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आपका एक मिनट बचा सकता है किसी की जिन्दगी

Jaya Sharma

Publish: Sep 10, 2019 16:53 PM | Updated: Sep 10, 2019 16:53 PM

Patrika plus

अगर कोई बार-बार सुसाइड की धमकी दे रहा है तो न करें अनदेखी

वल्र्ड सुसाइड प्रिवेंशन डे आज

जयपुर. फैमिली मेम्बर्स, फै्रंड्स या फिर कलीग के लिए आपके द्वारा रोजाना दिया गया एक मिनट न केवल उनकी जिंदगी को बदल सकता है बल्कि किसी अनहोनी को भी टाल सकता है। वल्र्ड सुसाइड प्रिवेंशन डे हर वर्ष १० सितंबर को मनाया जाता है। इसका उद्देश्य सुसाइड को रोकना है। इंटरनेशनल एसोसिएशन फॉर सुसाइड प्रिवेंशन की ओर से जारी निर्देश में कहा गया है कि आपके एक मिनट से किसी लाइफ की बच सकती है। एसोसिएशन की ओर से वल्र्ड सुसाइड प्रिवेंशन डे की थीम 'वर्किंग टूगेदर टू प्रिवेंट सुसाइडÓ रखी गई है। इसका उद्देश्य सुसाइड को रोकथाम के लिए लोगों को एकजुट करना है। इससे जुड़े एक्सपर्ट की मानें तो आप रोजाना एक मिनट अपने जानकार या एक अजनबी के साथ बिताते हैं तो उसके कई फायदे हैं। आप एक मिनट ये जानने कि कोशिश करें कि आपके परिवार, मित्रों और सहयोगियों के साथ क्या चल रहा है। फिर यदि आपको लगता है कि उनकी लाइफ में रुटीन से कुछ अलग है, तो उनसे बात करें। उसे समझाएं और मदद करें।
आंकड़े बताते हैं कि डिप्रेशन से ग्रसित ६० प्रतिशत लोगों को सुसाइड करने की तीव्र इच्छा होती है। उनमें से २० प्रतिशत तो सुसाइड की कोशिश करते हैं। वहीं कुछ तो सुसाइड भी कर लेते हैं। ऐसे में लोगों को डिप्रेशन से दूर करने के लिए उनके साथ समय बिताना बहुत जरूरी है ताकि उनके मन की निगेटिविटी को पॉजेटिविटी में बदलकर आत्महत्या को रोका जा सकता है।

डॉक्टर आर.के.सोलंकी

वल्र्ड सुसाइड प्रिवेंशन डे

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डिप्रेशन के बाद ही अधिकतर सुसाइड के केसेस होते हैं। लोगों को यह पता होना चाहिए कि डिप्रेशन पूरी तरह से सही हो सकता है। इसका इलाज संभव है। जेनेटिक, कमजोर व्यक्तित्व या फिर पारिवारिक कलह, बेरोजगारी, आर्थिक संकट और विफलता डिप्रेशन का कारण बनती है। यही कारण है कि यंगस्टर्स में सुसाइड के केस अधिक हुए हैं। अधिकतर मामलों में देखा गया है कि अगर मरीज के व्यवहार पर ध्यान दिया जाए तो सुसाइड को रोका जा सकता है।
डॉ. आर.के.सोलंकी, मनोचिकित्सक

पहले लोगों में कोऑप्रेशन की भावना अधिक थी। अब लोगों में कॉपीटिशन बढ़ गया है। पैरेंटिंग भी सही नहीं हो रही है। बच्चे में पेशेंस नहीं है। छोटी-छोटी बातों पर मरने-मारने पर उतर जाते हैं। पहले ज्वाइंट फैमिली में बच्चा अपने पैरेंट से नहीं तो चाचा, ताऊ या सिब्लिंग से अधिक जुड़ा होता था। वे अपनी बातें उनसे शेयर कर अपनी समस्या का सामाधान पाता था। उनको हर परिस्थिति से गुजरने का अनुभव मिलता था, जो अब नहीं रहा है।

डॉ. सुनील शर्मा, मनोचिकित्सक, जयपुर

सुसाइड की धमकी को हल्के में न लें

इसका रोगी मनोरंजन वाली चीजों में आनन्द नहीं लेता है। उनसे दूर भागता है। हमेशा थकान महसूस करना और काम न करने की इच्छा बताना, निर्णय न ले पाना और खानपान की आदतों में अचानक बदलाव आना हो सकता है। साथ ही बात-बात में आत्महत्या के लिए धमकी देना और नाराज होकर गलत काम करना, अचानक से किसी बात पर रोने लगना और चिड़चिड़ा होना, नींद न आना यानी अनिद्रा का शिकार होना, स्लीपिंग पैटर्न बदलना आदि लक्षण हो सकते हैं।