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पुरुषों ने दिखाई समझदारी, परिवार नियोजन में भी है उनकी भागीदारी

Ritesh Singh

Publish: Aug 18, 2019 21:11 PM | Updated: Aug 18, 2019 21:11 PM

Lucknow

नसबंदी को लेकर दूर कर रहे हैं भ्रांतियाँ

लखनऊ, हम दो और हमारे दो का यह स्लोगन हमें अपने और परिवार के प्रति एक जिम्मेदारी का एहसास कराते हैं। वर्तमान सरकार ने भी सीमित परिवार पर जोर दिया हैं। बच्चे उतने ही अच्छे जिनकी हो अच्छी परवरिश इसी को देखते और समझते हुए आज के समय में पुरुष नसबंदी पर जोर दिया जा रहा हैं बहुत से पुरुषों ने नसबंदी ख़ुशी ख़ुशी कराई और बहुतो ने सवाल भी खड़े किये जिनके जवाब सेंटर ऑफ़ एक्सीलेंस, किंग जार्ज मेडिकल यूनिवर्सिटी,यूरोलोजी विभाग के एनएसवी के विशेषज्ञ डा.दसीला ने बहुत ही सरल तरीके से पुरुषों को समझाया।

परिवार नियोजन के विभिन्न साधनों में से एक साधन है पुरुष नसबंदी (एनएसवी) अभी तक इस साधन के प्रति पुरुष रुचि नहीं दिखाते थे और इसे अपने पौरुष से जोड़कर देखते थे किन्तु अब परिवार नियोजन में वह भी अपनी भूमिका महत्वपूर्ण मानते हुये नसबंदी कराने के लिए आगे आ रहे और समाज को संदेश दे रहे हैं। अमरीश, सत्यप्रकाश और अजय ऐसे नाम हैं जिन्होने अपनी ज़िम्मेदारी समझी और नसबंदी कराई । महानगर निवासी अमरीष (आयु 30 वर्ष) के 2 बच्चे हैं-- एक लड़का और एक लड़की । इन्हें पहले तो परिवार नियोजन के बारे में बात करना भी नहीं पसंद था क्योंकि इनके अनुसार यह नितांत व्यक्तिगत विषय है जिसके संबंध में किसी अन्य के साथ बातचीत नहीं करनी चाहिए । वह परिवार नियोजन के साधन अपनाना भी नहीं चाहते थे । इनकी पत्नी को दो बार गर्भधारण के बाद, गर्भपात के लिए दवा लेनी पड़ी और उनकी तबीयत खराब हो गयी ।

पत्नी को बीमार देख पति ने निभाई अपनी ज़िम्मेदारी

वह शहरी प्राथमिक स्वास्थ्य केंद्र पर दवा लेने आयीं जहाँ पर उन्हें आशा ने परिवार नियोजन के साधनो के बारे में बताया तो वे नसबंदी कराने के लिए तैयार हो गईं । इस बीच अमरीश भी अस्पताल आ गए । जब उनकी पत्नी की हीमोग्लोबिन की जांच की गयी तो वह 7 ग्राम से कम निकला । डॉक्टर ने नसबंदी करने से मना कर दिया। इसके बाद आशा ने अमरीश को अपनी नसबंदी कराने के लिए कहा। पहले तो अमरीश ने मना कर दिया लेकिन जब आशा ने बताया कि उनकी पत्नी के शरीर में खून की कमी है और उसे दो बार गर्भपात भी हो चुका है जिसके कारण शरीर कमजोर है, ऐसी स्थिति में यदि परिवार नियोजन का कोई साधन नहीं अपनायेंगें तो भविष्य में यह फिर से गर्भवती हो सकती है। बार-बार ऐसा होने पर उसकी जान भी जा सकती है । यह बात अमरीश को समझ में आ गयी और वह नसबंदी कराने के लिए तैयार हो गए । आज अमरीश बहुत खुश है और एक स्वस्थ जीवन जी रहे हैं ।

