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उपचुनाव: यह मतदाता तय करेंगे प्रत्याशियों की जीत- हार, जानिये चुनाव के बाद क्या है दावा

Akhilesh Kumar Tripathi

Publish: Oct 21, 2019 18:01 PM | Updated: Oct 21, 2019 18:01 PM

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बीजेपी ने राष्ट्रवाद का नारा और धारा-370 को बनाया मुद्दा, वहीं विपक्ष ने महंगाई और बेरोजगारी को लेकर मांगे वोट

आजमगढ़. घोसी विधानसभा सीट उपचुनाव के लिए मतदान खत्म हो चुका है। 11 प्रत्याशियों की किस्मत ईवीएम में कैद हो चुकी है और वोटिंग खत्म होने के बाद अब किसके सिर जीत का सेहरा बंधेगा, उसे लेकर चर्चाओं का दौर शुरू हो चुका है। 2017 के विधानसभा चुनाव में यहां बीजेपी ने सात हजार के मामूली अंतर से चुनाव जीता था, ऐसे में सबसे ज्यादा चिंता बीजेपी प्रत्याशी को अपने वोट बैंक में सेंध लगने की है। 2017 में बीजेपी के साथ ओमप्रकाश राजभर थे, मगर इस बार ओमप्रकाश राजभर ने यहां अपना प्रत्याशी उतारा है, जो बीजेपी के लिये परेशानी का सबब बन सकता है।

ओमप्रकाश राजभर खुद की जीत से अधिक बीजेपी को हराने के लिए ताकत लगा रहे हैं। उन्होेंने इस सीट पर अपने करीबी नेबू लाल को मैदान में उतारा है। बीजेपी ने विजय कुमार राजभर पर दांव खेला है, मैदान में सुधाकर सिंह जैसा राजनीति का मझा हुआ खिलाड़ी भी है तो बसपा का मुस्लिम चेेहरा भी किसी से कम नहीं है। चुनाव में महंगाई, बेरोजगारी, कानून व्यवस्था का मुद्दा हावी रहा, लेकिन बीजेपी ने इसके काट के तौर पर राष्ट्रवाद का नारा और धारा-370 का इस्तेमाल किया, लोग प्रभावित भी दिखे लेकिन मुकाबला काफी करीबी नजर आ रहा है।

24 अक्टूबर को किसकी किस्मत चमकेगी यह कह पाना अभी मुश्किल है लेकिन यह तय है कि राजभर और चौहान जिसके साथ गए होंगे उसकी जीत पक्की है। अगर इन मतों में विखराब हुआ होगा तो पहली बार यहां जीत का सेहरा निर्दल के सिर भी बंध सकता है।

यहां जातिगत आधार पर हार जीत का आकलन करें तो बसपा ने मुस्लिम नेता अब्दुल कय्यूम को मैदान में उतार सपा के वोट बैंक माने जा रहे मुस्लिम मतदाताओं में सेंध लगाने का प्रयास किया है। यहां 40 हजार दलित व 20 हजार अन्य अनुसूचित जाति के मतदाता है। बसपा इन्हें अपना वोट बैंक मान रही है। उसे भरोसा है कि 50 प्रतिशत से अधिक मुस्लिम इनके साथ है। यहां 60 हजार मुस्लिम मतदाता है। ऐसे में अगर दावा सही तो बसपा के पास करीब 90 हजार वोट दिख रहा है। वैसे यहां नारा भी खूब लगा है कि पहले भाई फिर सपाई और बसपाई। इससे अब्दुल कय्यूम खुद को मजबूत मान रहे हैं और मतदान समाप्त होने के साथ ही खुद की जीत का दावा भी कर रहे है। वैसे कम्युनिस्ट पार्टी के शेख हिसामुद्दीन की भी मुसलमानों में गहरी पैठ है वह कहीं न कहीं कय्यूम की गणित बिगाड़ते भी दिख रहे हैं।


