स्लो इंटरनेट स्पीड होने पर आपको पत्रिका लाइट में शिफ्ट कर दिया गया है ।
नॉर्मल साइट पर जाने के लिए क्लिक करें ।

टनों उत्पादन फिर भी पहचान को मोहताज

Kamal Singh Rajpoot

Publish: Sep 12, 2015 23:06 PM | Updated: Sep 12, 2015 23:06 PM

Rajgarh

पथरीला और पहाड़ी क्षेत्र होने के कारण राजगढ़ और आसपास के क्षेत्र में खीरा-ककड़ी का उत्पादन बहुतायत से होता है। हर साल टनों की मात्रा में जिले में

राजगढ़। पथरीला और पहाड़ी क्षेत्र होने के कारण राजगढ़ और आसपास के क्षेत्र में खीरा-ककड़ी का उत्पादन बहुतायत से होता है। हर साल टनों की मात्रा में जिले में होेने वाले खीरा ककड़ी से प्रदेश सहित देश की कई बड़ी मंडियां गुलजार रहती हैं। इसके बावजूद इसका उत्पादन करने वाले स्थानीय ग्रामीणों को इसका लाभ नहीं मिल पा रहा है। दरअसल बड़ी संख्या में पैदावार होने के बावजूद जिला मे खीरा- ककड़ी उद्यानिकी विभाग की चिह्नित फसलों मे शामिल नहीं है। ऎसे में खीरे का व्यवसाय कर दलाल और बढ़े व्यापारी तो लाखों कमा रहे हैं। पर शासकीय योजनाओं और जानकारी के अभाव में इसके मुख्य उत्पादक ग्रामीण किसानों को इसका आंशिक लाभ भी नहीं मिल पा रहा है।

जिले में राजगढ़, ब्यावरा और खिलचीपुर के ग्रामीण क्षेत्रों में बरसात के मौसम में खीरा क कड़ी का उत्पादन बहुतायत से होता है। मोतीपुरा के कैलाश तंवर, गोलाखेड़ा के जगन्नाथ सिंह, दलेलपुरा के बबलू सहित अनेक किसानों ने बताया कि खेत सहित आसपास की जमीन में उगी खीरा को थोड़ी मात्रा में तोड़क र नजदीकी शहर में बेचा जाता है। जहा बड़े व्यापारी और दलाल शहर के बाहर ही अस्थायी मंडी लगाकर सारी फसल वहीं खरीद लेते हंै। तीन से चार रूपए किलो के मान से ç`टलों खीरा खरीद इसे प्रदेश की अन्य मंडियों मे भेजा जाता है। इन मंडियों में राजगढ़ जिले में उगी यह खीरा बीस से पच्चीस रूपए किलो के मान से आसानी से बिकती है।

व्यवस्थित योजना बने तो मिल सकता है लाभ
इस बार बारिश की अधिकता के कारण खीरा के उत्पादन में देरी हुई। पिछले साल बारिश में देरी से उत्पाद कम हुआ था। दरअसल किसान खीरा के उत्पादन के लिए पूरी तरह सिर्फ बारिश पर ही निर्भर है क्योंकि इतनी बढ़ी मात्रा में पैदा होने वाली यह फसल उघानिकी विभाग मे दर्ज नहीं है। इसके कारण विभाग की किसी भी योजना का लाभ खीरा उत्पादक किसानों को नहीं मिल पा रहा।

यही कारण है कि इस फसल के लिए उत्पादन वृद्धि, विक्रय व्यवस्था और मौसमी सुरक्षा से संबंधित कोई योजना आज तक बनी ही नहीं। यदि उद्यानिकी विभाग द्वारा खीरा के उत्पादन के लिए उचित कार्ययोजना बनाकर विभाग की पंजीकृत फसलों में शामिल करें तो आगामी समय में इसके उत्पादन के लिए समुचित प्रशिक्षण फसल बीमा, फसल ऋण जैसे लाभ मिल सकते हैं। ऎसे में अनुकूल और प्रतिकूल दोनो परिस्थितियों में खीरा उत्पाद के लिए जरूरी संभाववनएं जुटाई जा सकती है।