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VIDEO : आठवीं पास किसान का कमाल : पुरखों की संजोई विरासत को देखने विदेशी सैलानी भी लालायित

Rajkamal Vyas

Publish: Sep 20, 2019 22:35 PM | Updated: Sep 20, 2019 22:35 PM

Pali

- अब तक 65 देशों से विदेशी सैलानी इस सम्पदा को निहारने पहुंचे
- पाली जिले के छोटे से गांव चाणोद के ऐतिहासिक वैभव को बढ़ा रही बहुमूल्य विरासत

राजकमल व्यास/शेखर राठौड़
पाली। आधुनिकता की चकाचौंध से कोसों दूर खेतीबाड़ी में जुटे एक किसान के जुनून का ही कमाल है कि सात समंदर पार से विदेशी सैलानी उसके गांव चाणौद पहुंच रहे हैं। इतना ही नहीं, उसकी तारीफ करते भी नहीं थक रहे। यह सब संभव हो पा रहा है किसान के अनूठे संग्रह से, जिसे उसके पूर्वजों ने सैकड़ों सालों से सहेज कर रखा था। हम बात कर रहे हैं कि पाली जिले में आबाद चाणोद की, जो है तो एक छोटा सा गांव हीए लेकिन इसका ऐतिहासिक वैभव भी कम नहीं है। अब इस पुरातन वैभव को गांव के ही एक किसान अचलाराम सोलंकी ने और ज्यादा उजियारा बनाने का जतन किया है।

सालों तक लक्ष्मी पूजन तक ही सीमित रहा पुरातन वैभव
ऐसा भी नहीं है कि मुगल काल से ब्रिटिशयुगीन मुद्राओं का संग्रह किसान ने अभी हासिल किया है। ये तो वंश दर वंश चलता आ रहा है। लेकिन, ये अनूठी विरासत साल में एक बार ही बाहर आती थी, वो भी दीपावली पर लक्ष्मी पूजन के लिए। कुछ साल पहले जब उन्होंने लक्ष्मी पूजन में ये अनूठी विरासत रखी तो उनके पुत्रों ने सुझाव दिया कि क्यों ना इस विरासत को युवा पीढ़ी से रूबरू कराया जाए। चूंकि इनके बेटे तो दिसावर में व्यवसायरत है। ऐसे में अचलाराम ने ये बीड़ा उठा लिया और कुछ नया करने की जुगत में ऐसा जुनून सवार हुआ कि अब हर पल वे ये ही सोचते रहते हैं कि कैसे वे युवा पीढ़ी को आकर्षित कर सके और उन्हें बता सके कि तत्कालीन युग में कागज नहीं, वरन सोने, चांदी और कांस्य की मुद्राएं चलती थी।

मुगल काल का वैभव बयां करती मुद्राएं
अचलाराम के पुरखों ने जो पुरा सम्पदा सहेज कर रखी थी, उनमें मुगल काल की वे मुद्राएं भी शामिल है, जो अब प्रदर्शनियों में ही देखने को मिलती है। ये मुद्राएं अरबी में उक्केरित हैए जो चांदी व ताम्बे की है। ये बहुतायत में है और तत्कालीन वैभव को बयां करते हैं। इनके जरिए ही तब व्यापार होता था। अचलाराम का दावा है एक सिक्का इनमें सोने का भी हैए जो मुगल शासक ने जारी किया था। हालांकिए इसकी पुष्टि करना मुश्किल है। एक ताम्र पत्र भी शामिल है, जो इनके पूर्वजों को दिया गया था।

इस्ट इंडिया कम्पनी और ब्रिटिश राज के अलग-अलग चले सिक्के
अंग्रेजों के शासनकाल में भारत में दैनिक खरीदारी व बिकवाली के लिए जो मुद्राएं चलती थी, वे दो चरणों में अलग-अलग जारी हुई थी। 1835 से 1858 का वो दौर था, तब भारत में इस्ट इंडिया कम्पनी के जरिए भारत में व्यापार और शासन होता था। तब के सिक्कों पर इस्ट इंडिया कम्पनी का उल्लेख होता था। लेकिन, 1862 से 1947 में भारत की सत्ता पूरी तरह से ब्रिटिश राज के अधीन आ गई थी। तब उन सिक्कों पर से इस्ट इंडिया के बजाय ब्रिटिश एम्पीरियर लिखा जाने लगा। अचलाराम के पास ऐसे सैकड़ों सिक्कों का संग्रह है, जिनमें किंग जॉर्ज पंचम, जॉर्ज षष्टम किंग एम्पीरियर और क्वीन विक्टोरिया के सिक्कों प्रमुख है। यहां वे सोने के सिक्कों भी हैं, जो मुख्य रूप से दो देशों के बीच व्यापार के रूप में काम में आते थे।

विदेशी मुद्राएं मिली उपहार में
इस अनूठे संग्रह को जो भी विदेशी सैलानी देखने आया। वह यहां पर अपने देश की मुद्रा देकर गया। इतना ही नहीं, कई ऐसे सैलानी भी आए, जिन्होंने अपने देश जाने के बाद तत्कालीन व वर्तमान में प्रचलित सिक्कों व नोट खासी तादाद में अचलाराम को भिजवाए, ताकि ये संग्रह और अनूठा बन पड़े। इस मिनी संग्रहालय में जॉर्डन के साथ ही स्विटजरलैण्ड, मैक्सिको, अमरीका, फ्रांस, सिंगापुर, कनाडा, बेल्जियम, चाइना, मलेशिया, पेरू, नीदरलैण्ड, ओमान सहित कई देशों की मुद्राओं का भंडार है।

अपने घर को दिया मिनी संग्रहालय का रूप
गांव के ही एक किसान अचलाराम सोलंकी है, जो आठवीं उत्तीर्ण ही है। रोजी-रोटी का जरिया भी खेती बाड़ी ही है। लेकिन, पुरखों से मिली सम्पदा को अक्षुण्ण रखा। अब इसे विरासत से युवा पीढ़ी को रूबरू कराने के लिए अपने घर को मिनी संग्रहालय का रूप दे दिया है। इसमें मुगलकाल में प्रचलित मुद्राओं से लेकर ब्रिटिश युगीन शासन में प्रचलित मुद्राओं का संग्रह कर रखा है। इतना ही नहीं, कई विदेशी मुद्राएं भी इसमें शामिल है। खास बात तो ये है कि जो भी विदेशी सैलानी इस अनूठे संग्रह को निहारने यहां आते हैं, वे बदले में अपने देश की वर्तमान के साथ ही प्राचीन काल में प्रचलित मुद्राएं भी देकर जाते हैं, ताकि ये अनूठा संग्रहालय और ज्यादा आकर्षक बन पड़े।

इतिहास के पन्नों से
चाणोद एक हजार साल से भी पुराना गांव है। ये मेड़तिया राजपूतों की राजधानी रहा है। यहां के राजवंश का सम्बन्ध राव दुदाजी से भी है। माना जाता है कि इन्हीं के राजवंश में हुए प्रतापसिंह को उदयपुर के महाराणा सांगा ने 16वीं शताब्दी में चाणोद का पट्टा दिया था। चाणोद ठिकाने को प्रथम श्रेणी के जुडिशियल पावर प्राप्त थे और ठिकाने की निजी पुलिस थी।