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कांग्रेस नहीं, विपक्ष की सोचो

Shri Gulab Kothari

Publish: Aug 17, 2019 07:31 AM | Updated: Aug 17, 2019 07:31 AM

Opinion

कांग्रेस कार्य समिति (Congress Working Committee) ने दस अगस्त को श्रीमती सोनिया गांधी (Sonia Gandhi) को पार्टी का अन्तरिम अध्यक्ष घोषित कर दिया। अर्थात् दस अगस्त कांग्रेस के लिए मजबूरी का दिन बन गया होगा। कांग्रेस पार्टी की 134 वर्षों की इस ऐतिहासिक उपलब्धि को क्या कहा जाए? क्या इस निर्णय में कांग्रेस के भविष्य के प्रति कोई संकेत है?

कांग्रेस कार्य समिति (Congress Working Committee) ने दस अगस्त को श्रीमती सोनिया गांधी (Sonia Gandhi) को पार्टी का अन्तरिम अध्यक्ष (interim president) घोषित कर दिया। अर्थात् दस अगस्त कांग्रेस के लिए मजबूरी का दिन बन गया होगा। कांग्रेस पार्टी की 134 वर्षों की इस ऐतिहासिक उपलब्धि को क्या कहा जाए? क्या इस निर्णय में कांग्रेस के भविष्य के प्रति कोई संकेत है? इतनी पुरानी, इतनी बड़ी और इतने लम्बे शासनकाल वाली पार्टी के पास आज खाने को चने ही नहीं हैं! पूरे देश में एक व्यक्ति भी पार्टी को नेतृत्व देने लायक नहीं है? क्यों बार-बार एक ही परिवार के लोगों का नाम पुकारा जाता है? राहुल गांधी की घोषणा स्वागत योग्य है। उन्होंने समय की चाल को समय रहते पहचान लिया। जनता में वे अपना वर्चस्व अथवा नेतृत्व स्थापित नहीं कर सके। जैसे उन्होंने परिस्थिति को भांप लिया, अन्य लोग क्यों नहीं भांप सके? क्या डूबती नाव की पतवार गांधी परिवार के हाथ में सौंपकर स्वयं को मुक्त रख पाने का प्रयास है यह ? अथवा माना जा रहा है कि कांग्रेस की तरह देश आज भी उनके नेतृत्व से आश्वस्त हो सकेगा! क्या कांग्रेस के अन्य नेता सरकार की कार्रवाई के डर से आगे नहीं आना चाहते! पिछले लोकसभा चुनावों में क्यों कांग्रेसी नेता प्रचार अभियान से नदारद थे? दबी जुबान से कहते तो थे ही।

कांग्रेस अध्यक्ष पद पर आज पुन: गांधी परिवार का प्रतिष्ठित होना, चाहे अन्तरिम ही क्यों न हो, शुभ संकेत नहीं है। इतने बड़े देश और इतनी बड़ी संसद में विपक्षी दल का जो स्वरूप होना चाहिए, तस्वीर ठीक विपरीत दिखाई पड़ रही है। जहां एक सशक्त व्यक्ति नहीं है, वहां सशक्त विपक्ष कैसे संभव हो सकेगा? हाल ही जम्मू-कश्मीर पर अनुच्छेद 370 पर बहस में जो भूमिका देश ने देखी, उससे तो देश में विपक्ष की दृष्टि से लोकतंत्र सुरक्षित हाथों में नहीं कहा जा सकता।

