स्लो इंटरनेट स्पीड होने पर आपको पत्रिका लाइट में शिफ्ट कर दिया गया है ।
नॉर्मल साइट पर जाने के लिए क्लिक करें ।

पाप से बचा नहीं जा सकता, किया है तो सजा भुगतना होगी

Rajesh Kumar Vishwakarma

Publish: Dec 12, 2019 12:12 PM | Updated: Dec 12, 2019 12:12 PM

Rajgarh

- जैन संतों का नगर आगमन, प्रवचन में बोले-
- नगर आमगन के दौरान जगह-जगह संतजनों का स्वागत किया गया

ब्यावरा. पुण्य के साथ ही सभी काम किए जा सकते हैं, पाप से बचा नहीं जा सकता। यदि पाप किया है तो उसकी सजा भुगतनी ही पड़ेगी। पुण्य अगर किया है तो वह जीवन में नजर आएगा भी। इसलिए भगवान की साधना करना चाहिए और ईश्वर के सान्निध्य में रहना चाहिए।

ये बातें नगर विहार पर आए जैन संतों ने बुधवार को श्वेतांबर जैन मंदिर में प्रवचन के दौरान कही। उन्होंने कहा कि धर्म का फल हर कोई चाहता है लेकिन करना कोई नहीं चाहता, पाप का फल कोई नहीं चाहता और करते सभी हैं। दिगंबर जैन समाज के संत आचार्य विशुद्ध सागर के शिष्य प्रणुत सागर, साध्य सागर और संपूर्ण सागर का नगर आगमन सुबह 10 बजे हुआ।

उनकी अगवानी के लिए बाइपास चौराहा पर समाज के लोग पहुंचे। ढोल-ताशे के साथ उन्हें नगर विहार करवाया गया। जगह-जगह पुष्पों से संतों का स्वागत किया गया, विभिन्न मार्गों से होते हुए वे दिगंबर जैन मंदिर पहुंचे। करीब महीनेभर पहले बुरहानपुर से पैदल यात्रा पर निककले जैन संत चार-पांच दिन इंदौर, फिर सात दिन उज्जैन रुके।

फिर देवास से लगे सोनकच्छ के पुष्पगिरि तीर्थ स्थल पहुंचे। यहां सेवा-आराधना करने के बाद वे रवाना हुए। मंगलवार को वे करनवास में थे और रात्रि विश्राम ब्यावरा से लगे आईटीआई कॉलेज में किया।

[MORE_ADVERTISE1]

इसके बाद सुबह सूर्योदय के बाद दोबारा विहार पर निकल गए। वे गुरुवार सुबह नौ बजे दिगंबर जैन मंदिर में प्रवचन करेंगे, इसके बाद बीनागंज के लिए रवाना होंगे। विभिन्न नगरों से होते हुए वे सोनगिर (दतिया) अपने गुरुवर विशुद्ध सागरजी से आशीर्वाद लेने पहुंचेंगे। समाज के अध्यक्ष रमेश जैन ने बताया कि इस दौरान बड़ी संख्या में समाजजन मौजूद रहे।

कठिन है जैन धर्म अपनाना, कड़े नियमों का करते हैं पालन
सांसारिक मोह-माया और सुख-सुविधाओं से काफी दूर जैन धर्म को अपनाना बेहद कठिन है। इसके लिए कड़े नियमों का पालन करना होता है। जैन समाज के वरिष्ठजनों के अनुसार उक्त संतों का रूटीन भी काफी कठिन होता है। वे किसी भी प्रकार के वस्त्र का उपयोग नहीं करते।

कड़ाके की ठंड में भी पटिए पर वे सोते हैं और जरूरत पडऩे पर पराल (एक प्रकार का चारा) की चटाई ओढ़ते हैं। सुबह तीन से चार बजे उठकर साधना करते हैं और सूर्योदय के बाद विवार पर निकल जाते हैं।

दोपहर में प्रतिदिन सामयक होते हैं, जिसमें आराधना की जाती है। 24 घंटे में महज एक समय खाना खाते हैं और एक ही समय पानी पीते हैं। प्रत्येक नगर में उनकी अगवानी की जाती है। जहां समाजजन नहीं होते वहां के लिए व्यवस्था पूर्व के नगर वाले ही करवाते हैं या साथ ही जाते हैं।

[MORE_ADVERTISE2]