बजट और पारदर्शिता

Dilip Chaturvedi

Publish: Feb 03, 2019 19:14 PM | Updated: Feb 03, 2019 19:14 PM

Opinion

अपनी ही जनता से जानकारी छुपाना न तो लोकतंत्र में जायज है और न ही इसका सार्थक लाभ सरकारों को मिल पाता है।

लोकतांत्रिक गरिमा का तकाजा यही है कि सरकार कार्यकाल के अंतिम वर्ष में अंतरिम बजट ही पेश करे और नई सरकार के लिए पूर्ण बजट लाने का रास्ता छोड़ दे। केंद्र सरकार ने भी ऐसा ही करने की घोषणा करते हुए उन आशंकाओं को खारिज करने की कोशिश की है जिनमें कहा जा रहा था कि चुनावी लाभ लेने के लिए मोदी सरकार इस बार पूर्ण बजट ला सकती है। ऐसी आशंकाओं की वजह यही है कि पूर्ववर्ती सरकारें भी अंतिम वर्ष में कमोबेश ऐसा ही खेल खेलती रही हैं। अंतरिम बजट का मतलब यही होता है कि सरकार नई योजनाओं की घोषणा से बचे और सिर्फ बचे हुए महीनों के कामकाजी खर्च के लिए संसद की मंजूरी ले। अंतरिम बजट ही लाने की घोषणा के बावजूद सरकार की तैयारियों के कारण अब भी पक्के तौर पर नहीं कहा जा सकता कि शुक्रवार को संसद में पेश होने वाले बजट में आदर्श परंपरा का पालन किया ही जाएगा। देश की अर्थव्यवस्था में तेजी लाने व रोजगार के मौके पैदा करने में वर्तमान सरकार का अपेक्षित सफलता हासिल न करना भी यह समझने की बड़ी वजह है कि सरकार अंतिम गेंद पर छ***** मारने से नहीं चूकना चाहेगी। पिछले बजट में स्वास्थ्य बीमा योजना 'आयुष्मान भारत' की घोषणा कर सरकार ने देश को चौंकाया था। तब भी इस बात की आलोचना हुई थी कि बजटीय प्रावधान किए बगैर ऐसी घोषणा का कोई औचित्य नहीं है।

पारदर्शिता वह लोकतांत्रिक औजार है, जिसका उचित तरीके से इस्तेमाल किया जाए तो सरकारें बेवजह की अटकलों पर विराम लगा सकती हैं। अपनी ही जनता से जानकारी छुपाना न तो लोकतंत्र में जायज है और न ही इसका सार्थक लाभ सरकारों को मिल पाता है। गोपनीयता बरतना ब्रितानी हुकूमत की जरूरत थी, जिसने हमें गुलाम बनाया था। आजादी के बाद ब्रितानी हथकंडे को ही आगे बढ़ाना दरअसल जनता को गुलाम समझने की सोच को आगे बढ़ाना है। जानकारी सार्वजनिक न करने से क्षुब्ध सांख्यिकी आयोग के दो सदस्यों का इस्तीफा दर्शाता है कि मोदी सरकार को भी सूचनाएं साझा करने से परहेज है। नेशनल सैम्पल सर्वे कार्यालय के लीक हुए आंकड़ों से पता चलता है कि 2017-18 में बेरोजगारी दर 45 सालों (1972-73 के बाद) में सबसे ज्यादा है। बात सिर्फ बेरोजगारी की ही नहीं है। किसानों की आत्महत्याओं, अन्य पिछड़ा वर्ग से संबंधित जातीय आंकड़े, राष्ट्रीय पोषण सर्वेक्षण रिपोर्ट और विदेशी निवेश के आंकड़ों पर भी सरकार कुंडली मारे बैठी है। नोटबंदी के बाद जमा कराए गए नोटों की जानकारी सार्वजनिक होने पर कालेधन को रोकने के सरकार के दावे भी सरासर गलत साबित हुए थे। क्या सरकार वाकई इस बात से डर रही है कि अन्य आंकड़े जारी हो गए तो फजीहत हो जाएगी? तब भी जानकारी रोकना उचित नहीं माना जाएगा। इसके विपरीत, आंकड़े जारी कर सरकार अटकलों पर विराम लगा सकती है। इससे सरकार की मंशा पर लगने वाले प्रश्नचिह्न भी हटाए जा सकेंगे। बजट अंतरिम ही क्यों न हो, सरकार के पास एक मौका तो है कि वह देश को कठोर सच्चाइयों से रू-ब-रू कराए। बजटीय प्रावधान भले ही कामचलाऊ हों, पर नीयत देश को दूर तक ले जाने वाली होनी चाहिए।