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सावन के आखिरी सोमवार को इस शिव मंदिर में उमड़ी भक्तों की भीड़, 2000 बर्ष पुराना है यह मन्दिर

Neeraj Patel

Publish: Aug 12, 2019 20:40 PM | Updated: Aug 12, 2019 20:40 PM

Lalitpur

- मनोकामना पूर्व मन्दिर के जल प्रपात से भी होती है शरीर की कई बीमारियां ठीक
- विश्व प्रसिद्ध अर्धनारीश्वर भगवान शिव की अद्वतीय त्रिमूर्ति प्रतिमा नहीं है भारत में कहीं भी
- आध्यात्मिकता के साथ-साथ ऐतिहासिक और पर्यटन मानचित्र में है विश्वपटल पर
- औरंगजेब भी भगवान का चमत्कार देख नतमस्तक होकर लौट गया था
- पुरातत्व विभाग के अधीन होने से नहीं हो पा रहा मन्दिर का विकास

ललितपुर. सावन के आखरी सोमवार पर जनपद ही नहीं बल्कि विश्व मानचित्र पटल पर अंकित इस शिव मंदिर में भक्तों की अपार भीड़ उमड़ी सावन के महीने में यहां पर भक्तों का ताता लगा रहता है। यह यह शिव मंदिर आस्था के केंद्र बिंदु के साथ साथ ऐतिहासिक एवं पर्यटन की दृष्टि से भी बहुत महत्वपूर्ण है। इतना ही नहीं यह शिव मंदिर विश्व पर्यटन मानचित्र पर भी अंकित है।

श्रद्धालुओं के अनुसार इस मंदिर की सबसे बड़ी खास बात यह है कि यहां पर आए हुए श्रद्धालुओं की सच्चे पवित्र ह्रदय से मांगी गई मनोकामनाएं पूर्व होती है। इतना ही नहीं मंदिर के नीचे से एक प्राकृतिक जलप्रपात से निकलता हुआ पानी अपने भक्तों के शारीरिक कष्टों को हरकर निरोगी शरीर देता है। लोग बताते है कि इस जलप्रपात का पानी पीने से यहां क्षेत्रवासियों के साथ-साथ दूर-दूर से आये हुए श्रद्धालुओं की कई शारीरिक बीमारियां अपने आप ठीक हो जाती हैं। जी हां हम बात कर रहे हैं जनपद की तहसील पाली के स्थानीय कस्बे से 5 किलोमीटर दूर विंध्याचल पर्वत श्रंखला की गोद में बसे आध्यात्मिक प्राकृतिक पर्यटन तीर्थ स्थल नीलकंठेश्वर धाम की। क्षेत्र की बड़ी आस्था का केंद्र बिंदु नीलकंठेश्वर धाम की महिमा निराली है।

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2000 वर्ष पुराना है मन्दिर

यह तीर्थ स्थल लगभग 2000 वर्ष पुराना बताया गया है इसका अपना एक विशेष महत्त्व है। यह शिव मंदिर चंदेल कालीन है इस मंदिर में भगवान शिव की जो त्रिमूर्ति प्रतिमा बनी हुई है वह पूरे भारतवर्ष में कहीं नहीं है। अपितु स्थानीय लोग बताते हैं कि यह प्रतिमा यहां पर अपने आप प्रकट हुई थी और इस का ऐतिहासिक महत्व इसलिए है कि इस प्रतिमा का चमत्कार देखकर मुगल शासक औरंगजेब जो मंदिर तोड़ने के लिए आया था यहां से नतमस्तक होकर गया था।

यहां के बुजुर्ग लोग बताते है कि यहां के मंदिर के बारे में ऐसा वर्णित कि जब औरंगजेब ने हिंदू आस्था मंदिरों को अपना निशाना बनाया और उन्हें तहस-नहस करने की ठानी। तब वह मंदिरों को तोड़ता हुआ इस नीलकंठेश्वर धाम पर भी आया और यहां चमत्कारिक शिव की प्रतिमा पर उसी खंडित करने के उद्देश्य तलवार से प्रहार किया और गोली चलाई। तब शिव की प्रतिमा से पहले दूध की धार निकली फिर गंगाजल की धारा निकली एवं ओम नमः शिवाय के साथ साथ शंख झालर घंटों की आवाजें आने लगी। तब यह चमत्कार देखकर औरंगजेब भगवान के आगे नतमस्तक होकर लौट गया।

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बरसात के समय में पानी से सराबोर रहती हैं यहां की सीढ़ियां

सड़क से मंदिर तक पहुंचने के लिए सीढ़ियां बनी हुई है जो बरसात के समय में पानी से सराबोर रहती हैं । सीढ़ियां चढ़ते समय ऐसा महसूस होता है कि जैसे मानो हम किसी पहाड़ी पर्यटन स्थल पर आ गए हो चारों तरफ विंध्याचल पहाड़ी के साथ साथ लगे हुए पेड़ पौधे मन को मोह लेते हैं । मंदिर के नीचे मंदिर पर चढ़ाने के लिए प्रसाद सहजता से उपलब्ध हो जाता है। मंदिर जंगल के रास्ते में पड़ता है इसीलिए यहां सुरक्षा की दृष्टि से प्रशासन द्वारा पुलिस चौकी बनाई गई है जिसमें 3 पुलिसकर्मी तैनात रहते हैं।

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झरने में नहाने से शरीर की चर्म रोग हो जाते दूर

श्रद्धालुओं की ऐसी आस्था है कि मंदिर के नीचे बने झरने में नहाने से शरीर की चर्म रोग दूर हो जाती है तो वहीं इस झरने का पानी पीने से शरीर के अंदर की कई बीमारियां भी ठीक हो जाती है। झरने का पानी पीने वालों को कभी पेट की बीमारियों से ग्रसित नहीं होना पड़ता यहां पूरे भारतवर्ष से हजारों की तादाद में श्रद्धालु आते हैं और अपने वाहनों में झरने का पानी भरकर ले जाते हैं जो एक गंगा जल की तरह काम करता है।