कांग्रेस वैसे भी सफेदपोश लोगों का दल रह गया। चापलूस रह गए। भाषण देने वाले रह गए। हर व्यक्ति स्वतंत्र सत्ता बन गया हो, ऐसा लगता है। यही आन्तरिक फूट एवं बिखराव का कारण है। किस प्रकार की छींटाकशी सुनाई दे रही है, आपस में! कांग्रेस के कर्णधार माने जाने वाले कितने ही नेता भाजपा के समर्थन में चले गए। क्या उनको बिकाऊ कहेंगे? नहीं ! जब जड़ों में कीड़े लग जाते हैं, तो पत्ते भी झडऩे लगते हैं। वैसे भी पिछले दशकों में कांग्रेस ने पत्तों पर ही छिडक़ाव किया है। जड़ें पार्टी के बजाए एक ही परिवार के हाथ में रहीं। जमीन से बाहर आ गईं। कांग्रेस की गलतफहमी शीघ्र ही दूर हो जाएगी कि सोनिया गांधी अब संजीवनी नहीं दे सकतीं।

क्या कांग्रेस को देश के लोकतंत्र की जरा भी चिन्ता है? विपक्ष के रूप में, देश के सामने कोई विकल्प भी नहीं नजर आ रहा। यही देश की मजबूरी भी है। सारी क्षेत्रीय पार्टियां भी भ्रष्टाचार के रिकार्ड बना-बनाकर सिमटने लगी हैं। ऐसी स्थिति में कांग्रेस का बेहोश हो जाना आत्मघाती स्थिति ही कही जाएगी। देश के लिए कांग्रेस का होना अनिवार्य है। सशक्त होना शान की बात होगी। आज पुन: सोनिया जी का आना गरीबी में आटा गीला होना ही है।

डर गांधी परिवार के मन में भी हो सकता है। पद छोड़ते ही अनेक तरह की कार्रवाईयां भी शुरू हो सकती हैं। राबर्ट वाड्रा के विरुद्ध चल ही रही हैं। नेशनल हेराल्ड का मुद्दा अभी बन्द नहीं हुआ है। राजनीति में इन सबकी तैयारी भी होनी चाहिए। आने वाला समय क्या करेगा, आज कौन कह सकता है? देशहित में सब कुछ स्वीकार होना चाहिए। कांग्रेस का होना और विपक्ष का सशक्त होना ही देशहित है। गांधी परिवार को पार्टी को सर्वोपरि मानकर इस बारे में शीघ्र ही देश को आश्वस्त करना चाहिए।

पार्टी को यहां तक किसने पहुंचाया, इसका ईमानदारी से, बिना पूर्वाग्रह के आकलन होना चाहिए। किन-किन कारणों से कहां-कहां हार खानी पड़ी। कौन आस्तीन के सांप रहे। सत्ता के दौरान किन-किन नेताओं, निर्णयों एवं आचरण के कारण नुकसान उठाना पड़ा। आज कहां खड़े हैं, कहां होना चाहिए। कौन दे सकता है यह नेतृत्व ? कम से कम प्रियंका एवं राहुल तो नहीं दे सकते। अनुभव, लीडरशिप, सत्तर के नीचे उम्र और स्वच्छ छवि वाला। कम से कम चार-पांच ऐसे नेता तैयार करें। कांग्रेस में इन्दिरा गांधी ने भी किसी को तैयार नहीं किया। न राजीव ने, न सोनिया गांधी ने। इसकी सजा आज कांग्रेस ही नहीं पूरा देश भोग रहा है। कांग्रेस आज भी इसको केवल पार्टी की समस्या ही मानकर चल रही है।

देश के सामने एक बड़ा प्रश्न यह भी है कि क्यों सारे नेता गांधी परिवार को ही चाहते हैं? कितने नाम चर्चा में आए, नकार दिए गए। क्यों? क्या मल्लिकार्जुन खडग़े, श्रीमती मीराकुमार, वीरप्पा मोइली जैसे कोई नाम इस लायक नहीं माने गए? कोई लोकसभा अध्यक्ष, कोई सदन में विपक्ष का नेता, तो कोई-कोई, बड़े-बड़े अनुभव वाले भी इस दौड़ में ठहरने लायक नहीं हैं। एक बात तय है-नया अध्यक्ष जो भी होगा, स्वतंत्र निर्णय लेने वाला ही होना चाहिए। नहीं तो डूबती नाव में एक छेद और हो जाएगा।