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शिक्षा ज्ञान-विज्ञान आधारित हो

Shri Gulab Kothari

Publish: Aug 26, 2019 09:15 AM | Updated: Aug 26, 2019 09:15 AM

Opinion

'अर्जुन के लिए गीता सुनना ही काफी नहीं था। कृष्ण के स्वरूप को समझना भी उतना ही महत्वपूर्ण था। तभी वो अपने भीतर के ईश्वर अंश को समझ सकता था। कृष्ण ने कहा था-'ममैवांशो जीव लोके..।' यहीं उसका खुद का भी कृष्ण रूप प्रकट हुआ। यही हर प्राणी का भी कृष्ण रूप है। यदि हम भी कृष्ण बनकर पढ़ें। यही तत् त्वं असि का स्वरूप है और यही शिक्षा का उद्देश्य होना चाहिए।

एक शिक्षा का पहला लक्ष्य है-ज्ञानार्जन। ज्ञान और ब्रह्म पर्याय शब्द हैं। हम सब ब्रह्माण्ड की प्रतिकृति हैं, अत: 'अहं ब्रह्मास्मि' कहते हैं। इसीलिए व्यक्ति निर्माण का आधार 'तत् त्वं असि' माना गया है। शिक्षा में इसीलिए तीनों धरातलों-आधिदैविक, आध्यात्मिक तथा आधिभौतिक-का समावेश अनिवार्य कहा है। आज शरीर-बुद्धि शिक्षा में रह गए, मन-आत्मा धर्म के भरोसे छूट गए। धर्म व्यापार बनता जा रहा है। वहां भी ब्रह्म के स्थान पर माया रह गई है। योगक्षेम के टुकड़े हो गए, अभ्युदय की होड़ में नि:श्रेयस पूर्णत: लुप्त हो गया। व्यष्टि रह गया, समष्टि गया। संस्कृति की कृति रह गई, 'सम' की चर्चा ही नहीं। जो कुछ है बस शरीर है। शिक्षा से इसी का पोषण करना है।

हम सारी दुनिया को गीता का ज्ञान बांट रहे हैं, तब हमारे बच्चे क्यों इससे वंचित हैं? जब महाभारत का युद्ध हुआ, गीता का ज्ञान दिया, तब कौनसा धर्म था, जो आज गीता को साम्प्रदायिक कह सकता है। प्रत्येक मनुष्य के लिए उपयोगी शिक्षा का चार्टर है। 'ममैवांशो जीव लोके..' कह रहे हैं कृष्ण। क्या इसमें किसी सम्प्रदाय विशेष की ओर इशारा है? हम राजनीति न करें। सबको निर्माण योग्य बनाना है। सबको हित-अहित का बोध रहना ही चाहिए। तन-मन-धन के साथ चेतना के स्तर पर भी जीना आना चाहिए। आज के बुद्धिजीवी तो शब्दों को पकड़ते हैं। भावों की समझ कहां है!

विचारों में और वाणी में एक तारतम्य है। वाणी वैखरी रूप में अल्पजीवी है। बोलते ही लुप्त हो जाती है। मंत्र रूप में शक्तिशाली साधन है निर्माण का। हम सब ध्वनि से बने हैं। जो बोलते हैं, स्वयं भी सुनते हैं। शुद्ध मन, शुद्ध वाणी, शुद्ध (स्वस्थ) शरीर। भाषा ज्ञान नहीं, माध्यम है।

शिक्षा से गुरु खो गया। व्यक्तिगत जो जुड़ाव या संवेदना का स्तर था, वह नहीं रहा। पढ़ाई के विषय गुरु नहीं बच्चे तय करते हैं। सारा ढांचा बौद्धिक स्तर का रह गया। लक्ष्य सुख है। कौन सिखाता है कि हमारा अस्तित्व पंचभूतों से निर्मित है और संचालित भी वहीं से होता है। हमारा पिता सूर्य है। हम शरीर नहीं आत्मा हैं। शरीर माता-पिता देते हैं। आत्मा आकर इसमें रहता है। माता-पिता स्थूल शरीर का निर्माण करते हैं। पंचाग्नि का पांचवां पड़ाव होते हैं।

