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मत प्रतिशत का अतिवादी आकलन

Dilip Chaturvedi

Publish: May 16, 2019 14:50 PM | Updated: May 16, 2019 14:50 PM

Opinion

राष्ट्रीय स्तर पर यह चुनाव नरेन्द्र मोदी हटाओ और नरेन्द्र मोदी बनाए रखो के बीच केन्द्रित है। इसको आप विचारधाराओं की लड़ाई भी कह सकते हैं। मोदी एक विचारधारा के प्रतीक हैं। लोगों से पूछिए तो ज्यादातर मोदी के पक्ष या विपक्ष मेें ही बात करते हैं।

अवधेश कुमार, वरिष्ठ पत्रकार

लोकसभा चुनाव के 6 चरणों की समाप्ति के साथ 484 सीटों का मतदान संपन्न हो चुका है। अब केवल 59 सीटें शेष हैं। अब तक हुए कुल मतदान को यदि मिला दें तो 2014 के आसपास है। अब तक करीब 66 प्रतिशत वोट पड़े हैं, जबकि 2014 में यह 66.4 प्रतिशत था। इसलिए यह कहना गलत है कि मतदाता उदासीन हैं। हालांकि मतदान चरण दर चरण घटता गया है। छठे चरण में 63.49 प्रतिशत मतदान हुआ है। 11 अप्रेल से आरंभ चुनाव के पहले चरण में 69.50, दूसरे चरण में 69.44, तीसरे में 68.40, चौथे में 65.51 तथा पांचवे चरण में 63.4 प्रतिशत मतदान हुआ। तो क्या यह माना जाए कि धीरे-धीरे लोगों की अभिरुचि मतदान में घट रही है या फिर इसका कोई क्षेत्रीय रिश्ता है या कुछ और?

मतदान प्रतिशत से मतदाताओं की सोच, रुझान तथा मतप्रवृत्तियों का कुछ अनुमान लग जाता है। मतदान प्रतिशत से चुनाव परिणाम का पूर्व आकलन भी चुनाव विश्लेषक कर लेते हैं। किंतु इस बार कुछ अतिवादी आकलन किया जा रहा है। मोटे तौर पर माना जाता रहा है कि अगर मतदान प्रतिशत बढ़ा तो यह सत्तारूढ़ दल या गठजोड़ केखिलाफ जाता था और कम हुआ तो पक्ष मेें। किंतु यह प्रवृत्ति हमेशा नहीं रही है। कई बार मतदान प्रतिशत बढऩे के बाद भी सरकारें पुन: वापस आई हैं तो कई बार मतदान घटने पर सत्ता बदल गई है। 2014 में 66.4 प्रतिशत का रिकॉर्ड मतदान हुआ था जो 2009 से 8 प्रतिशत ज्यादा था और केन्द्र में 30 वर्ष बाद किसी पार्टी को पूर्ण बहुमत मिला था। अभी तक का मतदान अगर राष्ट्रीय स्तर पर मोटे तौर पर उसके आसपास है तो यह सामान्य बात नहीं है। एक बार रिकॉर्ड मतदान होने के बाद उसके आसपास मत ठहरने का मतलब है कि राजनीति और चुनाव में लोगों की अभिरुचि कायम है।

राष्ट्रीय स्तर पर यह चुनाव नरेन्द्र मोदी हटाओ और नरेन्द्र मोदी बनाए रखो के बीच केन्द्रित है। इसको आप विचारधाराओं की लड़ाई भी कह सकते हैं। मोदी एक विचारधारा के प्रतीक हैं। किंतु चुनाव में लोगों से पूछिए तो ज्यादातर मोदी के पक्ष या विपक्ष मेें ही बात करते हैं। कुछ प्रतिशत स्थानीय मुद्दे, उम्मीदवार तथा राज्य सरकारों के संदर्भ मेें जाएगा किंतु कुल मिलाकर मोदी हां और मोदी ना ही है। तब लगभग समान मतदान का अर्थ यह हुआ कि मोदी को लेकर देश में आम निराशा का माहौल नहीं है। अलग-अलग राज्यों में विपक्षी गठजोड़ का असर भी है। तो दोनों ओर के मतदाता निकल रहे हैं। यह एक राष्ट्रीय स्थिति है इसमें एकदम से बिल्कुल सटीक परिणामों की भविष्यवाणी कर देना जोखिम भरा है। राज्यवार मतों की प्रवृत्तियों में भी अंतर है।

उदाहरण के लिए छठे चरण में पश्चिम बंगाल में 80.35 प्रतिशत मतदान हुआ। पश्चिम बंगाल में हर चरण में मत प्रतिशत बदलता रहा है, पर कुल मिलाकर राष्ट्रीय औसत से ज्यादा है। इसमें पहले चरण में 81, दूसरे चरण में 76, तीसरे में 79.36, चौथे में 76 और पांचवे में 63.4 प्रतिशत मतदान हुआ। हालांकि पिछली बार के रिकॉर्ड 82.16 प्रतिशत से कम है। तृणमूल को 80 प्रतिशत सीटों पर भाजपा सीधी टक्कर देती दिख रही है। वामदल एवं कांग्रेस का सीधा मुकाबला कुछ ही सीटों पर है। इसमें भाजपा के मतदाता ज्यादा आ रहे हैं या तृणमूल के, यह कहना कठिन है, पर दोनों ओर से आलोडऩ है तभी इतना मतदान हो रहा है।

