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Pitripaksh Pinddan : आखिर क्यों श्रेष्ठकर है पिंडदानियों के लिए बाणगंगा

Binod Pandey

Publish: Sep 21, 2019 14:31 PM | Updated: Sep 21, 2019 14:31 PM

Mumbai

  • बाणगंगा में 5 हजार लोग करेंगे पिंडदान
  • विशाल आयताकार वाले बाणगंगा तालाब का पौराणिक महत्व है।
  • मान्यता है कि पितरों को श्राद्ध देने के लिए गया,पुष्कर ,प्रयाग,हरिद्वार,नासिक आदि स्थानों पर नहीं जा सकने वाले पिंडदानियों द्वारा बाणगंगा तालाब में तर्पण करने पर पूर्वज संतुष्ट होकर आशीर्वाद देकर उन्हें अनिष्ट से बचाते हैं

मुंबई. दक्षिण मुंबई के मलबार इलाके में अरब सागर से कुछ फर्लांग की दूरी पर बाणगंगा को मुंबई का सबसे पुराना तालाब माना जाता है। बाणगंगा में श्राद्ध पक्ष के 15 दिनों तक तर्पण व पिंडदान करने वाले सनातन धर्मांवलम्बियों का तांता लगा रहता है। पिंडदानियों के लिए बाणगंगा पवित्र गंगा नदी से कम नहीं है। मान्यता है कि पितरों को श्राद्ध देने के लिए गया,पुष्कर ,प्रयाग,हरिद्वार,नासिक आदि स्थानों पर नहीं जा सकने वाले पिंडदानियों द्वारा बाणगंगा तालाब में तर्पण करने पर पूर्वज संतुष्ट होकर आशीर्वाद देकर उन्हें अनिष्ट से बचाते हैं। विशाल आयताकार वाले बाणगंगा तालाब का पौराणिक महत्व है। पौराणिक कथाओं के अनुसार वनवास के दौरान भगवान राम ने इस जगह पर बालू से एक शिवलिंग का निर्माण किया था,जिसको बालुकेश्वर के नाम से जाना जाता है। इस शिवलिंग के जलाभिषेक के लिए जमीन में बाण मारकर भगवान राम ने मीठे जल का अवतरण किया जो तालाब का आकार ले लिया जिसे बाणगंगा कहा जाता है। यहां पर भगवान राम द्वारा स्थापित श्री बालुकेश्वर महादेव मंदिर आज भी मौजूद है। बालुकेश्वर मंदिर के नाम पर इस क्षेत्र का नाम बालुकेश्वर पड़ गया। बाणगंगा तालाब के आस पास काफी संख्या में मंदिर है,भक्तगण तालाब में स्नान करने के बाद इन मंदिरों में भगवान का दर्शन करते हैं। तालाब के निकट ही कैवल्य मठ,बालुकेश्वर श्री काशी मठ के भी विशाल मंदिर हैं।


तालाब पर दीपक जलाने की परंपरा
त्रिपुरारी पूर्णिमा के दिन बाणगंगा तालाब पर दीपक जलाने की परम्परा है, जिसका दृश्य काफी मनमोहक होता है। बाणगंगा तालाब का मालिकाना अधिकार गौंड सारस्वत ब्राह्मण मंदिर ट्रस्ट के पास है। इस तालाब को हेरिटेज का दर्जा दे देने के बाद अब इसकी देख रेख भारतीय पुरातत्व विभाग व मनपा करती है। गौंड सारस्वत ब्राह्मण मंदिर ट्रस्ट के सचिव शशांक गुलगुले ने बताया कि वैसे तो श्राद्ध के सभी दिनों में पिंडदानी विविध अनुष्ठान करते है मगर अमावस्या को पितृ श्राद्ध के लिये करीब 5 हजार पिंडदानी बाणगंगा तालाब के पास मुंडन कराकर तालाब में स्नान के बाद पिंडदान करेंगे।


बाल उतारने की भी है यहां व्यवस्था
इस दिन करीब 150 कारीगर भी बाल उतारने के लिए मौजूद रहेंगे। तालाब के पास श्राद्ध करने वालों के लिए अलग से व्यवस्था की गई है जिससे मुंडन कराने के बाद आटे की लोई के साथ मुंडन किया गया बाल ,चावल, फूल विसर्जन तालाब के एक किनारे पर ही एकत्र हो इसके लिए तालाब में अलग से जाली लगायी गई है। अश्विन शुक्ल पक्ष के 15 दिनों तक श्राद्ध करने वालों का यहां प्रतिदिन जमघट लगा रहता है। श्राद्ध पक्ष की सभी 15 तिथियां श्राद्ध को समर्पित है। स्वर्गीय पितरों की मृत्यु तिथि के अनुसार श्राद्ध की परम्परा है लेकिन हो सके तो पूरे 15 दिनों तक श्राद्ध करना चाहिए। श्राद्ध के दिन तर्पण व पिंडदान का विशेष महत्व होता है। तर्पण पितरों को याद करने का एक विधान है। इसमें देव,ऋषि ,यम व पितरों का नाम लेकर जौ, तिल ,चावल, उड़द के साथ जल लेकर तर्पण किया जाता है। इसी तरह पिंडदान में गेंहू ,चावल,जौ का आटा या पके चावल का उपयोग कर तालाब,जलाशय,नदी में अर्पित किया जाता है। पिंडदान करने के लिए सफेद वस्त्र धारण किया जाता है। पितृ पक्ष की अष्टमी और नवमी तिथि का विशेष महत्व होता है। क्योंकि दिवंगत पिता का श्राद्ध अष्टमी तिथि को तो माता का श्राद्ध नवमी तिथि को किया जाता है।