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कृष्ण जन्माष्टमी से पहले मनाई जाएगी बलराम जयंती, कैसे करें हलष्ठी या ललही छठ का व्रत

Ashutosh Pathak

Publish: Aug 18, 2019 13:09 PM | Updated: Aug 18, 2019 13:11 PM

Noida

  • पुत्र प्राप्ती और सुरक्षा के लिए देवकी ने रखा था कठिन व्रत
  • बलराम जयंती को हलष्ठी या ललही छठ के नाम से भी जानते हैं
  • व्रती को गाय के दूध और उससे बना सामान खाना है वर्जित

नोएडा। अगर आपने बचपन या कभी भी श्री कृष्णा देखा होगा, या कृष्ण की जीवन से परिचित होंगे तो उनके बड़ा भाई बलराम के बारे में जरुर सुना होगा। जिनकी जन्म कृष्ण से पहले हुआ था और हर साल जन्माष्टमी से पहले हलषष्ठी, हरछठ या ललही छठ का त्योहार मनाया जाता है। हरछठ भादों कृष्ण पक्ष की षष्ठी को मनाया जाता है। इसी दिन श्री कृष्ण के बड़े भाई बलराम का जन्म हुआ था। इस बार हलषष्ठी या हरछठ 21 August को मनाया जाएगा। जहां 24 August को कृष्ण जन्माष्टमी मनाएंगे। उससे दो दिन पहले कृष्ण के बड़े भाई बलराम जी का जन्मोत्सव मनाया जाएगा, जिसे हलषष्ठी-हरछठ के नाम से जाना जाता है। पूर्वी हिस्से में इस त्योहार को ललही छठ भी कहते हैं। कैसे की जाती है, पूजा क्या या पूजे करने के पीछे की कथा या कहानी आज हम जानेंगे।

हलषष्ठी, हरछठ या ललही छठ इस बार एक सितंबर को मनाया जाएगा। यह व्रत स्त्रियां अपने संतान की दीर्घ आयु और स्वस्थ्य के लिए करती हैं। इस व्रत से जुड़ी तमाम कहानियां भी प्रचलीत है जो महिलाएं व्रत और पूजा करती है जरुर सुनती है। कहा जाता है कि पुत्र प्राप्ती के लिए भी इस दिन जो महिलाएं व्रत की कथा सुनती है उन्हें पुत्र रत्न की प्राप्ती होती है। इस दिन हलषष्ठी माता की भी पूजा की जाती है। ये तो सबको बता है लेकिन आज हम व्रत की कहानियों को जाएंगे। जो व्रती महिलाएं सुनती हैं।

कथा-

जब कंस को पता चला की वासुदेव और देवकी की संतान उसकी मृत्यु का कारण बनेंगी तो उसने उन्हे कारागार में डाल दिया और उसकी सभी 6 जन्मी संतानों वध कर डाला। देवकी को जब सांतवा पुत्र होना था तब उनकी रक्षा के लिए नारद मुनी ने उन्हे हलष्ठी माता की व्रत करने की सलाह दी। जिससे उनका पुत्र कंस के कोप से सुरक्षीत हो जाए। देवकी ने हलष्ठी का व्रत किया। जिसके प्रभाव से भगवान ने योगमाना से कह कर देवकी के गर्भ में पल रहे बच्चे को वासुदेव की बड़ी रानी के गर्भ में स्थानांतरित कर दिया जिससे कंस को भी धोखा हो गया और उसने समझा देवकी का संतवा पुत्र जिंदा नहीं हैं। उधर रोहिणी के गर्भ से भगवान बलराम का जन्म हुआ। इसके बाद देवकी के गर्भ से आठवें पुत्र के रुप में श्री कृष्ण का जन्म हुआ। देवकी के व्रत करने से दोनों पुत्रों की रक्षा हुई।

क्या नहीं खाना चाहिए-
इस दिन बलराम जी का जन्मोत्सव मनाया जाता है इसलिए खेत में उगे हुए या जोत कर उगाए गए अनाजों और सब्जियों को नहीं खाया जाता। क्योंकि हल बलराम जी का अस्त्र है। साथ ही गाय का दूध, दही, घी ये उससे बने किसी भी वस्तु को खाने की मनाही होती है। इसलिए महिलाएं इस दिन तालाब में उगे पसही/तिन्नी का चावल/पचहर के चावल खाकर व्रत रखती हैं। गाय का दूध और इससे बने दही, घी का प्रयोग वर्जित है। इस दिन महिलाएं भैंस का दूध ,घी व दही इस्तेमाल करती है।


कैसे करें पूजा-
इस व्रत में महुआ के दातुन से दांत साफ किया जाता है। शाम के समय पूजा के लिये हरछ्ठ मिट्टी की बेदी बनाई जाती है। हरछठ में झरब

कुश और पलास तीनों की एक-एक डालियां एक साथ बांधी जाती है। जमीन को मिट्टी से लीपकर वहां पर चौक बनाया जाता है। उसके बाद हरछ्ठ को वहीं पर लगा देते हैं। सबसे पहले कच्चे जनेउ का सूत हरछठ को पहनाते हैं। फल आदि का प्रसाद चढ़ाने के बाद कथा सुनी जाती है।