सबसे सघन लड़ाई उत्तर प्रदेश में दिख रही है और वहां भी छह चरणों को मिला दें तो लगभग पिछली बार के आसपास यानी 58 प्रतिशत है। हालांकि छठे चरण के 14 लोकसभा क्षेत्रों में 54.74 प्रतिशत ही मतदान हुआ। बिहार में भी मतदान पिछली बार के 56 प्रतिशत के आसपास या कुछ ज्यादा हो सकता है। मध्यप्रदेश में 65 प्रतिशत के आसपास मतदान है जो पिछली बार से 4 प्रतिशत ज्यादा है। राजस्थान के पहले चरण की 13 सीटों पर तो 68 प्रतिशत से ज्यादा रिकॉर्ड मतदान हुआ और दूसरे चरण की 12 सीटों पर भी 63 प्रतिशत से ज्यादा हुआ। इस तरह पिछली बार से मोटे तौर पर दो प्रतिशत अधिक मतदान हुआ है। इस तरह कम से कम मतदान प्रतिशत से यह नहीं कहा जा सकता कि मतदाता उत्साह नहीं दिखा रहे हैं। दिल्ली, मुंबई या कुछ क्षेत्रों को छोड़ दें तो मतदाता बिल्कुल मतदान के प्रति उत्साहित दिखे हैं। 2014 में एक बार उच्चतम स्तर पर मतदान पहुंचने के बाद उसी परिमाण में उछाल मारने का इतिहास दुनिया में शायद ही कहीं हो। उच्च स्तर पर पहुंचने के बाद या तो मतदान उतना ही होगा या उससे कुछ नीचे आएगा।

अतीत की मतदान प्रवृत्तियों को देखते हुए इसका सटीक राजनीतिक मायने निकालना जरा कठिन है। उदाहरण के लिए, 1977 में 60.49 प्रतिशत मतदान हुआ जो 1971 के 55.27 प्रतिशत से करीब 5 प्रतिशत ज्यादा था, तो सत्ता परिवर्तन हो गया। लेकिन 1980 में मतदान 56.92 प्रतिशत हुआ यानी चार प्रतिशत गिरा तो फिर सत्ता बदल गई। 1984 में 64.01 प्रतिशत रिकॉर्ड मतदान हुआ यानी 7.5 प्रतिशत बढ़ा तो राजीव गांधी के नेतृत्व में सरकार भारी बहुमत से वापस आई। 1989 में 61.95 प्रतिशत मतदान हुआ यानी 2.06 प्रतिशत कम हुआ तो सत्ता बदल गई। 2004 में 58.07 प्रतिशत मतदान हुआ जो 1999 के 59.99 से कम था और सरकार बदल गई। 2009 में 58.19 प्रतिशत मतदान हुआ यानी 2004 के लगभग समान रहा तो यूपीए सरकार बनी रही।

इसका एक अर्थ यह है कि जहां भी भाजपा का जनाधार है वहां मतदाताओं में नरेन्द्र मोदी को लेकर असंतोष नहीं दिख रहा है। उनका समर्थन आधार मोटे तौर पर कायम है। पश्चिम बंगाल में भाजपा ने मतदाता को सीधी चुनौती दी है और इसी कारण वहां हिंसा हो रही है। मत प्रतिशत बताता है कि दोनों पक्ष के मतदाता करो या मरो की तरह मतदान करने आ रहे हैं। केरल में भाजपा ने आज तक लोकसभा में खाता नहीं खोला है लेकिन वह 8 से 10 सीटों पर उलटफेर करने की स्थिति में है। हां, जिन राज्यों में विपक्षी एकता है, वहां चुनौती है। मसलन, उत्तर प्रदेश, जहां मतदान औसतन पिछली बार के आसपास रहने वाला है। इसमें पूर्वानुमान जरा मुश्किल है। इतना लग रहा है कि अगर गठबंधन नहीं होता तो सपा-बसपा की स्थिति ज्यादा ही बुरी होती। बिहार में यह स्थिति नहीं है। बिहार मेें अभी तक रिकॉर्ड मतदान हुआ है। जिन राज्यों में भाजपा की उपस्थिति नही है, मसलन आंध्रप्रदेश, वहां टीडीपी को वाईएसआर कांग्रेस ने कड़ी चुनौती दी है। कहने का तात्पर्य यह कि मत प्रतिशत के आधार पर कुछ लोग जो मोदी सरकार की विदाई के गीत गा रहे हैं वह भी अतिवाद है और जो पहले से ज्यादा बहुमत से लौटने की बात कर रहे हैं उन्हें भी सीधे स्वीकार नहीं करना मुश्किल है।

(लेखक, समाचार पत्र-पत्रिकाओं और वेबसाइट के लिए समसामयिक विषयों पर निरंतर लेखन।)