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चंबल तट पर नंद ग्राम में विराजे देश दुनिया के प्रथम पीठ भगवान मथुरा धीश,आज भी उमड़ती हैं आस्था

Suraksha Rajora

Publish: Aug 23, 2019 22:53 PM | Updated: Aug 23, 2019 22:53 PM

Kota

Janmashtami Special 1737 में बूंदी से कोटा आए थे मथुराधीश-द्वारकाप्रसाद ने दी थी ठाकुरजी के लिए अपनी हवेली...

 

 

कोटा. चर्मण्यवती के आंचल में बसा कोटा देशभर में ख्यात है। कोई इसे चंबल की नगरी के नाम से जानता है तो कोई शिक्षा नगरी के नाम से। उद्योग नगरी और राजस्थान के कानपुर के नाम से भी शहर की पहचान रही है। जब बात कृष्ण जन्माष्टमी की हो रही है तो परकोटे के भीतर बसे कोटा को नंदग्राम के नाम से जाना जाता है। अगर कोटा को बड़े मथुराधीशजी की नगरी भी कहें तो अतिश्योक्ति नहीं होगी।


पाटनपोल नंदग्राम क्षेत्र में मथुराधीश जी विराजमान है। कहानी जरा लंबी है, लेकिन कहा जाता है कि मथुरा के गोकुल क्षेत्र के ग्राम करनावल में सूर्यास्त के समय फाल्गुन शुक्ल एकादशी के दिन श्रीमद् वल्लभाचार्य के समक्ष मथुराघीशजी विग्रह रूप में प्रकट हुए। इतिहासकारों के अनुसार मथुराधीशजी वर्षोंं तक छोटी काशी बूंदी में विराजमान रहे। शहर का भाग्य जागा तो

सन 1737 में मथुराधीश जी कोटा आए
द्वारकाप्रसाद ने ठाकुरजी के लिए दे दी हवेली मंदिर ट्रस्ट के कोषाध्यक्ष चेतन सेठ बताते हैं कि कोटा में मथुराधीश के प्रति लोगों की श्रद्धा इतनी अपार थी कि रियासत के तत्कालीन मंत्री द्वारकाप्रसाद भटनागर ने पाटनपोल स्थित अपनी हवेली मथुराधीश जी को पधराने के लिए भेंट कर दी, यहां ठाकुरजी को विराजमान किया गया। बाद में कोटा के तत्कालीन महाराव दुर्जनसाल ने कोटा का नाम नंदग्राम रखा। इसके साथ ही कोटा की छवि कृष्ण भक्ति के रूप में प्रगाढ़ हो गई। तब से अब तक वल्लभ कुल की मर्यादाओं के अनुसार मंदिर में सेवा हो रही है।

फिर मनोरथ के लिए बृज चले गए मथुराधीश

इसी दौरान 1953 में बड़े मथुराधीश जी को एक मनोरथ के लिए बृज ले जाकर पधराया गया, लेकिन बाद में तत्कालीन आचार्य गोस्वामी रणछोड़ाचार्य जी प्रथमेश मथुराधीश जी को करीब पांच दशक पहले 1975 में कोटा ले आए। तब से पाटनपोल स्थित उसी भटनागरजी की हवेली में ठाकुरजी विराजमान हैं। इस मौके पर आचार्य प्रथमेश के सान्निध्य में किशोरपुरा स्थित छप्पन भोग स्थल पर भव्य आयोजन किए गए। क्षेत्र के बुजुर्ग बताते हैं कि उस समय के माहौल की शोभा देखते ही बनती थी। चहुंओर भक्ति का सागर हिलौरें मार रहा था। इसके बाद छप्पन भोग स्थल पर समय-समय पर मनोरथ व उत्सव होते रहे।

मनमोहक है छवि

मंदिर में जो भी श्रद्धालु एक बार दर्शन को आ जाए तो बार-बार आने को मन करता है। ठाकुरजी की मनमोहक छवि के दर्शन कर मन आनंदित हो उठता है। बुजुर्ग गोविंद भाटिया बताते हैं कि ठाकुरजी की महिमा न्यारी है। भाटिया का यहां जन्माष्टमी पर होने वाले आयोजन में विशेष योगदान रहता है। अर्चना व डॉ.पुरुषोत्तम शृंगी बताते हैं कि वह वर्षों से मंदिर में दर्शन को आते हैं। यहां की महिमा को शब्दों में कह पाना मुश्किल है।

वल्लभकुल सम्प्रदाय की प्रथम पीठ महाराव दुर्जनसाल हाड़ा बूंदी से लेकर आए। मथुराधीश जी की प्रतिमा भगवान श्रीकृष्ण के वल्लभमय सप्त स्वरूपों में से प्रथमेश है। इसी कारण कोटा के इस मथुराधीश मंदिर को वल्लभसम्प्रदाय की प्रथम पीठ मानी जाती है और और वल्लभकुल सम्प्रदाय के अनुयायियों के लिए महत्वपूर्ण व प्रथम तीर्थ है।

ऐसे आए कोटा

इतिहासविद फिरोज अहमद के अनुसार मथुराधीश जी का प्राकट्य गोकुल के पास कर्णावल गांव में माना जाता है। मथुराधीश जी के इस विग्रह को वल्लभाचार्य ने अपने शिष्य पदमनाथ के पुत्र को दे दिया। उन्होंने यह अपने बड़े पुत्र गिरधर को सौंप दी, जो इसे पूजते रहे। 1669 में इस प्रतिमा को बादशाह औरंगजेब के अत्याचारों को बचाने के लिए बूंदी लाया गया।

बूंदी के तत्कालिक शासक राव राजा भाव सिंह इसे बूंदी लेकर आए। बाद में कोटा राज्य के शासक महाराव दुर्जनशाल1744 ईस्वी में मथुराधीशजी को कोटा ले आए। प्रतिमा को कोटा केदीवान राय द्वारका दास की हवेली में पदराया गया। वल्लभकुलसम्प्रदाय के मतानुसार सेवा होती है।