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चुनावी बजट

Dilip Chaturvedi

Publish: Feb 03, 2019 19:38 PM | Updated: Feb 03, 2019 19:38 PM

Opinion

बात सिर्फ मोदी सरकार की नहीं है, हर राजनीतिक दल आज येन-केन-प्रकारेण मतदाताओं को लुभाकर अपनी राजनीतिक रोटियां सेकने से परहेज नहीं करता।

लंबे इंतजार के बाद आखिर केन्द्र सरकार का आखिरी बजट आ ही गया। चुनावी साल है, लिहाजा मोदी सरकार के इस बजट को 'चुनावी बजट' कहा जाए तो शायद कुछ गलत नहीं होगा। गांव से लेकर गरीब, किसान से लेकर मजदूर और वेतनभोगियों को खुश करने की कवायद मतदाताओं को लुभाने का 'प्रयास' माना जाए तो भी शायद गलत नहीं होगा। कहने को बजट अंतरिम था, लेकिन इसमें चुन-चुनकर मतदाताओं पर फोकस किया गया। आयकर में छूट की सीमा बढ़ाने की मांग लंबे समय से हो रही थी, लेकिन चुनावी साल में इसे ढाई लाख से बढ़ाकर पांच लाख किया जाना मध्यम वर्ग को आकर्षित करने की कोशिश ही माना जाएगा।

वित्त मंत्री ने अपने बजट भाषण में महंगाई पर लगाम लगाने की बात कहने के साथ वर्ष 2022 तक सभी को घर मुहैया कराने का वादा एक बार फिर दोहराया। उन्होंने 'आयुष्मान भारत योजना' की चर्चा भी की, तो किसानों की खुशहाली लाने का उल्लेख भी किया। चुनाव में किसान सबसे बड़ा मतदाता होता है। राजस्थान, मध्यप्रदेश और छत्तीसगढ़ में भाजपा की हार से सबक लेते हुए बजट में 12 करोड़ किसानों को हर साल छह हजार रुपए देने का भी ऐलान किया गया। देश की सुरक्षा के लिए रक्षा बजट तीन लाख करोड़ रुपए करने की घोषणा भी बजट में की गई। बजट भाषण में 'वन रैंक-वन पेंशन' की चर्चा भी जोर-शोर से की गई।

गांव की सड़कों के लिए 19 हजार करोड़ रुपए खर्च करके गांव में रहने वालों को प्रभावित करने के प्रयास को भी चुनाव से जोड़कर ही देखा जा रहा है। गायों के कल्याण के लिए 'कामधेनु योजना' स्थापित करने की घोषणा भी की गई। आखिरी साल में सही, सरकार को गोमाता के सम्मान का ध्यान आया, इसका स्वागत किया जाना चाहिए। असंगठित क्षेत्र के श्रमिकों को खुश करने का ध्यान भी बजट में रखा गया। पन्द्रह हजार से कम मासिक वेतन पाने वालों के लिए60 साल की आयु के बाद तीन हजार रुपए की न्यूनतम पेंशन योजना की भी घोषणा बजट में की गई। कहा जा सकता है कि अंतरिम बजट के बहाने चुनावी साल में मतदाताओं को प्रभावित करने का कोई भी अवसर सरकार ने नहीं छोड़ा। यहां बात सिर्फ मोदी सरकार की ही नहीं है, देश का हर राजनीतिक दल आज येन-केन-प्रकारेण मतदाताओं को लुभाकर अपनी राजनीतिक रोटियां सेकने से परहेज नहीं करता। चुनाव पहले भी होते थे और हार-जीत भी। लेकिन वर्तमान दौर की अधिकतर सरकारों का ध्यान सरकारी खजाने के दम पर वोट बैंक बनाने पर ही रह गया है।

सरकार के आखिरी बजट को राजनीतिक दल अपने नजरिए से देखेंगे तो अर्थशास्त्री अपने तरीके से। हर सरकार को अपने तरीके से बजट पेश करने का अधिकार होता है। भारत एक लोकतांत्रिक देश है, इसलिए सरकार के कामकाज पर अंतिम मोहर तो जनता ही लगाती है। यह भी सत्य है कि महज लोक-लुभावन घोषणाओं के दम पर कोई भी दल चुनाव नहीं जीत सकता है। ऐसा होता तो कोई भी सरकार कभी चुनाव हारती ही नहीं। आगामी लोकसभा चुनाव में मतदाता मोदी सरकार के पांच साल के काम के आधार पर ही फैसला करेंगे, न कि बजट से प्रभावित होकर।