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जिनसे भगवान तक रूठा, उनकी जिंदगी में रोशनी भर रही पूर्णिमा!

Arun lal Yadav

Publish: Sep 11, 2019 16:21 PM | Updated: Sep 11, 2019 16:34 PM

Mumbai

Initiatives: स्पेशल बच्चों (special children) की मासूम मुस्कान कराती है बेहतर इंसान होने का एहसास, दिव्यांग बच्चों का जीवन संवारने (Increasing LIFE special children ) में पूर्णिमा इस कदर जुटी हैं कि उन्हें खुद के बच्चे के ख्याल नहीं रहा Increasing LIFE special children

अरुण लाल
मुंबई. देश की आर्थिक राजधानी मुंबई को धन कुबेरों का बसेरा कहा जाता है। ऐसे हजारों लोग यहां बसते हैं, जिनके पास करोड़ों की दौलत है। वैसे हम करोड़पति बनने के सपने पर नहीं बल्कि इंसान और इंसानियत की बात करने वाले हैं। इंसान होने का अर्थ है कि हम दुनिया को कुछ ऐसा दे,ं जिससे हमारे होने की सार्थकता सिद्ध हो। अमीर हों या गरीब, हर कोई अपने हिसाब से अपनी सार्थकता तलाशता है। आज हम आपको मिला रहे हैं मुंबई के विक्रोली में रहने वाली पूर्णिमा सोनावणे से, जिन्होंने दिव्यांग (मनोरोगी) बच्चों के जीवन को सही दिशा देने का बीड़ा उठाया है।
उपेक्षा के शिकार इन बच्चों को पूर्णिमा खास मानती हैं। इनके जीवन को संवारने में वह इस कदर जुटी हैं कि उन्हें खुद के बच्चे का ख्याल नहीं रहा...। मानसिक रूप से दिव्यांग बच्चों को वे उठना, बैठना, बोलना, नाचना-गाना, पेंटिंग बनाना, हंसना-खेलना आदि बातें सिखाती हैं। उनके लिए न कोई बच्चा गरीब है न कोई अमीर, वे समभाव से सभी को जीवन की सीख देती हैं। बच्चों के परिजन उन्हें मां जैसा सम्मान देते हैं। इन बच्चों और उनके परिजनों के लिए पूर्णिमा किसी फरिश्ते जैसी हैं।

सैलरी मिली, पर संतुष्टि नहीं

जिनसे भगवान तक रूठा, उनकी जिंदगी में रोशनी भर रही पूर्णिमा!

पूर्णिमा ने बताया, मैं एक सामान्य परिवार में जन्मी थी। हम चार बहने थीं। किसी को लगा नहीं था कि मेरे पिता मुझे पढ़ाएंगे। पर, मेरी लगन देख उन्होंने मुझे ग्रेजुएशन कराया। मैंने एक महीने तक क्लर्क की नौकरी की, वहां मुझे सैलरी मिली, पर संतुष्टि नहीं। इसी दौरान मेरे भाई के दोस्त ने सामाजिक क्षेत्र में कुछ करने की सलाह दी। उनकी सलाह मान मैं मानसिक रूप से कमजोर बच्चों के हित में काम करने वाली संस्था से जुड़ गई।

बच्चों का दिल जीता

पहल:  स्पेशल बच्चों का आत्मविश्वास बढ़ा रहीं हैं मुंबई की पूर्णिमा

उन्होंने बताया, मैंने पूरी ईमानदारी से काम किया। अपने काम-व्यवहार से बच्चों का दिल जीता। परिजनों का भरोसा हासिल किया। लोग संस्था के बजाय मेरे नाम से बच्चों को भेजने लगे। संस्था प्रमुख को यह अच्छा नहीं लगा। उन्होंने मुझे दूसरे काम में लगा दिया, जहां मेरा मन नहीं लगा। 2015 में मैंने वह संस्था छोडऩे का फैसला किया।

मामा के बेटे ने बढ़ाया हौसला

पहल:  स्पेशल बच्चों का आत्मविश्वास बढ़ा रहीं हैं मुंबई की पूर्णिमा

संस्था छोडऩे के बाद मुझे उन बच्चों की कमी खल रही थी। थोड़ी परेशान भी थी। मामा के बेटे दिनेश सर्वगोड़ ने मेरा हौसला बढ़ाया। आज मैं जो कुछ भी हूं, उसमें उनका बड़ा योगदान है। फिलहाल मानसिक रूप से दिव्यांग बच्चों के लिए काम करने वाली दोस्त की एक संस्था से जुड़ी हूं। हम बच्चों को खुश रखने का पूरा प्रयास करते हैं, । उन्हें खुश देख हमें संतोष मिलता है।

बच्चों को समझना जरूरी
पूर्णिमा ने बताया, विज्ञान कहता है कि 100 में से सात बच्चों का ही आईक्यू लेवल ठीक होता है। पर, पढ़ाई में वे बहुत पीछे रहते हैं। माता-पिता ऐसे बच्चों को समझने की बजाए उन्हें पीटते हैं। इसे लर्निंग डिसेलिबिटी कहते हैं। ऐसे बच्चों या व्यक्तियों को समझने की जरूरत है। उन्होंने खुद इस समस्या से ग्रस्त व्यक्ति को अपना जीवन साथी बनाया है, जो 10वीं पास नहीं कर पाए। पर, वे बहुत अच्छे पेंटर हैं। उनका आईक्यू ़140 है। पूर्णिमा और उनके पति ने एक बच्चा गोद लिया है, जो अपने पिता से भी अच्छा चित्रकार बन चुका है।

स्पेशल हैं यह बच्चे
यह बच्चे हमारे लिए स्पेशल हैं। जैसे भी हैं, समाज को इन्हें स्वीकार करना चाहिए। इन बच्चों का मासूम मुस्कान मुझे इंसान होने का एहसास कराती है। मैं अंतिम सांस तक इनके लिए काम करना चाहूंगी।