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चंद्रयान-2: विक्रम लैंडर से संपर्क साधने में अमरीका ने मदद से खड़े किए हाथ!

Amit Kumar Bajpai

Publish: Oct 05, 2019 02:34 AM | Updated: Oct 11, 2019 19:33 PM

Miscellenous India

  • अमरीकी वाणिज्य राज्य सचिव विलबर रॉस का खुलासा
  • बेंगलूरु में एक अंग्रेजी मैग्जीन से बातचीत में कहा
  • भारतीय कम्यूनिकेशन सिस्टम के चलते नहीं कर सकते मदद

नई दिल्ली। मिशन चंद्रयान-2 के भविष्य को लेकर हर व्यक्ति के मन में कई सवाल हैं। इंडियन स्पेस रिसर्च ऑर्गनाइजेशन (इसरो) के इस महात्वाकांक्षी अभियान में विक्रम लैंडर से संपर्क टूट हुए तकरीबन एक माह का वक्त बीत चुका है। इस बीच आई तमाम खबरों के बीच अब अमरीका के स्टेट सेक्रेटरी ऑफ कॉमर्स विलबर रॉस का बयान सामने आया है। रॉस ने कहा है कि अमरीका केवल हद तक ही इसमें मदद कर सकता है।

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बेंगलूरु में एक अंग्रेजी मैग्जीन से बातचीत में अमरीका के वाणिज्य राज्य मंत्री ने कहा चंद्रयान-2 के लैंडर विक्रम में क्या खराबी या परेशानी आई थी, इसे खोजने में अमरीका या इसकी स्पेस एजेंसी नासा कुछ बहुत ज्यादा मदद नहीं कर सकते।

रॉस ने कहा कि विक्रम का कम्यूनिकेशन सिस्टम भारत का आंतरिक सिस्टम था, और इसलिए नहीं लगता कि अमरीका इस बारे में बहुत कुछ कर सकता है। विलबर रॉस बेंगलूरु में इसरो प्रमुख के सिवन से मुलाकात करने पहुंचे थे।

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बीते 7 सितंबर को इसरो का विक्रम लैंडर से संपर्क टूट गया था। यह संपर्क चंद्रमा की सतह से 2.1 किलोमीटर की ऊंचाई पर टूटा था, जब लैंडर उतरने वाला था।

संपर्क टूटने के दो दिन बाद 9 सितंबर को इसरो को लैंडर की चंद्रमा के उत्तरी ध्रुव में लोकेशन तो मिल गई, लेकिन हार्ड लैंडिंग के चलते वह संपर्क साधने में नाकाम रहा। विक्रम लैंडर के भीतर छह पहियो वाला प्रज्ञान रोवर रखा हुआ है।

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बीते 21 सितंबर तक चंद्रमा पर दिन होने के चलते लैंडर से संपर्क साधने की कोशिश की गई, लेकिन कोई सकारात्मक परिणाम नहीं निकला। इसके बाद वहां रात चालू हो गई और इस दौरान विक्रम से संपर्क साधना तकरीबन नामुमकिन है क्योंकि रात में चंद्रमा के इस हिस्से का तापमान शून्य से 200 डिग्री तक नीचे चला जाता है। विक्रम लैंडर में इसे गर्म रखने वाला कोई उपकरण भी नहीं है, ताकी इसकी ऐसे माहौल में ठीक रहने की संभावना होती।

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इसरो के अलावा नासा भी विक्रम के बारे में जानने के प्रयास में था। पिछले माह नासा ने विक्रम लैंडर की लैंडिंग साइट की तस्वीर भेजी थी, जो चंद्रमा की परिक्रमा करने वाले नासा के लूनर ऑर्बिटर ने खींची थी। जहां यह ऑर्बिटर लैंडिंग साइट की तस्वीर खींचने में सफल रहा, यह विक्रम लैंडर की फोटो नहीं खींच पाया। इसकी वजह यह रही कि जिस वक्त यह ऑर्बिटर लैंडिंग साइट के ऊपर से गुजर रहा था, उस वक्त वहां पर चंद्रमा की काफी ज्यादा छाया पड़ रही थी।

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विलबर रॉस ने इस संबंध में स्पष्ट रूप से कहा कि विक्रम का कम्यूनिकेशन सिस्टम भारत तक ही सीमित था। इसलिए उन्हें ऐसा नहीं लगता कि इसके असल कारण को ढूंढने में अमरीका बहुत कुछ कर सकता है।

रॉस के इस बयान का सीधा सा मतलब यही निकलता है कि विक्रम लैंडर से संपर्क साधने में अमरीका एक सीमा के भीतर ही मदद कर सकता है।

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वहीं, चंद्रयान-2 को लेकर अच्छी खबर यह है कि इसका ऑर्बिटर सुरक्षित है और बेहतर ढंग से चंद्रमा के चारों ओर अपनी निर्धारित कक्षा में परिक्रमा कर रहा है। बृहस्पतिवार को इसरो ने बताया भी कि ऑर्बिटर चंद्रमा के पास चार्ज्ड पार्टिकल्स (आवेशित कण) का पता लगाने में सक्षम रहा है।

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यह आवेशित कण पृथ्वी के चुंबकीय क्षेत्र से 'सौर्य वायु' के संपर्क में आने का परिणाम होते हैं, जो हमारे ग्रह से पीछे बढ़ जाते हैं। सौर्य वायु इलेक्ट्रॉन्स और प्रोटॉन्स की धारा को कहते हैं।