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नसबंदी को ठेंगा दिखा रहे महिला पुरूष, 16 प्रतिशत पर अटका टारगेट

Subodh Kumar Tripathi

Publish: Nov 19, 2019 12:22 PM | Updated: Nov 19, 2019 12:22 PM

Neemuch

नसबंदी को ठेंगा दिखा रहे महिला पुरूष, 16 प्रतिशत पर अटका टारगेट

नीमच. एक समय था, जब पुरानी पद्धति से नसबंदी की जाती थी। जिसमें समय भी काफी लगता था और कई सावधानियां भी रखनी पड़ती थी। लेकिन उस समय भी नसंबदी का लक्ष्य 100 प्रतिशत पूरा होता था। समय के साथ साथ नसंबदी का ऑपरेशन काफी आसान और सुविधाजनक हो गया। लेकिन इसके बावजूद साल दर साल नसंबदी का ग्राफ गिरता जा रहा है। ऐसे में कैसे परिवार कल्याण होगा और कैसे जनसंख्या नियंत्रण होगी। चिंता का विषय है। लेकिन इस ओर जिम्मेदारों का ध्यान नहीं है।


साल दर साल गिर रहा नसंबदी का ग्राफ
जिला चिकित्सालय में लेजर पद्धति के साथ ही पुरानी पद्धति से नसंबदी की जाती है। वर्ष 2010-11 में शासन द्वारा निर्धारित किया गया लक्ष्य भी 100 प्रतिशत पूरा होता था। लेकिन कुछ साल बाद ही धीरे धीरे नसबंदी का ग्राफ जो गिरना शुरू हुआ तो उठने का नाम नहीं ले रहा है। हालात यह है कि इस बार साल पूरा होने में चार माह का समय शेष बचा है। वहीं लक्ष्य के अनुपात में नसबंदी मात्र 16 प्रतिशत हो पाई है। ऐसे में लक्ष्य पूरा करना जिम्मेदारों के लिए इस बार किसी चुनौती से कम नहीं रहेगा।

पुरूषों की नहीं रूचि, महिलाओं का भी गिर रहा ग्राफ
नसबंदी कराने में पुरूषों की रूचि न के बराबर है, यही कारण है कि लक्ष्य के अनुपात में एक प्रतिशत पुरूष भी नसंबदी नहीं करा रहे हैं। वहीं महिलाओं की नसबंदी का आंकड़ा भी साल दर साल गिरता जा रहा है। क्योंकि पिछले दस सालों में जनसंख्या में तो निश्चित ही वृद्धि हुई है। लेकिन दस साल पहले जहां 5 से 6 हजार महिलाएं नसबंदी कराती थी, अब मात्र २ से ढ़ाई हजार महिलाएं नसबंदी करा रही है। वहीं इस साल तो स्थिति काफी विकट नजर आ रही है।


बाहर से आते हैं सर्जन नसबंदी करने
जिला चिकित्सालय के कई चिकित्सकों को आधुनिक पद्धति से नसबंदी करने का प्रशिक्षण दिया जा चुका है। साथ ही उन्हें उपकरण भी प्रदान किए गए हैं। शासन की मंशा थी कि स्थानीय स्तर पर ही लेजर पद्धति से नसंबदी होगी तो निश्चित ही नसंबदी का ग्राफ बढ़ेगा। लेकिन आश्चर्य की बात है कि प्रशिक्षण और उपकरण लेने के बाद भी कुछ चिकित्सक आधुनिक पद्धति से नसबंदी नहीं कर रहे हैं। ऐसे में उज्जैन या रतलाम आदि स्थानों से सर्जन नसबंदी करने के लिए आते हंै। जिनकी आवाजाही सहित अन्य खर्च का भार भी शासन पर पड़ रहा है। बाहर से आने वाले सर्जन जब भी आते हैं शिविर लगाकर नसबंदी की जाती है। जिला चिकित्सालय और जावद में प्रतिदिन नसंबदी की जाती है। लेकिन इसके बावजूद भी लक्ष्य पूरा नहीं हो पा रहा है।


जिले में पुरूष नसबंदी पखवाड़े का आयोजन किया जाएगा। जिसके तहत 21 नवंबर से 4 दिसंबर तक अभियान चलाकर नसबंदी में पुरूषों की भागिदारी बढ़ाने के लिए जागरूक किया जाएगा।
-डॉ जेपी जोशी, नोडल अधिकारी, परिवार कल्याण कार्यक्रम

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