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पुलवामा के नाम पर लगे धब्बे का मलाल

Bhuwanesh Jain

Publish: Jul 30, 2019 09:17 AM | Updated: Jul 30, 2019 09:17 AM

Opinion

करीब छह माह पूर्व जम्मू-कश्मीर का पुलवामा जिला अचानक सुर्खियों में आ गया था। इस जिले के लेथपोरा से गुजरने वाले श्रीनगर-जम्मू राष्ट्रीय राजमार्ग पर हुए आत्मघाती हमले में सीआरपीएफ के 40 जवान शहीद हो गए थे। केसर के खेतों के लिए विख्यात कश्मीर घाटी के मध्य में स्थित इस खूबसूरत जिले के बाशिंदों को आज इस बात का गहरा मलाल है कि उनकी धरती पर ऐसी घटना घटी, जिसके कारण जिले के इतिहास पर एक अमिट धब्बा लग गया है। जबकि पुलवामा जिले के पास ऐसे कई कारण हैं, जिनके कारण जिले का नाम गौरव के साथ लिया जाना चाहिए।

करीब छह माह पूर्व जम्मू-कश्मीर का पुलवामा जिला अचानक सुर्खियों में आ गया था। इस जिले के लेथपोरा से गुजरने वाले श्रीनगर-जम्मू राष्ट्रीय राजमार्ग पर हुए आत्मघाती हमले में सीआरपीएफ के 40 जवान शहीद हो गए थे। केसर के खेतों के लिए विख्यात कश्मीर घाटी के मध्य में स्थित इस खूबसूरत जिले के बाशिंदों को आज इस बात का गहरा मलाल है कि उनकी धरती पर ऐसी घटना घटी, जिसके कारण जिले के इतिहास पर एक अमिट धब्बा लग गया है। जबकि पुलवामा जिले के पास ऐसे कई कारण हैं, जिनके कारण जिले का नाम गौरव के साथ लिया जाना चाहिए।

जम्मू-कश्मीर की यात्रा के दूसरे दिन हम श्रीनगर-जम्मू हाइवे से होते हुए पुलवामा जिला मुख्यालय पर पहुंचे। वहां सबसे पहले हमारी मुलाकात जिले के युवा डिप्टी कमिश्नर (कलेक्टर) डॉ. सैयद आबिद रशीद शाह से हुई। जोश और ऊर्जा से भरपूर डॉ. आबिद और उनकी पत्नी डॉ. सैयद सेहरिश असगर दोनों ही आइएएस अफसर हैं। डॉ. सेहरिश पड़ोसी जिले बडग़ाम में डिप्टी कमिश्नर हैं। दिलचस्प तथ्य यह है कि दोनों ने एक साथ एमबीबीएस किया। फिर दोनों आइपीएस के लिए चुने गए। दोनों ने फिर कोशिश की और आइएएस बने। कश्मीरी युवाओं के लिए यह जोड़ी आदर्श बन चुकी है। पुलवामा हमले के तुरंत बाद डॉ. आबिद को इस जिले की जिम्मेदारी सौंप दी गई थी।

14 फरवरी की दुर्भाग्यपूर्ण आतंकी घटना से इस शहर के नागरिक अब तक हिले हुए हैं। उनका कहना है कि जब भी वे देश के दूसरे हिस्से में जाते हैं, उन्हें यह परिचय देते हुए डर लगता है कि वे पुलवामा जिले से हैं। वे इसके लिए मीडिया को दोष देते हैं। उनका मानना है कि इस जिले के बारे में मीडिया केवल नकारात्मक खबरें देता है जबकि पुलवामा में जगह-जगह प्रतिभाएं हैं।

अमरनाथ यात्रा मार्ग का 22 किलोमीटर हिस्सा इस जिले से होकर गुजरता है। मेहनतकश और प्रतिभासम्पन्न लोगों और अनुकूल प्राकृतिक संसाधनों के बूते पर पुलवामा जिला निरंतर समृद्धि की ओर बढ़ रहा है। डेयरी उत्पादों के मामले में यह जम्मू-कश्मीर का अग्रणी जिला बन चुका है।

प्रगति की दिशा में लगातार आगे बढऩे के बावजूद पुलवामा की युवा पीढ़ी में असंतोष और हल्का आक्रोश स्पष्ट रूप से महसूस होता है। बिजनेस कर रहे मकबूल वानी कहते हैं मीडिया पॉजीटिव स्टोरी क्यों नहीं छापता? हममें से कोई हिंसा के पक्ष में नहीं है। हमें शांति, समृद्धि और गरिमायुक्त जीवन चाहिए। पुलवामा में तैनात अधिकारी बताते हैं कि तमाम प्रगति के बावजूद बेरोजगारी आज भी सबसे बड़ी समस्या बनी हुई है। अलगाववादी इसका फायदा उठाते हैं। राष्ट्रपति शासन के दौरान राज्यपाल सत्यपाल मलिक की पहल पर पिछले एक साल में ऐसे अनेक कदम उठाए जा रहे हैं, जिससे पुलवामा ही नहीं, समूचे जम्मू-कश्मीर में आम अवाम को यह लगे कि सरकार उनके सर्वांगीण विकास के लिए कार्य कर रही है। मिशन गुड गवर्नेंस, मिशन डिलीवरिंग डवलपमेंट, बैक टु विलेज जैसे अभियान चलाए जा रहे हैं। सरकार पिछले दिनों सफलतापूर्वक हुए पंचायत और स्थानीय निकाय चुनावों की सफलता से भी बेहद उत्साहित है। इन चुनावों में ७० प्रतिशत मतदान हुआ था, जो लोकसभा चुनाव के मुकाबले 10 गुना अधिक है। पंचायतीराज संस्थाओं को अधिकार सम्पन्न बनाने के लिए कानून में कई संशोधन किए गए हैं। राज्य की पंचायतें अब १९ विभागों के कार्यों की ग्राम स्तर पर निगरानी करती हैं। मनरेगा, मिड डे मील, सामाजिक वानिकी जैसी योजनाओं की जिम्मेदारी सीधे पंचायतों को दे दी गई है। चौदहवें वित्त आयोग से मिले 366 करोड़ रुपए सीधे पंचायतों को स्थानांतरित कर दिए गए हैं। नतीजा यह हो रहा है कि अपने इलाके के लिए पंचायतें स्वयं योजनाएं बना रही हैं और क्रियान्वित कर रही हैं। सत्ता के इस विकेन्द्रीकरण से जम्मू-कश्मीर में पहली बार पुरुष और महिला सरपंचों के रूप में नया राजनीतिक नेतृत्व उभर रहा है। इनमें से कई सरपंच अगले विधानसभा चुनावों के भावी प्रत्याशियों के रूप में उभर रहे हैं।

