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Patrika Social Pride : लावारिस शवों के साथ आखिर कैसे जुड़ गई जिंदगी की दिनचर्या

Binod Pandey

Publish: Oct 22, 2019 23:38 PM | Updated: Oct 22, 2019 23:38 PM

Mumbai

  • केरल के जिजेश बालन बने मिसाल
  • 15 सालों से कर रहे धर्म के अनुसार लावारिस शवों का अंतिम संस्कार
  • रेलवे स्टेशन या बस स्टाप पर पड़े नि:सहाय व्यक्तियों की सहायता करना, बाल काटना, स्नान कराना और उन्हें कपड़े
  • आदि पहनाकर अनाथ आश्रम ले जाकर पूरा इंतजाम करवाना मानो उनकी आदत हो गई है

एस.एन.दुबे
कल्याण. रोजी-रोटी के लिए 15 साल पहले केरल छोड़कर महाराष्ट्र के रत्नागिरी आए जिजेश बालन उर्फ एलटी अन्ना का लावारिस शवों को उठाना और धर्म के रीति-रिवाजों के अनुसार अंतिम संस्कार करना दिनचर्या बन चुकी है। रेलवे स्टेशन, महामार्ग और बस स्टाप पर लावारिस पड़े 100 से ज्यादा शवों को वे उठा चुके हैं। फिर धार्मिक विधिपूर्वक अंतिम संस्कार करते हैं। इन दर्जनों शवों में से करीब 30 से 40 शवों का उन्होंने खुद अंतिम संस्कार कराया। इतना ही नहीं 15 साल के दौरान कई बार दुर्घटना में घायल लोगों की मदद करने का भी उन्हें अवसर मिला, तो बखूबी निभाया और करीब 400 लोगों को विभिन्न अस्पतालों में भर्ती कराकर इलाज कराया।


कन्नौर, केरला के किसान परिवार में जन्में एलटी अन्ना छह भाई-बहन हैं। पांच बहनों की शादी-विवाह हो चुका है और सभी बहनें केरल में रहती हैं। अन्ना अपने परिवार के साथ कोंकण के रत्नागिरी में रहते हैं। उनकी पत्नी रजिता इंग्लिश टीचर हैं और ट्यूशन पढ़ाती हैं। अन्ना को एक छह साल का लड़का भी है और वे खुद टायर में हवा भरने का काम करते हैं। पत्रिका से बातचीत में अन्ना ने कहा कि हवा भरने से जो आय होती है उसे वे बेसहारा लोगों पर खर्च करते हैं। रेलवे स्टेशन या बस स्टाप पर पड़े नि:सहाय व्यक्तियों की सहायता करना, बाल काटना, स्नान कराना और उन्हें कपड़े आदि पहनाकर अनाथ आश्रम ले जाकर पूरा इंतजाम करवाना मानो उनकी आदत हो गई है। यह कार्य उन्हें अच्छा लगता है। इतना ही नहीं रात-बिरात सड़क दुर्घटना में मामूली रूप से घायल सैकड़ों लोगों को उनके घर भी पहुंचाने में भूमिका अदा करते हैं।


कल्याण स्टेशन है आशियाना
कल्याण के प्लेटफार्म नम्बर एक पर चाइल्ड हेल्प लाइन के पास ही एलटी अन्ना का आशियाना है। बीच-बीच में रत्नागिरी और मुंबई जाते रहते हैं। जीआरपी और आरपीएफ अन्ना की मदद करती रहती हैं। पांचाल हेल्पिंग सोसा.सहित समाजसेवी आत्माराम डिडवानिया, नीलेश अग्रवाल और अनिल गर्ग सहित कुछ सामाजिक संगठन भी इनके साथ आने को तैयार हैं।