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अइसे बनथे भगवान

Gulal Prasad Verma

Publish: Oct 25, 2019 17:27 PM | Updated: Oct 25, 2019 17:27 PM

Raipur

नानकीन किस्सा

दस बछर के अनाथ लइका ह जेठ के महीना म अंगरा कस तिपे भोंभरा म मंदिर करा उखरा गोड़ फूल बेचत रहय। मंदिर अवइया सरद्धालुमन वोकर तीर ले फूल बिसा के भगवान म चढ़ावत जाय। एकझन फूल लेवइया सरद्धालु ह लइका ल उखरा पांव देख के पनहीं लान के वोला पहिना दिस। लइका ह वो मनखे ल पोटार के कहिथे- तैं भगवान अच का? मनखे कहिथे- नइ बेटा, मेहा भगवान-उगवान नोहंव। लइका कहिथे- तैं भगवान नोहच त भगवान के संगवारी जरूर होबे। काबर आजेच बिहनिया घर ले निकले के बेर मेहा भगवान के फोटू करा हाथ जोड़ के बिनती करे रेहेंव, हे भगवान मोर बर एक जोड़ी पनही लेवा दे। तैं भगवान होबे, नइते भगवान के संगवारी होबे। वोहा तोला मोर करा पठोय होही। तभे तैं मोर बर पनहीं लान के देय हच।
लइका के बात ल सुन के वो मनखे मनेमन म गुने लगिस। का भगवानमन अइसने करथें। तब तो भगवान बनई कोनो कठिन काम नोहय। तभे तो सुवामी विवेकानंद ह कहे हे- 'कहूं तुमन के परोसी भूख मरत हे त मंदिर म मिठई चढ़ई ह अबिरथा हे।Ó
लइका के बात ल सुन के वो मनखे मनेमन म गुने लगिस। का भगवानमन अइसने करथें। तब तो भगवान बनई कोनो कठिन काम नोहय। तभे तो सुवामी विवेकानंद ह कहे हे- 'कहूं तुमन के परोसी भूख मरत हे त मंदिर म मिठई चढ़ई ह अबिरथा हे।Ó

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