजाम दे दिया, लेकिन अधिकारियों ने लोगों की जिंदगी की कीमत आंकने में कोई दिलचस्पी नहीं दिखाई। इसके चलते प्रतिवर्ष बारिश के दौरान हल्दीघाटी मार्ग पर चट्टानें गिरने की घटनाएं होती रहती है। हल्दीघाटी भ्रमण करने आने वाले पर्यटकों को तो यहां की ऐतिहासिक धरती पर कुछ पल शान और शौक से बिताने की उमंग रहती है, लेकिन कौन समझाए कि जिस जगह वे सफर के यादगार पल अपने कैमरे में कैद करने के लिए उत्साहित हैंं, वही जगह उनके लिए कभी भी मौत का पैगाम लेकर आ सकती है। पर्यटक पहाड़ों से न केवल हल्दी सरीखी माटी को कुरेदते हैं, बल्कि लटक रही चट्टानों के नीचे खड़े होकर फोटो तक खिंचवाने से गुरेज नहीं करते। पर्यटकों को खतरे से आगाह करते बोर्ड भी मिट्टी-पत्थरों के स्खलन के बाद उठाए गए मलबे के साथ ले जाए जा चुके हैं।
राहगीरों की राह में यहां है खतरे
शाहीबाग के अंतिम छोर से लेकर हल्दीघाटी वन विभाग पौध नर्सरी तक एक किलोमीटर के इस डेंजर जोन में हर कदम पर खतरा है। बारिश के दिनों में ये खतरा कई गुना बढ़ जाता है, जब पहाड़ों से बहता पानी अपने साथ कई टन मलबा बहाकर सड़क पर ले आता है। इनमें छोटे-छोटे कंकरों से लेकर बड़े-बड़े पत्थर, चट्टानें और मिट्टी शामिल होते हैं। सड़क पर सरपट भागते वाहनों का संतुलन बिगाडऩे और हादसों को जन्म देने के लिए ये काफी होते हैं। घाटी के शीर्ष से खमनोर की ओर उतरते वक्त वाहन का एक बार आउट ऑफ कंट्रोल होना दूसरा मौका ही नहीं देता। घुमावदार सड़क के दाईं ओर एक गहरी खाई है, जो कभी मुख्य मार्ग हुआ करती थी। हल्दीघाटी को मूल स्वरूप में लाने के मद्देनजर उसे फिर से नैसर्गिक दर्रे का रूप दे दिया गया। इन दोनों समानांतर नई सड़क और पुराने मार्ग में फर्क सिर्फ इतना है कि पहले लंबी और सीधी चढ़ाई थी, जबकि अब वाहन घूमते हुए चढ़ते और उतरते हैं। शाहीबाग से खमनोर के बीच ऊंखलिया घाटी पर बनी पुलिया, हल्दीघाटी वन नर्सरी की पुलिया और चेतक समाधि के पास बनी पुलिया भी कमजोर हो गई है। इन तीनों पुलियाओं के भी टूटने का खतरा बना रहता है।

Debris falling in the rain on the Khamanor-Balicha route

लटकती चट्टानों और मलबे की भयावह तस्वीर
हल्दीघाटी की एक पहाड़ी को काटकर बनाई गई सड़क की मौजूदा स्थिति काफी भयानक हो चुकी है। बारिश में पहाड़ों से पानी के बहाव के कारण दीवारों पर धोरे से बन गए हैं। जलधारा से पहाड़ी लगातार कट रही है। मलबा और पत्थर पड़े हैं। लटक रही चट्टान और मलबे से भयावह तस्वीर बन गई है। किसी भी वक्त गिरने का खतरा मंडरा रहा है। पहाड़ में सीलन से पानी भी उतरने और अंदर से मिट्टी-पत्थरों के भरभराकर गिरने की डेढ़ दशक में आठ-दस घटनाएं हो चुकी हैं। कई बार पर्यटकों के वाहन मलबे में दबने से बच गए। रास्ता अवरुद्ध होने की स्थिति में कालोड़ा से सेमल उनवास होकर खमनोर तक का सफर करना पड़ता है।
मढ़ते हैं जिम्मेदारी, हल नहीं ढूंढ़ते
बारिश में हर साल खिसककर सड़क पर आने वाले मिट्टी, पत्थरों से मलबा जमा हो जाता है, जिसे उठाने के लिए भी दो विभागों के बीच टालमटोल होती रहती है। दरअसल जो पहाड़ है, वह वन विभाग की सीमा में है, जबकि बीच से निकलने वाली सड़क पहले सार्वजनिक निर्माण विभाग की थी और अब मेगा हाइवे के सर्वे के बाद एनएचएआई की देखरेख में चली गई है। ऐसे में मलबे को उठाने के लिए सड़क और वन विभाग एक-दूसरे पर जिम्मेदारी डालते रहते हैं।Debris falling in the rain on the Khamanor-Balicha route वन विभाग कहता है कि सड़क पीडब्यूडी और हाइवे ऑथोरिटी की है, वहीं पीडब्यूडी कहता रहा है कि मलबा वन विभाग के पहाड़ों से खिसककर आ रहा है और सड़क को खराब कर रहा है। जबकि, दोनों ही विभागों ने समस्या का स्थायी हल ढूंढने पर कोई ठोस काम नहीं किया।

Debris falling in the rain on the Khamanor-Balicha route