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बेटी के लिए किसी पाठशाला से कम नहीं है कामकाजी मां

Anil Kumar Jangid

Publish: Nov 30, 2017 10:01 AM | Updated: Nov 30, 2017 10:01 AM

Parenting

अपने बच्चों और खासकर अपनी बेटी की परवरिश को लेकर कामकाजी मां हमेशा चिंतित नजर आती है

अपने बच्चों और खासकर अपनी बेटी की परवरिश को लेकर कामकाजी मां हमेशा चिंतित नजर आती है लेकिन मां को घर और बाहर की जिम्मेदारी निभाते देख बेटी खुद ही काफी कुछ सीख लेती है। वर्किंग मॉम अक्सर यह सोचती हैं कि वे अपनी बेटी को वे सभी स्किल्स सिखाने के लिए पर्याप्त समय नहीं दे पा रही है, जो जीवन में सफउल होने के लिए जरूरी है। वह दिन के आठ घंटे से ज्यादा घर से बाहर रहती है और दूसरी मॉम की तरह अपनी बेटी को मैथ के टेस्ट और स्पेलिंग्स की तैयारी नहीं करवा सकती। लेकिन सच यह है कि एक वर्किंग मदर के रूप में जो कुछ भी अपनी बेटी को सिखा रही है, वह किताबी शिक्षा से कहीं ज्यादा महत्व रखता है।

पहली सीख
पैशन महत्वपूर्ण है
बेटी के शुरुआती सालों में ही उसकी रुचि पहचानी जा सकती है। हो सकता है अपनी रुचि को वह बड़ी होकर गंभीरता से न ले लेकिन कम से कम उसे यह पता होगा कि अपनी रुचि को प्रोफेशन में बदला जा सकता है। आज भी बहुत सी लड़कियां ऐसी हैं, जो समाज की उम्मीदों के चलते माइक्रोस्कोप की जगह लिपस्टिक को चुनती हैं। ऐसे में आप भले ही साइंस फील्ड में न हों लेकिन अपनी बेटी के लिए आप एक मिसाल हैं, जिसने अपने पैशन को कॅरियर में बदला।

दूसरी सीख
मां भी पिता जितनी सक्षम है
अब माता और पिता की अलग-अलग भागों में बंटी भूमिकाओं का अस्तित्व बदल रहा है और उनकी सख्त पालना में भी अब ढिलाई देखी जा सकती है। अब अकेले पिता पर आर्थिक जिम्मेदारियों का बोझ नहीं है। यह जिम्मेदारी मां भी उतनी ही गंभीरता से उठा रही है और घर की आय और निर्णय लेने में अपना बराबर का योगदान दे रही है। अपनी मां को ऐसा करते देख आपकी बेटी यह जान लेगी कि उसकी मां का महत्व पिता से कम नहीं है।

तीसरी सीख
कामकाजी मां की बेटी होने के नाते वह अपने पिता को भी एक अलग दृष्टि से देख पाएगी, जो घर के काम बखूबी निभाते हैं। वह अपनी कामकाजी मां को देखकर यह समझ पाएगी कि समय की कमी के चलते वे घर के पूरे काम अकेले नहीं संभाल सकतीं और इसके लिए पति से मदद की उम्मीद रखती हैं। आप भी चाहती हैं कि आपकी बेटी यह व्यवस्था समझे और भविष्य में अपने पति से मदद की मांग करे। आखिरकार घर दोनों की जिम्मेदारी है।

किसी पर निर्भर नहीं होना
खुद की व घर की जरूरतों को स्वयं पूरा करने में मां को समर्थ देखकर निश्चित ही बेटी भी आत्मनिर्भरता का महत्वपूर्ण पाठ सीखेगी। वह सीखेगी कि उसे भी अपनी जरूरतों को पूरा करने के लिए आत्मनिर्भर बनना होगा। अपने पिता के साथ-साथ मां को घर के बिल भरते देख वह भी जानेगी कि आगे चलकर उसकी जरूरतों और इच्छाओं को पूरा करने के लिए उसे खुद को सक्षम बनाना होगा और किसी दूसरे पर निर्भर नहीं रहना होगा।

