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जनकल्याण और संगठन की जीत

Dilip Chaturvedi

Publish: May 24, 2019 15:28 PM | Updated: May 24, 2019 15:28 PM

Opinion

इस पूरे चुनाव में दो राज्यों पर लोगों की निगाहें टिकी हुई थीं। एक तो उत्तर प्रदेश और दूसरा पश्चिम बंगाल। उत्तर प्रदेश में कह सकते हैं कि भाजपा को 2014 जैसी सफलता नहीं मिली लेकिन वर्तमान सीटें जीतना किसी बड़ी सफलता से कम नहीं है....

आलोक मेहता, लेखक एडिटर्स गिल्ड ऑफ इंडिया के पूर्व अध्यक्ष

लोकसभा चुनाव में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के नेतृत्व में भाजपा ने फिर प्रचंड जीत दर्ज की है। विजय से उत्साहित भाजपा समर्थकों में नया जोश तो भरा ही है साथ में यह उम्मीद भी जगा दी है कि अब उन प्रमुख मुद्दों पर भाजपा सत्ता संभालने के साथ काम करेगी, जो उसके एजेंडे में तो शामिल रहे हैं लेकिन जिन्हें पिछले कार्यकाल में पूरा नहीं किया जा सका। इन मामलों में मुख्यत: अनुच्छेद 370 व 35ए, तीन तलाक बिल, महिला आरक्षण बिल और राममंदिर हैं।

सवाल उठता है कि भाजपा पिछली बार पूर्ण बहुमत के साथ सत्ता में आने के बावजूद क्यों अपने एजेंडा में शामिल मुद्दों पर काम नहीं कर पाई? निस्संदेह सबसे बड़ी मजबूरी उसका अन्य दलों के साथ गठबंधन और राज्यसभा में पर्याप्त बहुमत ना होना रहा। तो क्या अगले एक वर्ष में भाजपा को राज्यसभा में पर्याप्त बहुमत मिल पाएगा? क्या भाजपा नीत राजग के अन्य घटक दल उसका साथ देंगे? अगले वर्ष राज्यसभा सदस्यों के जो चुनाव होंगे, उसके आधार पर भाजपा या राजग को राज्यसभा में पूर्ण बहुमत मिल जाएगा इसकी संभावना कम ही है। इसके लिए राजग को कम से कम तीन वर्ष का और इंतजार करना पड़ सकता है।

ऐसा मैं इसलिए कह कहा हूं क्योंकि इसके लिए भाजपा नीत राजग को कई विधानसभा चुनाव भी जीतने होंगे। जल्दी ही महाराष्ट्र में चुनाव होने हैं और वहां इस बार के लोकसभा जैसा ही परिणाम रहा तो विधानसभा में एक बार फिर भाजपा की सरकार बन सकती है। इसी तरह कर्नाटक में भी तख्ता पलट के प्रयास चल रहे हैं। उधर, ओडिशा में बीजद भाजपा का साथ दे सकता है। इन सारी परिस्थितियों के बावजूद, राज्यसभा में अगले एक साल के दौरान ही भाजपा नीत राजग का बहुमत हो जाए ऐसी स्थिति नहीं बनेगी।

ऐसे में यह उम्मीद फिलहाल बेमानी लगती है कि लोकसभा में जीत और फिर राज्यसभा में संख्याबल में वृद्धि के बाद भाजपा के वो मुद्दे जो उसने गठबंधन में रहते हुए ठंडे बस्ते में डाल रखे थे, उन पर तुरत-फुरत काम करने लगेगी। कुछ मुद्दों जैसे राम मंदिर पर उसे शिवसेना का साथ मिल सकता है लेकिन जदयू इससे नाराज हो सकती है। इसी तरह अनुच्छेद 370 और 35 ए, समान नागरिक संहिता, तीन तलाक, महिला आरक्षण आदि ऐसे मुद्दे हैं जिन पर कोई घटक दल साथ होगा तो कोई विरोध में। मेरा मानना है कि भाजपा लोकसभा की बड़ी जीत के बावजूद इस किस्म के मुद्दों से फिलहाल दूरी बनाकर रखेगी। इन मुद्दों पर उसकी राय घटक दलों से जुदा होते हुए वह अपनी सोच के मुताबिक काम कर पाए, इसके लिए इसे निश्चित तौर पर कम से कम दो-तीन साल तो और इंतजार करना ही होगा। कितनी भी बहुमत की स्थिति हो, वह आधारभूत लोकतांत्रिक व्यवस्था को बदलने के प्रयास नहीं करेगी।

आखिर, इसी लोकतांत्रिक व्यवस्था में ही उसे जबर्दस्त जीत हासिल हुई है। प्रतिपक्ष के हमलों और उसके एकजुट होने पर भी प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी तथा भाजपा ने लोकसभा चुनाव में भारी सफलता अर्जित की। सुदूर गांवों से शहरी इलाकों में विजय का असली कारण गरीब लोगों को लाभ मिलना है। साथ ही जातिगत समीकरणों पर दिशा तय करने वाले नेताओं और मीडिया के एक वर्ग को गलत साबित कर दिया है। भारत के मतदाता अब विकास और कल्याण कार्यों को ही महत्व देने लगे हैं । वहीं भाजपा की संगठन क्षमता भी बढ़ती गई और कांग्रेस का संगठन लगभग ध्वस्त हो गया। क्षेत्रीय पार्टियां परिवारों पर सीमित हो गई।