नसबंदी के बाद पति - पत्नी दोनों हैं खुश

ऐसी ही एक सच्ची कहानी है 28 वर्षीय सत्यप्रकाश की, जो कि पेशे से माली हैं और उनके 2 बच्चे हैं । दोनों बच्चों के बीच में लगभग 1.5 साल का अंतर है। इन दो बच्चों के अलावा एक बच्चे की मृत्यु भी हो चुकी है । वह एक बार अपनी पत्नी के साथ बच्चे को टीका लगवाने के लिए शहरी प्राथमिक स्वास्थ्य केंद्र पर लेकर आए । उनकी पत्नी बहुत ही परेशान थी क्योंकि वह कमजोर भी थी और उसे जल्दी-जल्दी गर्भ ठहरा था जिसके लिए उसने गर्भपात कराया था । आशा बहु किरण ने उन्हें पुरुष नसबंदी के साथ-साथ परिवार नियोजन के साधनों के बारे में बताते हुये समझाया कि उनकी पत्नी बहुत कमजोर है और इसलिए उसे अपनी नसबंदी करवा लेनी चाहिए । पहले तो उसने मना कर दिया किन्तु बाद में उसने कहा कि वह अपने मालिक से बात करेगा, फिर जो सुझाव वह देंगे, उस पर अमल करेगा । उनके मालिक द्वारा पुरुष नसबंदी का सुझाव देने पर उन्होने अपनी नसबंदी करवाई ।

सत्यप्रकाश ने बताया कि नसबंदी कराने के तीन दिन बाद ही उसने काम पर जाना शुरू कर दिया था । उसे शारीरिक रूप से कोई समस्या नहीं है। वह पूर्णतया स्वस्थ है । वैवाहिक जीवन का भी वह आनंद उठा रहा है । अजय की शादी को लगभग 20 साल हो गए हैं । अजय की पत्नी अंजलि बताती हैं वह पहले डिम्पा, कॉपर टी का उपयोग करती थीं । परिवार नियोजन का स्थायी साधन अपनाने के लिए खड़गापुर प्राथमिक स्वास्थ्य केंद्र(पीएचसी) गईं जहां पर महिला नसबंदी के साथ उन्हें पुरुष नसबंदी के बारे में भी बताया गया । उन्होने घर आकर यह बात अपने पति अजय को बतायी । अजय पीएचसी आकर डॉ. राहुल वर्धन से मिले जिन्होने एनएसवी के बारे में बताया कि एनएसवी महिला नसबंदी की अपेक्षा ज्यादा आसान होती है और नसबंदी के बाद लाभार्थी सामान्य जीवन व्यतीत करता है ।

नसबंदी को लेकर दूर कर रहे हैं भ्रांतियाँ

डॉ. वर्धन ने यह भी बताया कि सेंटर ऑफ़ एक्सीलेंस, किंग जार्ज मेडिकल यूनिवर्सिटी,यूरोलोजी विभाग के एनएसवी के विशेषज्ञ डा.दसीला द्वारा पुरुष नसबंदी की जाती है। अजय ने घर आकर स्वयं भी गूगल पर इस बारे में जानकारी हासिल की और अपनी नसबंदी कराने का निर्णय लिया । अजय को मुख्य चिकित्साधिकारी डॉ. नरेंद्र अग्रवाल द्वारा सम्मानित भी किया जा चुका है ।

सेंटर ऑफ एक्सिलेन्स फॉर एनएसवी के डॉ. दसीला ने बताया कि निरक्षरता, गरीबी, पुरुष प्रधान समाज, महिलाओं का कम पढ़ा लिखा होना, भ्रांतियाँ, परिवार के प्रति केवल महिला का उत्तरदायित्व होना व हमारा समाज यह कुछ ऐसे कारक है जिनके कारण एनएसवी का प्रतिशत हमारे यहाँ बहुत कम है । पुरुष नसबंदी को लेकर लोगों में भ्रांतिया हैं कि इसको कराने से पुरुषों में कमजोरी आ जाती है व नपुंसक हो जाते हैं, ऐसा कुछ भी नहीं है। यह प्रक्रिया पूरी तरह से सुरक्षित है। अब पुरुष, एनसवी को लेकर जागरूक हो रहे हैं लेकिन अभी हमें और प्रयास करने की जरूरत है ।