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ओयल में स्थित मेढक मंदिर के प्रति लोगों में रहती है अपार आस्था

Karishma Lalwani

Publish: Aug 07, 2019 13:32 PM | Updated: Aug 07, 2019 13:47 PM

Lakhimpur Kheri

- मेढक मंदिर शिव भक्तों के लिए आकर्षण का केंद्र

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लखीमपुर खीरी. खीरी का ओयल का मेढक मंदिर शिव भक्तों के लिए आकर्षण का केंद्र बना रहता है। सावन के माह में यहां दूर-दराज से लोग पूजा-अर्चना करने के लिए आते हैं। इस मंदिर को लेकर मान्यता है कि यहां जलाभिषेक करने से लोगों की सभी मनोकामनाएं पूरी होती हैं।

बता दें कि मुख्यालय से 13 किमी दूरी पर स्थित ओयल नगर मेढक मंदिर के लिए मशहूर है। यहां साल भर भक्त भगवान भोले नाथ की पूजा के लिए आते हैं। करीब 400-450 वर्ष पूर्व ओयल स्टेट के शासक अनिरुद्ध सिंह ने इस मंदिर का निर्माण करवाया था। सोलहवी शताब्दी में ओयल राज्य पर शक्तिशाली गोसाई वंश के राजाओं का राज था। ये लोग झगड़ालू तथा गोरिल्ला युद्ध करने में माहिर थे। इस वजह से क्षेत्र में कोई भी इनसे लोहा लेने में कतराता था। लेकिन ओयल स्टेट के शूरवीर राजा अनिरुद्ध सिंह ने न केवल अदम्य साहस से गोसाई वंश से युद्ध किया बल्कि उन्हें पराजित कर उनके खजाने को अपने अधीन कर लिया।

राजा अनिरुद्ध सिंह शूरवीर के साथ-साथ धर्म परायण भी थे। उन्होंने जीते गए धन का प्रयोग एशोआराम की बजाए धर्म कार्य में करने का फैसला लिया। विद्वानों एवं धर्म के जानकारों से सलाह मशविरा करने के बाद इस धन सम्पदा से एक भव्य शिवालय का निर्माण कराना तय हुआ। शिवलिंग पवित्र नर्मदा नदी से लाया गया। इसलिए इस मंदिर में स्थापित शिवलिंग को नर्वदेश्वर महादेव भी कहा जाता है। मंदिर का निर्माण मांड्यूक तंत्र के आधार पर होना था। लिहाजा मंदिर को एक विशाल मेढक का निर्माण कर उसकी पीठ पर स्थापित किया गया। मंदिर का गर्भ गृह कमल की पंखुडियों वाली वास्तु कला पर आधारित है। मंदिर के चारों ओर विशाल सीढिय़ों से सुसज्जित दिव्य चबूतरे हैं। मंदिर के अंदर भगवान गणेश तथा मां पार्वती की भी प्रतिमाएं है। शिवलिंग के साथ स्थापित मूल प्रतिमा कुछ वर्ष पूर्व चोरी हो गयी है। दीवारों पर संदेश व ईश्वरी सत्ता को प्रदर्शित करती बेहतरीन मूर्तिकला उकेरी गई। कुल मिलाकर इस मंदिर की सुंदरता और अलौकिकता सहज ही लोगों को अपनी ओर आकर्षित करती है।

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यहां खड़ी अवस्था में है नंदी की प्रतिमा

मंदिर की एक खासियत यह भी है कि यहां स्थापित नंदी की प्रतिमा खड़ी अवस्था में स्थापित की गई हैं। अधिकतर अन्य शिव मंदिरों में नंदी बैठी अवस्था में होती है। हालांकि, इस विपरीत प्रथा के पीछे का रहस्य आजतक कोई न जान पाया।

मेढक के मुंह से निकल कर कुंड में गिरता है अभिषेक किया दूध व जल

इस मंदिर में एक और अनोखा आकर्षण है। जमीन से करीब बीस फिट ऊंची मंदिर कक्ष स्थापित है। लोग ऊंची-ऊंची पैकरिया चढ़कर मंदिर के माध्य भाग में पहुंचते हैं। फिर करीब 20-25 पैकरिया चढ़कर मंदिर कक्ष तक जाते हैं। कक्ष के सामने ही एक कुआं स्थापित है। यहां से पूजन के लिए जल लिया जाता है। आने वाले भक्त बीस फिट ऊपर शिवलिंग पर अभिषेक के लिए जो जल या दूध चढ़ाते हैं वह सीधा जमीन पर स्थापित मेढक के मुख द्वार से निकलकर सामने स्थित कुंड में गिरता है। वहीं, मंदिर में स्थापित शिवलिंग दिन में तीन बार अपना रंग बदलता है।