स्लो इंटरनेट स्पीड होने पर आपको पत्रिका लाइट में शिफ्ट कर दिया गया है ।
नॉर्मल साइट पर जाने के लिए क्लिक करें ।

मिट्टी के दीपक खुशियां लाएंगे अपार

Hemant Kumar Joshi

Publish: Oct 19, 2019 11:14 AM | Updated: Oct 19, 2019 11:14 AM

Kuchaman City

कुचामनसिटी.

दीपावली पर धन लक्ष्मी को प्रसन्न करने के लिए मिट्टी के दीपक बनाने वाले कुम्हारों के चाक ने गति पकड़ी ली है। उनको उम्मीद है कि इस बार लोग परंपरागत मिट्टी के दीपक से ही दीवाली मनाएंगे और उन्हें अपार खुशियां मिलेंगी।

मिट्टी के दीपक की बढ़ती मांग को देखते हुए कुम्हारों की मोहल्ले में रात-दिन चाक का पहिया रफ्तार पकड़े हुए है। कुम्हारों का कहना है कि पिछले एक-दो वर्ष से मिट्टी के दीपकों की मांग बढ़ी है। कुम्हारों ने बताया कि एक समय था कि कुचामन शहर में दूर-दराज के लोग दीपक खरीदने आते थे, लेकिन विगत वर्षों से चाइनीज बाजार ने कमर तोड़ दी थी। लेकिन इस बार ऐसा लगा है जैसे लोग अपने परंपरागत की ओर उन्मुख हो गए हैं। कुम्हारों ने बताया कि मिट्टी के दीपक से दीवाली जलाने से घरों में खुशियां मनमाफिक मिलती है। दीपावली का त्यौहार इसी दीपक के लिए जाना जाता है।
दीपावली पर धन लक्ष्मी को प्रसन्न करने के लिए मिट्टी के दीपक बनाने वाले कुम्हारों को इस बार अच्छी बिक्री होने की उम्मीद है। शहर में स्थित कुम्हारों की मोहल्ले में उनके परिवार मिट्टी का सामान तैयार करने में व्यस्त हैं। कुम्हारों के घरों में मिट्टी के दीपक बनाने के लिए माता-पिता के साथ उनके बच्चे भी हाथ बंटा रहे हैं। कोई मिट्टी गूंथने में लगा है तो किसी के हाथ चाक पर मिट्टी के दीपकों को आकार दे रहे हैं। महिलाएं भी आवा जलाने व पके हुए बर्तनों को व्यवस्थित रखने का जिम्मेदारी बखूबी संभाल रही है। दीपावली पर्व पर धन लक्ष्मी को प्रसन्न करने के लिए मिट्टी के दीपक जलाना भारतीय संस्कृति और परम्परा रही है। मिट्टी से निर्मित चार, छह, बारह एवं चौबीस दीपों वाली मिट्टी की ग्वालिन की पूजा की जाती है। मिट्टी की छोटी मटकियों में धान की खीलें भरकर उनकी पूजा होती है।

मिट्टी गढऩे वालों पर मेहरबान नहीं हैं धन लक्ष्मी
भले ही कुम्हारों के हाथों से बने दीपक धन की देवी लक्ष्मी को प्रसन्न करने के लिए जलाए जाते हो, लेकिन मिट्टी गढकऱ उसे आकार देने वालों पर शायद धन लक्ष्मी मेहरबान नहीं है। जिसके चलते अनेक परिवार अपने परंपरागत धंधे से विमुख होते जा रहे हैं। दीपावली पर्व पर मिट्टी का सामान तैयार करना उनके लिए सीजनेबल धंधा बनकर रह गया है। हालात यह है कि यदि वे दूसरा धंधा नहीं करेंगे तो दो जून की रोटी जुटा पाना कठिन हो जाएगा।
मिट्टी के बर्तनों के कारोबार से जुड़े कुम्हारों का कहना है कि दीपावली व गर्मी के सीजन में मिट्टी से निर्मित बर्तनों की मांग जरूर बढ़ जाती है। लेकिन बाद के दिनों में वे मजदूरी करके ही परिवार का पेट पालते हैं। कुम्हारों ने बताया कि दूर से मिट्टी लाना, महंगी लकड़ी खरीदकर दीपक पकाने में जो खर्च आता है, उसके सापेक्ष आमदनी लगातार घटती जा रही है। वहीं दूसरी ओर बाजारों में इलेक्ट्रानिक्स झालरों की चमक-दमक के बीच मिट्टी के दीपक की रोशनी धीमी पड़ती जा रही है। जिसके चलते लोग दीपकों का उपयोग महज पूजन के लिए ही करने लगे हैं।