-अमरनाथ यात्रा मार्ग का 22 किलोमीटर हिस्सा पुलवामा जिले से ही होकर गुजरता है। डेयरी उत्पादों के मामले में जम्मू-कश्मीर का अग्रणी जिला।

-राज्य के सर्वांगीण विकास के लिए चलाए जा रहे हैं मिशन गुड गवर्नेंस, मिशन डिलीवरिंग डवलपमेंट, बैक टु विलेज जैसे अभियान।

-पंचायतीराज संस्थाओं को मिले अधिकार, पंचायतें करती हैं अब 19 विभागों के कार्यों की ग्राम स्तर पर निगरानी

बेरोजगारी से त्रस्त जम्मू-कश्मीर के युवाओं की ऊर्जा को खेलकूद, सांस्कृतिक गतिविधियों की ओर मोडऩे के प्रयास किए जा रहे हैं। राज्य की फुटबॉल टीम लगातार अच्छा प्रदर्शन कर रही है। यह टीम मोहन बागान और ईस्ट बंगाल जैसी टीमों को हरा चुकी है। फुटबॉल के विकास के लिए सरकार ने २ करोड़ रुपए दिए हैं। इतनी ही राशि जम्मू-कश्मीर बैंक ने दी है।

खेलकूद का बजट जो कभी 20 करोड़ से ज्यादा नहीं होता था, राष्ट्रपति शासन के दौरान बढक़र ५०० करोड़ रुपए हो गया है। राज्य की हर पंचायत में खेल के मैदान बनाए जा रहे है। आइपीएल स्तर का क्रिकेट स्टेडियम बनाया जा रहा है। श्रीनगर में हमें राज्य भर से आई महिलाओं के ऐसे समूह से मिलने का मौका मिला जो सेल्फ हैल्प गु्रप के माध्यम से गरीब घरेलू महिला से सफल उद्यमियों के रूप में परिवर्तित हो चुकी हैं। पुलवामा में सरपंच बबिता बट्ट बताती हैं कि कभी घर में खाने के लाले थे, आज माइक्रो के्रडिट के जरिए पिता के पास रोजगार है और भाई एमबीए कर रहा है। कभी घर से बाहरनिकलने में संकोच करने वाली इन महिलाओं के चेहरों पर चमक रहा आत्मविश्वास बताता है कि कश्मीर बदल रहा है।

पुलवामा को ‘आणंद’ बनाने का लक्ष्य
-हमारा लक्ष्य पुलवामा को जम्मू-कश्मीर का ‘आणंद’ बनाने का है। पम्पोर इलाका केसर की खेती के लिए प्रसिद्ध है। यहां की केसर को विश्वभर में सर्वश्रेष्ठ गुणवत्ता वाली केसर माना जाता है। सेब के व्यापार को लाभप्रद बनाने के लिए जिले में 12 कोल्ड स्टोरेज हैं। जिले के अवन्तिपुर में जल्द ही एम्स खुलने जा रहा है। डॉ. आबिद, डिप्टी कमिश्नर, पुलवामा

कभी इंटरनेट तो कभी हाइवे बंद से परेशानी
-एक तरफ बेरोजगारी बढ़ी रही है, दूसरी ओर यहां के युवा रोज-रोज के अवरोधों से परेशान हैं। थोड़े से हालात खराब होते हैं तो इंटरनेट बंद कर दिया जाता है, जबकि आज प्रवेश व प्रतियोगी परीक्षाओं के फॉर्म तक इंटरनेट के माध्यम से भरने होते हैं। आए दिन हाइवे और एयरपोर्ट बंद हो जाते हैं। फैयाज, आईटी कपंनी में कार्यरत

माइक्रो क्रेडिट सोसाइटी से बदल गई जिंदगी
-जब माइक्रो के्रडिट सोसाइटी के जरिए काम शुरू किया तो तब के पंच-सरपंचों ने बहुत रुकावट डाली। मस्जिदों तक से मेरे खिलाफ ऐलान करवाया गया। लेकिन पीछे नहीं हटीं। 25-25 रुपए की बचत का नतीजा यह है कि आज 45 भेड़ें हैं, गैस एजेंसी है, अपना वाहन है। परिवार के 4 लोगों को रोजगार भी मिल रहा है। शकीला अनवर, महिला उद्यमी