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कोटा बाढ़:पीछे छोड़ गई तबाही के निशाँ...धीमी पड़ी मदद की रफ्तार, सेवाभाव सिर्फ आश्रय स्थलों तक सिमटा

Suraksha Rajora

Publish: Sep 19, 2019 20:32 PM | Updated: Sep 19, 2019 20:32 PM

Kota

kota flood अब घर चलाने के लिए सामने आने लगी पैसों की तंगी, फेरी लगाने तक के नहीं बचे पैसे - पहचान के दस्तावेज तक पानी में बहे, मुआवजे के लिए पटवारी मांग रहे शिनाख्त का रिकॉर्ड

कोटा. हनुमानगढ़ी में करीब डेढ़ से दो सौ मकान चम्बल में उठे उफान के बाद मलबे में तब्दील होकर रह गए हैं। अनन्त चतुदर्शी के रोज बैराज के गेट खुले तो सबसे पहले चम्बल ने इसी बस्ती को अपनी चपेट में लिया। गनीमत रही कि ज्यादातर लोग या तो गणेश प्रतिमा विसर्जित करने किशोर सागर गए थे या फिर वहां दुकानें लगाकर दो वक्त की रोटी का जुगाड़ करने। नतीजन, सभी की जान तो बच गई, लेकिन दोबारा घरों में दाखिल नहीं हो सके।


चौथी बार पूरे तबाह हो गए

मलबे के इसी ढ़ेर में एक घर सब्जी विक्रेता सत्यनारायण प्रजापति का भी था। वह बताते हैं कि मकान बनाने के बाद से वे तीसरी बार त्रासदी का शिकार हुए हैं। इससे पहले 2006, 2013 और 2017 में भी उनका मकान ढ़ह चुका था पर कभी हिम्मत नहीं हारी। लेकिन इस मर्तबा पूरी तरह से तबाह हो चुके हैं। इस बार उन्हें घर से एक थैला उठाने तक की मोहलत नहीं मिली। नतीजतन, पूरी जमा पूजी, जेवर और पाई-पाई कर जोड़ा सारा सामान बह गया। हालात यह हैं कि फेरी लगाने के लिए मंडी से सब्जी खरीदने तक के पैसे नहीं बचे।


फिर से दस्तावेज कैसे बनेंगे

राजस्थान पत्रिका की टीम ने जब बाढ़ पीडि़तों से मुलाकात कर उनसे बात की तो पीडि़तों ने बताया कि बस्ती का दौरा करने आए पटवारी और कुछ अन्य अधिकारियों ने उनसे पहचान के दस्तावेज मांगे। लोगों ने बताया कि हमारा तो सबकुछ पानी में बह गया। अब ऐसे में कागज कहां से बनवा कर लाएं। वह पूरे वक्त यही पूछते रहे कि यह कागज कैसे और कहां से बनेंगे। क्या सरकार जब तक पीडि़तों के नाम और उनके हुए नुकसान का मुआवजा तय कर रही होगी, तब तक क्या यह कागज तैयार हो जाएंगे और यदि नहीं हुए तो क्या हमें इस तबाही की एवज में सरकारी मदद नहीं मिलेगी।
आश्रय स्थलों में भीड़

हरिजन बस्ती, खंडगावड़ी और नंदाजी की बाड़ी में जिंदगी पटरी पर आने लगी है, लेकिन हनुमानगढ़ी समेत उन सभी इलाकों में जहां लोगों के सिर से उनकी छत तक छिन गई, उनकी जिंदगी दूभर हो चुकी है। उसे पटरी पर आने में महीनों लगेंगे।

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नतीजतन, संत तुकाराम सदन जैसे आश्रय स्थलों में अब भी बाढ़ पीडि़तों की खासी भीड़ है। इन्हें अन्नपूर्णा वैन सुबह-शाम मुफ्त खाना तो खिला रही हैं, लेकिन पानी की खासी परेशानी झेलनी पड़ रही है। इसके साथ ही सबसे ज्यादा डर इस बात का है कि जब मदद भी थम जाएगी तो उन्हें दो वक्त की रोटी कहां से मिलेगी, क्योंकि उनका तो सबकुछ तबाह हो चुका है।