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72 बरस पहले कोटा के पाटनपोल से शुरू हुई थी जुलूस की परम्परा

Rajesh Tripathi

Publish: Sep 11, 2019 22:54 PM | Updated: Sep 11, 2019 22:54 PM

Kota

1948 का वो साल कोटा शहर कभी नहीं भूलेगा जब पहली बार गाजे-बाजे के साथ यहां सड़कों पर जुलूस निकाला गया।

अनंत चतुर्दशी महोत्सव का आज जो विशाल रूप देखने को मिलता है, वह शुरुआत में ऐसा नहीं था। उस वक्त घर और मंदिरों तक गणेश उत्सव सीमित रह जाता था। न शोभायात्राएं निकलती, न अखाड़ा-प्रदर्शन, लेकिन 1948 का वो साल कोटा शहर कभी नहीं भूलेगा जब पहली बार गाजे-बाजे के साथ यहां सड़कों पर जुलूस निकाला गया। आइए आपको ले चलते हैं गणेशोत्सव के विराट स्वरूप में तब्दील होने महान यात्रा पर, जिसकी शुरुआत 72 साल पहले पाटनपोल निवासी डॉ, राजकुमार ने की। कोटा का शायद ही कोई मुहल्ला होगा, जहां आपको पिछले दस दिनों से गणेश प्रतिमा का पूजन होता ना दिख रहा हो। अब यह आयोजन इतना भव्य हो गया है कि देश के दूसरे हिस्सों से भी लोग इसे देखने और उल्लास के रंग में रंगने के लिए कोटा आते हैं, लेकिन इस स्वरूप को विराट बनने में 72 साल लग गए। कोटा में गणेशोत्सव के सार्वजनिक महोत्सव की नींव 1948 में पाटपनोल निवासी डा. रामकुमार ने रखी। वे फूल बिहारी जी मंदिर के सामने अपनी क्लीनिक पर ही गणपति स्थापना करते थे। यहां दस दिन तक भजन-कीर्तन व आरती आयोजन होते।

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3 फीट ऊंची होती थी मिट्टी की प्रतिमा
अनंत चतुर्दशी पर प्रतिमा को ठेले में रखकर रामपुरा स्थित छोटी समाध ले जाते। वह अपनी विंटेज कार में प्रतिमा को रखकर टिपटा सरस्वती विद्यापीठ के सामने लाते फिर यहां से शोभायात्रा शुरू होती। मुख्य प्रतिमा लेकर चल रही विंटेज कार के पीछे ठेले में गणपति की झांकी और आगे भाव-विभोर कीर्तन करते चलते लोग शोभ बढ़ाते। बेशक तब लोगों की संख्या भले ही हजारों में नहीं थी, पर अनंत चतुर्दशी के दिन लोग उन्हें देखने के लिए छतों पर इंतजार करते। कोटा को अनन्त उल्लास का तोहफा देने वाले डॉ. रामकुमार के बड़े बेटे डॉ शिवकुमार बताते हैं कि छावनी कोटड़ी क्षेत्र की कुछ झांकियां भी इसमें शुरू होती गई। धीरे-धीरे क्रम बढ़ता गया और अन्य प्रतिमाएं भी शामिल होती गईं। घंटाघर क्षेत्र के उस्ताद घांसी लाल के शागिर्द शोभायात्रा में अखाड़े को लेकर शामिल हो गए। ज्यों-ज्यों शोभायात्रा अपने मार्ग में बढ़ती जाती लोग इसमें जुड़ते जाते। शोभायात्रा रामपुरा स्थित छोटी समाध के घांट पर पहुंचती और यहां आरती के बाद प्रतिमा को विसर्जित कर देते। प्रसाद वितरित किया जाता।

कोटा को अनन्त उल्लास का तोहफा देने वाले डॉ. रामकुमार के बड़े बेटे डॉ शिवकुमार बताते हैं कि छावनी कोटड़ी क्षेत्र की कुछ झांकियां भी इसमें शुरू होती गई। धीरे-धीरे क्रम बढ़ता गया और अन्य प्रतिमाएं भी शामिल होती गईं।घंटाघर क्षेत्र के उस्ताद घांसी लाल के शागिर्द शोभायात्रा में अखाड़े को लेकर शामिल हो गए। ज्यों-ज्यों शोभायात्रा अपने मार्ग में बढ़ती जाती लोग इसमें जुड़ते जाते।


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शोभायात्रा रामपुरा स्थित छोटी समाध के घांट पर पहुंचती और यहां आरती के बाद प्रतिमा को विसर्जित कर देते। प्रसाद वितरित किया जाता। धीरे-धीरे शोभायात्रा वर्ष दर वर्ष विशाल रूप लेने लगी। बाद में डॉ रामकुमार सन्यासी हो गए और वृंदावन चले गए। वर्ष 1990 में बाबा गोपरनाथ भार्गव ने शोभायात्रा को भव्य बनाया। इसमें कोटा में अखाड़ों के जनक कहे जाने वाले उस्ताद चौथमल बरथूूनिया का भी उल्लेखनीय योगदान रहा। बरथूनियां को अखाड़ों के द्रोणाचार्य के नाम से भी जाना जाता है।