पांचवीं सीख
खुद चुनाव करना
आपको देखकर जो सबसे महत्वपूर्ण सीख आपकी बेटी सीखेगी, वह यह है कि जीवन में कौनसी राह चुननी है, इसका फैसला लेने का पूरा हक उसको है। वह घर पर रहकर अपने बच्चों की देखभाल करना चाहती है या कॅरियर बनाना चाहती है या दोनों के बीच का रास्ता चुनना चाहती है। उसे अपने सपने को पूरा करने की पूरी आजादी होगी और वह जो फैसला लेगी, अपनी खुशी के लिए लेगी।

बच्चे वयस्क हो रहे हैं आपको याद रहता है न?
बच्चों में शारीरिक विकास के चरणों में वैसे तो सभी चरण महत्वपूर्ण होते हैं पर वयस्क होने का चरण बहुत खास होता है। यही वह समय होता है, जब बच्चा या बच्ची अपने शरीर में होने वाले एकदम नए परिवर्तनों से परिचित होते हैं। हार्मोनों का उत्सर्जन शारीरिक तौर पर बच्ची को वयस्क महिला और बच्चे को वयस्क पुरुष बनाने का काम कर रहा होता है। शरीर में आ रहे परिवर्तनों के प्रभाव से उनका मानसिक क्षेत्र अछूता नहीं रह पाता, भावनात्मक स्तर पर भी वे उथल-पुथल का सामना कर रहे होते हैं। ऐसे में माता-पिता की जिम्मेदारी भरण-पोषण, लाड़-प्यार, डांट-फटकार से कहीं बहुत आगे बढ़ जाती है। हमारे समाज में अधिकांशत: इन परिवर्तनों को, इनके बच्चे पर असर को हल्के में लिया जाता है, माता-पिता का व्यवहार बच्चों के प्रति उनमें होने वाले परिवर्तनों के अनुपात में नहीं बदलता है, जो कि बदलना चाहिए। बच्चों का वयस्क होना सामान्य जरूर है, लेकिन नजरअंदाज करने या फिर हल्के में लिए जाने लायक नहीं है।

नाजुक है यह समय...
प्यूबर्टी का यह समय बच्चों के लिए बहुत नाजुक समय होता है, उन्हें समझ नहीं आता कि उनके साथ ये सब क्या हो रहा है। कुछ लोग उनमें होने वाले परिवर्तनों को घोषित तौर पर नजर गढ़ा कर देखते हैं और कुछ उनके सामने ही टिप्पणी भी कर देते हैं। बच्चों को यह पता ही नहीं होता कि उन्हें इन सब बातों से कैसे निपटना है, कैसे पेश आना है। एक तो वैसे ही उनका मन अपनी उलझनें सुलझाने में लगा रहता है, उस पर लोगों का व्यवहार! कितनी असहज बातों व स्थितियों का सामना करना पड़ता है उन्हें।

उनके शारीरिक परिवर्तनों को लेकर कैसी भी टीका टिप्पणी न करें, हमेशा सकारात्मक भाव ही दिखाएं। इन परिवर्तनों को लेकर मजाक न करें, न किसी को करने दें।

परिवर्तन माता-पिता भी करें...
बच्चों के जीवन में इस परिवर्तन के दौर के आने पर भी कई बल्कि, अधिकतर माता-पिता उनसे वैसा ही व्यवहार करते रहते हैं, जैसा अभी तक करते आ रहे थे। बच्चे जैसे अब तक डर कर कोई बात मान लेते थे, वैसे ही अब भी मान जाएं, माता-पिता की यह अपेक्षा भी बनी रहती है। क्या किसी वयस्क व्यक्ति से किसी भी बात को जस का तस मानने की उम्मीद की जा सकती है? नहीं न, तो फिर वयस्क हो रहे बच्चों से क्यों? माना बच्चे माता-पिता के सामने बच्चे ही होते हैं पर इसका मतलब यह नहीं कि उनके साथ हमेशा शैशवावस्था और पूर्व किशोरावस्था वाला व्यवहार ही किया जाता रहे। ज्यादातर मामलों में माता-पिता अपने व्यवहार के बारे में तब चेतते हैं, जब बच्चे उग्र प्रतिक्रिया देना शुरू का देते हैं या फिर घुन्ने हो जाते हैं।