यहां सपा प्रत्याशी पूर्व विधायक सुधाकर सिंह का पर्चा खारिज हो गया था। वे निर्दल मैदान में है। सपा ने उनका समर्थन किया है और पूरी सपा उनके साथ खड़ी है। सपा यादव और मुस्लिम मतदाताओं को अपना वोट बैंक मान रही है। वहीं क्षत्रिय होने के कारण सुधाकर का दावा है कि सवर्णो ने उनके पक्ष में मतदान किया है। यहां यादव मतदाताओं की संख्या 40 हजार है जो पूरी ताकत से सपा के साथ खड़ा दिख रहा है। सवर्ण मतदाताओं की संख्या 41 हजार है। पूरे सवर्ण सपा के साथ जाये यह संभव नहीं है लेकिन यह माना जा रहा है कि 20 प्रतिशत तक सवर्णों को सुधाकर तोड़ने में सफल हुए है। इस तरह करीब 9 हजार सवर्ण वोट पर सपा का दावा है। वहीं सपा शत प्रतिशत मुस्लिम मतदाताओं पर अपना दावा कर रही है जो 60 हजार है। अगर वास्तव में सपा का गणित सही है तो इनके पास एक लाख से अधिक वोट होगा। वैसे सपा का गणित इसलिए बिगड़ रहा है क्योंकि सुधाकर के पास साइकिल का सिंबल नहीं है। जो कम पढ़े लिखे मतदाताओं को भ्रमित कर सकता है। भाजपा और बसपा इसे अपने लिए फायदेमंद मान रही है।


बात करें भाजपा की तो वर्ष 2017 में पार्टी ने यह सीट जीती थी। फागू चौहान के राज्यपाल बनने के बाद यह सीट खाली हुई है। भाजपा का दावा है कि 41 हजार सवर्ण उसके साथ खड़े है। फागू के राज्यपाल बनने के बाद चौहान जाति का विश्वास पार्टी के प्रति बढ़ा है और 35 हजार चौहान मतदाता पूरी तरह उसके साथ खड़े हैं। बीजेपी का प्रत्याशी राजभर जाति का है, इसलिए 45 हजार राजभर कहीं जाने वाले नहीं है। वे युवा विजय राजभर को अपना नेता मान चुके हैं। चार हजार कुर्मी, 15 हजार निषाद, 15 हजार भूमिहार भी उसी के पक्ष में मतदान किये है। अब अगर इनकी गणित सही होती है तो करीब इनके साथ सवा लाख मतदाता होंगे लेकिन बीजेपी की गणित खराब कर रहे है भासपा के नेंबू लाल। जिनका राजभर मतों पर दावा है। ओम प्रकाश राजभर की इस जाति के मतदाताओं में गहरी पैठ भी मानी जाती है। ऐसे में यदि नेंबू लाल मजबूती से लड़ गए तो भाजपा का सारा गणित फेल हो सकता है।


वैसे भी अगर इनकी गणित को समझा जाय तो लड़ाई काफी नजदीकी दिख रही है। तीनों ही दलोें का दावा एक-एक लाख के आसपास मतदाताओं पर है। इनकी रणनीति में थोड़ी सी चूक से सीट जा सकती है। यहां सर्वाधिक प्रतिष्ठा बीजेपी की दांव पर है कारण कि यहां उसका सीटिंग एमएलए था। सपा के पास तो बहाना है कि उसके प्रत्याशी के पास सिंबल नहीं था लेकिन बीजेपी के पास कोई बहाना भी नहीं दिख रहा। बहरहाल तीनों दल इसी गणित के आधार पर अपनी हार जीत का दावा कर रहे है। किसकी गणित में कितना दम है, यह 24 अक्टूबर को ही पता चल पाएगा। फिलहाल यहां मतदान समाप्त होने के बाद भी मतदाताओं का रूख समझ से बाहर है।