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चुनौतियों के बीच संघर्ष कर इस महिला ने किया अपने गांव को कुपोषण मुक्त, गांव का हर बच्चा हेल्दी

Karishma Lalwani

Publish: Sep 09, 2019 18:47 PM | Updated: Sep 10, 2019 14:44 PM

Lalitpur

- आशा कार्यकत्री प्रतिभा ने अपने गांव को किया कुपोषण मुक्त

- काम के साथ-साथ पूरी की पढ़ाई

- किशोरियों को माहवारी में साफ सफाई के लिए भी किया जागरूक

ललितपुर. लगन, मेहनत और पूरी ईमानदारी से काम किया जाए तो कोई भी मुश्किल राह न सिर्फ आसान हो सकती है बल्कि परिणाम भी सकारात्मक होते हैं। राष्ट्रीय स्वास्थ्य मिशन के तहत काम करने वाली प्रतिभा ने चुनौतियों के बीच संघर्ष कर पूरे गांव को अपनी मेहनत से कुपोषण मुक्त किया। न सिर्फ अति कुपोषण से मुक्त किया बल्कि परिवार नियोजन के बारे में भी लोगों को जागरूक किया।

जागरूकता की कमी को किया दूर

सफलता की ये कहानी है ललितपुर के जखौरा ब्लॉक के पटौरा कला गांव की रहने वालीं प्रतिभा की। प्रतिभा जिस गांव में कार्यभार संभालती हैं, वहां अब कोई भी बच्चा कुपोषित नहीं है। इस गांव में प्रतिभा की शादी 1993 में हुई थी। मार्च 1997 में वह स्वास्थ्य विभाग से जुड़ गईं। प्रतिभा बताती हैं कि जब वह स्वास्थ्य विभाग से जुड़ीं, तब तक उनकी दो बेटियां हो चुकी थीं। गांव में जागरूकता की बेहद कमी थी। गर्भवती महिलाएं प्रसव के लिए अस्पताल नहीं जाती थीं। गांव में बिजली नहीं थी, सुविधाएं नहीं थीं और अधिकतर महिलाओं का प्रसव घर पर ही होता था। उन्होंने इन परेशानियों के बारे में लोगों को जागरूक करना शुरू किया। हालांकि, पहले इसमें परेशानी तो बहुत आई। उनकी बातों पर अमल करना तो दूर लोग उनकी बात सुनते भी नहीं थे। नवजात बच्चे का वजन तक नहीं करने देते थे। कई बार लोग झिड़क तक देते थे लेकिन उन्होंने हार नहीं मानी। उन्होंने लोगों से यह झूठ कहना शुरू कर दिया कि टीकाकरण नहीं कराने पर राशन और सरकार की दूसरी योजनाओं का लाभ नहीं मिलेगा। यह सिर्फ लोगों को जागरूक करने के लिए था। इससे लोग उनकी बात मानने लगे।

नवजात को जन्म के तुरंत बाद मां का दूध पिलाना ज़रूरी होता है। लेकिन इस गांव के रीति रिवाजों के चलते बच्चों को मां का दूध पांच-पांच दिन बाद पिलाया जाता था। गांव वालों की ऐसी धारणा थी कि मां का पहला दूध बच्चे के लिए खराब होता है। प्रतिभा को गांव वालों की यह धारणा तोड़ने में वक्त लगा। धीरे-धीरे लोग उनकी बात मानने लगे। लोगों ने स्तनपान पर जोर दिया। प्रतिभा ने गांव की महिलाओं को बताया कि कैसे मां का दूध नियमित तौर पर पिलाने से बच्चा स्वस्थ रहता है।

काम के साथ-साथ की पढ़ाई

प्रतिभा 21 वर्ष की उम्र में इस कार्य से जुड़ीं। 23 की उम्र में उन्होंने किशोरियों को माहवारी के दौरान साफ सफाई रखने और सैनिटरी नैपकिन के उपयोग के बारे में जागरूक किया। प्रतिभा की जागरूकता की वजह से अब गांव की किशोरियां कपड़ा छोड़ अधिकतर सेनेटरी पैड का इस्तेमाल करती हैं। जब प्रतिभा आशा से जुड़ीं, तब वह दसवीं पास थीं। इस काम को करते हुए उन्होंने बीए तक अपनी पढ़ाई पूरी की। उन्होंने गांव की लड़कियों को भी पढ़ने के लिए प्रेरित किया। गांव की कई लड़कियां जिनका उनके कहने पर ही स्कूल में दाखिला कराया गया था, उनमें से कई बीए-एमए कर चुकी हैं।

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