लड़का-लड़की बराबर...
हमारे समाज में लड़कियों के वयस्क होने के काल को लेकर संरक्षण की प्रवृत्ति पाई जाती है, किन्तु लड़कों के इस काल में उनके साथ जो व्यवहार किया जाना चाहिए, वह नहीं किया जाता। यह तो लड़का है, इसका क्या बिगड़ेगा...यह वास्तव में लड़कों को बेसहारा छोडऩे देना जैसा है। पता नहीं क्यों, हम यह भी भूल जाते हैं कि लड़का भी तो बच्चा ही होता है, उसके मन में भी दाढ़ी-मूंछ आने, आवाज में बदलाव आने व प्रजनन अंगों में आने वाले बदलावों को लेकर सवाल होते हैं, सवालों को लेकर झिझक होती है, उसे भी माता-पिता, परिवार से संरक्षण की जरूरत होती है। लड़के के वयस्क होने के दिनों में उसे उसके हाल पर छोड़ देना उचित नहीं है। उसे भी उचित जानकारी व दोस्ताना व्यवहार का अधिकार है।

खुल कर बात करें...

ऐसे बच्चों से, जिनमें हार्मोन परिवर्तन अभी शुरू ही हुआ है, खुल कर बात करना आरंभ कर दें। बेहतर तो यह है कि जब लड़का या लड़की में प्यूबर्टी के आरंभिक लक्षण दिखाई देने लगें, तब ही उनको एक- एक कर के उस-उस लक्षण के बारे में बताना शुरू कर दें, जो-जो लक्षण आता जा रहा है। बच्चे की समझ धीरे-धीरे विकसित होती है, उसको आरंभ में ही अपनी ओर से एक साथ सारी जानकारी देने की आवश्यकता नहीं है। हां, यदि वह कोई प्रश्न करता है तो उसकी उम्र के हिसाब से जवाब दिया जा सकता है। वयस्क होने के क्रम में लड़की या लड़का कुछ पूछते हैं तो उन्हें खुल कर बताया जा सकता है। लड़कियों को विशेषकर मासिक धर्म आदि के बारे में पूर्व जानकारी दे देनी चाहिए।

कभी न करें अपमान...
इस समय मानसिक तौर पर भी बच्चे अपने व्यक्तित्व की... अपने वजूद की अलग पहचान को समझने लगते हैं और पहचान बना रहे होते हैं। हालांकि उनमें आत्मसम्मान की भावना हमेशा से होती है पर उतनी मुखर और स्पष्ट नहीं होती, जितनी अब होने लगती है। दूसरे शब्दों में कहें तो उनमें 'मैंÓ का बोध जगने लगता है। इसलिए ध्यान रखें कि उनसे कोई भी अपमानजनक व्यवहार न करें, गलती से भी उन्हें ऐसी बात न बोलें, जो उनके आत्मसम्मान पर चोट पहुंचाए, दूसरों के सामने इसका विशेष ध्यान रखें। अगर कभी ऐसा व्यवहार हो भी जाए तो बात संभाल लें, उनसे माफी मांग लें। बच्चों को बातचीत का माहौल दें।

गुड टच, बैड टच...
वैसे तो आजकल कम उम्र के बच्चों में भी गुड और बैड टच के बारे में जानकारियां बांटी जा रही हैं पर वयस्क होने के समय में लड़का और लड़की, दोनों को ही थोड़ा विस्तार से इसकी जानकारी देनी चाहिए। लड़के भी यौन बदतमीजियों का कम शिकार नहीं होते। सामान्यतया वे समझ नहीं पाते और किसी को बता भी नहीं पाते। उनको लैंगिक संवेदनशीलता व समानता के बारे में इस उम्र में ही सबसे अच्छी तरह से समझाया जा सकता है। बढ़ती बच्चियों के साथ छोटी या बड़ी यौन अपव्यवहार की घटनाएं बहुत होती हैं, उनको व लड़कों दोनों को ही सावधानियां सिखानी चाहिए।