गीता स्पष्ट कह रही है कि जो जन्म लेता है, वह मरता है। आपके सम्बन्धों का भी प्रकृति में कोई अर्थ नहीं है। अर्जुन को कृष्ण कह रहे हैं कि तू चाहे इनको मार या नहीं मार, मैं इनको पहले ही मरा हुआ देख रहा हूं। अत: मृत्यु का शोक करना उचित नहीं है। तू क्षत्रिय है। युद्ध करना तेरा धर्म है।

गीता ने सम्पूर्ण ब्रह्माण्ड का एक इकाई रूप में वर्णन किया है जो अन्यत्र नहीं मिलता। सम्पूर्ण ब्रह्माण्ड में एक पुरुष है, शेष प्रकृति है। सत-रज-तम तथा वर्णाश्रम में सम्पूर्ण प्रकृति बंटी हुई है। पुरुष वीर्य रूप वर्ण-अहंकृति है। प्रकृति त्रिगुणात्मक है-आकृति है। अन्न-कर्म, यज्ञ, दान, तप सभी तो त्रिगुणात्मक है। अर्थात्-हम प्रकृति के बाहर जी ही नहीं सकते। जन्म, कर्म, मृत्यु सब प्रकृति दत्त हैं।

वर्णाश्रम की ऐसी प्राकृतिक विवेचना भी अन्यत्र नहीं मिलती। देव-मनुष्य-पशु-पक्षी-वनस्पति और यहां तक कि असंज्ञ सृष्टि भी चारों वर्णों के बाहर नहीं है। यही 84 लाख योनिया हैं, जिनमें जीवात्मा भ्रमण करता है।

वर्णाश्रम की विचित्रता देखिए-तीन वर्ण द्विज हो सकते हैं-ब्राह्मण, क्षत्रिय, वैश्य किन्तु इन वर्णों की स्त्रियां, वैश्य और शूद्र तीनों को कृष्ण समकक्ष कह रहे हैं। (गीता-9/32)। इसकी वैज्ञानिकता पर विस्तृत चर्चा होनी चाहिए।

सृष्टि के तीनों धरातल-आधिदैविक, आधिभौतिक, आध्यात्मिक-भी प्रकृति और वर्ण व्यवस्था में समाहित हैं। अज्ञान का कारण प्रकृति है। 'नाहं प्रकाश: सर्वस्य...' इस सूत्र को हम कृष्ण का अंश बनकर सोचें तो गीता का लक्ष्य स्पष्ट है। प्रत्येक प्राणी कृष्ण है, प्रकृति से ढका है। आत्मा कर्ता नहीं है, प्रकृति के कारण कर्ता भाव की अनुभूति मात्र है। अत: शिक्षा को पुरुष-प्रकृति, चेतना-शरीर को केन्द्र में रखकर नया रूप दिया जाए। इसके लिए शिक्षा नीति-नियंत्रण शिक्षाविदों के हाथों में ही दिया जाना चाहिए। गीता के तीसरे अध्याय (14-15) में लिखा है-'प्राणी अन्न से पैदा होते हैं। अन्न वृष्टि से, वृष्टि यज्ञ से, यज्ञ कर्म से, कर्म वेद से और वेद परमात्मा से पैदा होते हैं।'

क्या प्रत्येक व्यक्ति को जीवन का यह सार शिक्षा में नहीं दिया जाना चाहिए। प्रत्येक व्यक्ति ईश्वर अंश है। जो बात ईश्वर पर लागू होती है, व्यक्ति पर भी लागू होती है। वह पुरुष है। उसे कर्म लिप्त नहीं करते। मुझे क्यों करने चाहिएं। (4-13)

