स्लो इंटरनेट स्पीड होने पर आपको पत्रिका लाइट में शिफ्ट कर दिया गया है ।
नॉर्मल साइट पर जाने के लिए क्लिक करें ।

यहां सत्ताधारी पार्टी के हिसाब से बदलता है स्कूलों का पाठ्यक्रम

Shyam Lal Choudhary

Publish: Nov 11, 2019 12:40 PM | Updated: Nov 11, 2019 12:40 PM

Nagaur

The curriculum of schools changes according to the ruling party राष्ट्रीय शिक्षा दिवस पर विशेष : किताबें बदलने तक सीमित हो गई सरकारें, शिक्षा पर ध्यान देने की बजाए किताबें बदलने पर ज्यादा जोर, किताबें छपवाने में आने वाला करोड़ों रुपए का भार जनता पर

नागौर. सरकारी विद्यालयों में शिक्षा का सुधार हो न हो, लेकिन प्रदेश में सरकार बदलने पर पाठ्यक्रम में बदलाव होना तय है। प्रदेश में पिछले लम्बे समय से भाजपा और कांग्रेस पार्टी समर्थित सरकार बारी-बारी से राज कर रही हैं और जब भी सरकार बदलती है स्कूली पाठ्यक्रम में बदलाव जरूर होता है। हालांकि दोनों ही पार्टियों के शिक्षा मंत्री द्वारा यह कहकर पाठ्यक्रम बदलने की बात कही जाती है कि वे विचारधारा विशेष को पोषित किए जाने वाली पुस्तकों के स्थान पर राजस्थान का भूगोल, इतिहास और संस्कृति से सम्बन्धित पुस्तकें पढ़ाएंगे, लेकिन पाठ्यक्रम बदलने के कारण अरबों रुपए का किताबों का खर्चा आता है, वह आम जनता के लिए बड़ा बोझ बनता जा रहा है।

हम यदि आंकड़ों की बात करें तो प्रदेश भर में सवा करोड़ बच्चों सरकारी एवं निजी स्कूलों में पढ़ रहे हैं, जिनमें से सरकारी स्कूलों में पढऩे वाले बच्चों को सरकार की ओर से पाठ्यपुस्तकों का वितरण हर वर्ष नि:शुल्क किया जाता है। ऐसे में 50 से 60 लाख बच्चे सरकारी स्कूलों में अध्ययनरत हैं, जिन्हें हर वर्ष सरकार नि:शुल्क पुस्तकें वितरित करती हैं। अकेले नागौर जिले में हर वर्ष 17 से 18 लाख नई पुस्तकों का वितरण किया जाता है, जबकि कक्षा 4 से 12वीं तक के बच्चों के लिए 50 प्रतिशत किताबें पुरानी उपयोग ली जाती हैं। इससे यह अंदाजा सहज ही लगाया जा सकता है कि किताबों पर अरबों रुपए का खर्चा किया जाता है। यहां गौर करने वाली बात यह है कि एक पार्टी पांच साल तक सत्ता में रहने के दौरान किसी न किसी कक्षा की किताब के पाठ्यक्रम में बदलाव करती है, लेकिन जैसे ही चुनाव में सत्ता पलट होता है, एक बार फिर किताबों को बदलने का सिलसिला शुरू हो जाता है। नई किताबों के छपवाने एवं खरीदने में जिस प्रकार खर्च किया जाता है, उसी बजट से बदहाल होती सरकारी स्कूलों की स्थिति में सुधार लाया जा सकता है। सरकार विद्यालयों के भवनों को पुनर्निर्माण हो या फिर संसाधन उपलब्ध करवाने हों, सरकार ऐसे काम कर सकती है, जिससे शिक्षा का स्तर सुधर सके।

इस वर्ष बदली सामाजिक की किताब, अगले वर्ष पूरा पाठ्यक्रम बदलेंगे
गत वर्ष प्रदेश में सत्ता में आई कांग्रेस सरकार ने नए शिक्षा सत्र से कक्षा 10 सहित अन्य में सामाजिक ज्ञान की किताब बदली थी। दो माह पूर्व शिक्षा मंत्री गोविन्द डोटासरा ने पाठ्यक्रम समीक्षा समितियों की सिफारिश का हवाला देते हुए विद्यार्थियों के हित में शिक्षा सत्र 2020-21 से सरकारी एवं सम्बद्ध विद्यालयों में कक्षा 6 से 8 तक एनसीईआरटी पाठ्यक्रम की किताबें लागू करने की घोषणा की थी। शिक्षा के क्षेत्र में चहुंमुखी विकास करने की बात करने वाले शिक्षा मंत्री डोटासरा ने इस बात के संकेत भी दिए कि शिक्षा सत्र 2021-22 से कक्षा 10वीं व 12वीं की पुस्तकें भी बदली जाएंगी।

भाजपा ने भी बदला था पाठ्यक्रम
वर्ष 2016-15 में राज्य की तत्कालीन भाजपा सरकार ने राजस्थान माध्यमिक शिक्षा बोर्ड कक्षा 9 से 12 तक का पाठ्यक्रम बदला था। तत्कालीन शिक्षा मंत्री वासुदेव देवनानी ने वर्ष 2015 में कहा था कि प्रदेश के विद्यार्थी अकबर महान के स्थान पर महात्मा गांधी, महाराणा प्रताप और वीर सावरकर महान पढ़ेंगे। भाजपा सरकार ने पाठ्य सामग्री में राजस्थान और भारत के गौरवपूर्ण इतिहास का समावेश करते हुए भारतीय संस्कृति से विद्यार्थी को जोडऩे और विद्यार्थी को देशभक्त व श्रेष्ठ नागरिक बनाने वाली शिक्षा का समावेश करने का दावा किया था।

पाठ्यक्रम बदलना बचकाना हरकतें
देश आजाद होने के बाद से अब तक कोई भी सरकार शिक्षा में व्यापक सुधार को लेकर गंभीर नहीं रही है। इसका अंदाज इसी से लगाया जा सकता है कि वर्ष 1986 में बनी शिक्षा नीति आज तक धरातल पर नहीं उतरी है। शिक्षा मनोविज्ञान पर आधारित आधुनिक शिक्षा को व्यवहारिक बनाने का सपना अब भी अधूरा है। सिलेबस के निर्माण में स्थानीयता का हर दृष्टि से अभाव है। शिक्षा मंत्रियों की रुचि केवल शिक्षकों के स्थानान्तरण में होती है। उनके द्वारा राजनीति के तहत किसी एक पाठ को जोडऩा या हटाना बचकाना हरकतें हैं, वहीं जिला शिक्षा अधिकारी संसाधन विहीन और शक्तिहीन हैं तो निरीक्षक केवल मिड डे मील के बारे में पूछते हैं। ऐसे में शिक्षा महज एक औपचारिकता रह गई है, जो अपने मूल उद्देश्य में पूरी तरह विफल हो रही है। किसी देश या समाज में अगर शिक्षा की इतनी गहरी उपेक्षा हो तो उसके समृद्ध होने की गुंजाइश कम होती है और आज भारत में यही हो रहा है।
- डॉ. अशोक चौधरी, प्रदेश अध्यक्ष, अभिनव राजस्थान

[MORE_ADVERTISE1]