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भगवान महावीर के सिद्धांतों को आचरण में उतारने से होती है मोक्ष की प्राप्ति

Ruchi Sharma

Publish: Nov 03, 2019 18:02 PM | Updated: Nov 03, 2019 18:02 PM

Lalitpur

मड़ावरा में दो दिवसीय राष्ट्रीय विद्वत संगोष्ठी का शुभारंभ
संगोष्ठी में देश के प्रमुख विद्वान सम्मिलित
श्रमण संस्कृति के दैदीप्यमान नक्षत्र हैं आचार्य श्री विशुद्ध सागर : मुनि श्री सुप्रभ सागर

ललितपुर. गणेश वर्णी नगर मड़ावरा में परम पूज्य मुनि श्री सुप्रभ सागर जी महाराज व मुनि प्रणतसागर महाराज के सान्निध्य में दिगम्बर जैन समाज और चातुर्मास समिति मड़ावरा के तत्वावधान में 'आचार्य श्री विशुद्ध सागर महाराज व्यक्तित्व एवं कृतित्व' दो दिवसीय राष्ट्रीय विद्वत संगोष्ठी का शुभारंभ हुआ। संगोष्ठी का आयोजन मड़ावरा के महावीर विद्या विहार के विशाल प्रांगण में किया गया। पश्चात मुनिद्वय के पाद प्रक्षालन संगोष्ठी में उपस्थित विद्वानों ने किया। विद्वानों ने जैन दर्शन पर विस्तृत चर्चा करते हुए बताया कि यदि जीवो का कोई धर्म उद्धार कर सकता है तो वह है जैन दर्शन, भगवान महावीर के सत्य अहिंसा जीओ और जीने दो के सिद्धांतों पर चलकर मनुष्य निश्चित रूप से मोक्ष को प्राप्त कर सकता है। भगवान महावीर के सिद्धांतों को आचरण में उतारने से मोक्ष की प्राप्ति होती है।


जिसके लिए मनुष्य को सम्यक दर्शन सम्यक ज्ञान और सम्यक चारित्र की आवश्यकता होती है। दुनिया भले ही समाप्त हो सकती है मगर मनुष्य का यदि सम्यक दर्शन जिंदा है तो वह निश्चित ही मोक्ष को प्राप्त होता है। अगर मनुष्य को भगवान का सम्यक दर्शन अर्थात सच्चा दर्शन प्राप्त है तो वह निश्चित ही सम्यक ज्ञान अर्थात सच्चे ज्ञान की तरफ अपने आप ही मुड़ जाता है और इन दोनों की प्राप्त होती है उसका चरित्र सम्यक चारित्र बन जाता है। वह सभी को एक ही नजर से देखता है। सम्यक दर्शन सम्यक ज्ञान और सम्यक चरित्र की प्राप्त होते ही मनुष्य के अंदर काम क्रोध लोभ मोह माया इत्यादि अपने आप ही समाप्त हो जाते हैं और वह रत्नत्रय धारण कर लेता है। क्योकि मनुष्य के जीवन में सम्यक म्यक ज्ञान और सम्यक चारित्र की आवश्यकता होती है।

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