मेरा निवेदन है कि शिक्षा को समग्रता का साधन बनाना चाहिए। केवल अर्थार्जन से अधूरा मानव बनता है। मां ने भी गर्भ में अभिमन्यु बनाना बंद कर दिया। तब मानव शरीर में कहीं भी मानव नहीं दिखने वाला। जैविक देह अवश्य मानव की होगी, भीतर आत्मा के संस्कार तो मानव के नहीं हो सकते। तब मानव समाज का नया स्वरूप क्या बनेगा? शिक्षा का लक्ष्य इसी समाज के स्वरूप पर टिका होना चाहिए। आज जो कुछ परिदृश्य दिखाई दे रहा है, जो कुछ हिंसा, अतिक्रमण, अनुशासनहीनता या अनाचार दिखाई पड़ रहा है, उसका कारण अपूर्ण या आंशिक शिक्षा ही है। बौद्धिक क्षमता का विकास अहंकारग्रस्त कर रहा है, मानवता को। जो मन का प्रेम, जुड़ाव का मार्ग है, वह बंद होता जा रहा है। विकसित देशों में संवेदनहीनता सर्वत्र उपलब्ध है। कहीं बंधुत्व, सहिष्णुता, सह अस्तित्व अथवा वसुधैव कुटुम्बकम् की अवधारणा अस्तित्त्व में नहीं है। नई तकनीक में चर्चा अवश्य है इनकी।

शिक्षा का एक लक्ष्य जीवन में शान्ति की स्थापना भी है। शान्ति बाहर नहीं मिलती। वहां तो अशान्ति है। शान्ति को भीतर, आत्मा के धरातल पर खोजना पड़ता है। इसके बिना भी जीवन में कुछ न कुछ अभाव रह जाता है। इसकी पूर्ति वर्तमान शिक्षा से नहीं होती। बौद्धगया के एक मैत्रेय मिडिल स्कूल में आध्यात्मिक ज्ञान के सहारे इस कमी को पूरा किया जाता है। स्कूल के संस्थापक इतालवी हैं-वेलेण्टिनो जियाकोमिन। बच्चों को नर्सरी से ही ध्यान करना सिखाते हैं। वेलेण्टिनो का निश्चित मत है कि पतंजलि की शिक्षा के अभ्यास से स्वत: ही भाषायी, तार्किक गणितीय, अन्तवैक्तिय, अन्तराव्यक्तिक, प्राकृतिक तथा संवेगात्मक बुद्धिमत्ता का विकास होता है।

नवीन शिक्षा जो वातावरण के साथ शरीर के एकीकरण, शरीर के साथ मन के एकीकरण (सोच, संवेग, स्मृति, धार्मिक विश्वास आदि) मन के तत्त्वों का इसके अपने प्रकृति के साथ एकीकरण पर इस अनुभव के साथ आधारित हो कि जो भी प्रकट होता है असत्य है और मन की अभिव्यक्ति के अलावा कुछ भी नहीं है।

वेलेण्टिनो के शब्दों में योग की भूमिका शरीर और मन से परे है। योग व्यक्ति के सम्पूर्ण विकास पर टिका हुआ है। अष्टांग योग में समस्त परम्परागत पद्धतियों का एकीकरण अध्यात्म से करते हैं। अध्यात्म का आयाम जैविक-मनो-अध्यात्म (तत्त्व-मन-आत्मा) से एकीकृत है। आज शिक्षा की सीमा यह है कि तार्किक मन (अहं-चेतना) के स्तर पर एकीकरण का अन्त हो जाता है। चित्त के आवश्यक तत्त्व, चित्त से परे (अहं) को अस्वीकार कर देते हैं। यह अस्वीकार्यता ही विश्व में शिक्षा के बड़े संकट का कारण है।

जीवन को समझने के लिए माया की अवधारणा को समझना आवश्यक है। इसके बिना तो जीवन मिथ्यात्व में ही गुजर जाएगा। भारत के शून्य की खोज 'मायाभाव' ही तो है। माया का अर्थ भी शून्यता ही है। शून्यता संख्यावाचक है, माया सत्यता से शून्य है। अर्थात् जो दिखाई देता हुआ भी मायाभाव से मिथ्या ही है। माया को समझे बिना हम किसी भी अवधारणा से, मत-मतान्तरों से लक्ष्य तक नहीं पहुंच सकते। जीवन की इस काल्पनिक विचारशैली अथवा पूर्वाग्रह को त्यागकर ही तो अद्वैत को समझ सकते हैं। चेतना का यही विकास शिक्षा में होना चाहिए।

भारत में मन की अवस्थाओं को ही चेतना का स्तर (जाग्रत, स्वप्न, सुषुप्ति, तुरीय) कहा जाता है। आधुनिक विज्ञान इनको मस्तिष्क की चार तरंगों (बीटा, एल्फा, डेल्टा, थीटा) के रूप में स्वीकार करता है। एक अन्तर यही है कि पश्चिम के लोगों के लिए जो बिलकुल सत्य है, वह भारतीयों के लिए माया है, मिथ्या है। ध्यान में व्यक्ति अज्ञानता और अहंकार से निकलकर चेतना के गहनतम स्तर तक पहुंच सकता है। हमारा शरीर पंचकोशों से निर्मित है जो स्वयं पदार्थ (अन्नमय कोश या शरीर) से आत्मा (आनन्दमय कोश) की यात्रा है। अत: आधुनिक शिक्षा को अंधकार से प्रकाश की ओर लक्षित करना पड़ेगा। आज की शिक्षा तार्किक, विचारशील मन (अहं) की शक्ति से परे जाने से रोकती है। इस कारण अवसाद, भय, क्रोध, निराशा के परिणाम भी हैं। व्यक्ति जब अपने मन से आगे चलेगा, तब समझ सकेगा कि वह स्वयं ही अपना भाग्य-विधाता है। तब किसी भी परिस्थिति में अवसाद उसे घेर नहीं सकता। इस दृष्टि से एलिस प्रोजेक्ट के स्कूल भारतीय ज्ञान धारा के स्रोत प्रमाणित हो रहे हैं।

सोचकर ही सुखद आश्चर्य होता है कि कोई शिक्षण संस्थान बच्चों को 'तत् त्वं असि' की आवधारणा का ज्ञान दे रहा है। 'यथाण्डे तथा पिण्डे' का विज्ञान भाव समझा रहा है, ताकि वह 'अहं ब्रह्मास्मि' का अर्थ जान सके। व्यक्ति शरीर के बाहर स्वयं का विस्तार देख सकता है। बीज को वृक्ष और फलों से लदा भविष्य दिखाई दे जाएगा। पेड़ बनने को लालायित हो उठेगा। आज की शिक्षा स्वयं की भौतिक-आर्थिक सुरक्षा को अधिक महत्व देती है। ऐसा व्यक्ति न जमीन में गडऩे की सोचेगा, न ही कभी पेड़ बनेगा। बीज मरता है, तभी वृक्ष उत्पन्न होता है। स्त्री मृत्यु के अनुभव से गुजरकर ही मां बनती है। सन्तान को जन्म देना और मां बनना एक नहीं है।

माता-पिता देव हैं, प्राण हैं, शरीर में अदृश्य रूप में कार्य करते हैं। प्राण ईश्वर है। हर बीज के मूल में कोई अन्य बीज रहता है। पीछे जाएंगे तो पाएंगे कि सारे बीजों का मूल एक ही है। एक से ही सृष्टि के सारे बीज पैदा हुए हैं। अत: सूर्य को ही जगत् का पिता कहा है।

विज्ञान जगत् में दो ही तत्त्व मानता है-पदार्थ और ऊर्जा, मैटर और एनर्जी। हम भी इनको ब्रह्म और माया, अग्नि और सोम कहते हैं। विज्ञान में अधिदैव नहीं है। अधिभूत है और अध्यात्म है। हमारी आज की शिक्षा से भी अधिदैव बाहर हो गया। अपूर्णता आ गई। जितना हम शिक्षित होते हैं, उतने ही अपूर्ण होते जाते हैं। हम बात करते हैं योगी होने की, शिक्षा देते हैं उपयोगी होने की।

कृष्ण कह रहे हैं-'अर्जुन! मुझमें और तुझमें कोई भेद नहीं है।' जब कोई व्यक्ति इस भेद को पा जाता है, इसकी अनुभूति प्राप्त कर लेता है, तब वह ईश्वर जैसा ही हो जाता है। ईश्वर के सभी गुण भीतर देख लेता है। जैसे बीज विकसित होकर जीवन को सृष्टि के लिए समर्पित कर देता है। 'परित्राणाय साधुनां, विनाशाय च दुष्कृताम्। 'इसी को 'तत् त्वं असि' का स्वरूप कहते हैं।