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ईको सेंसेटिव जोन के निर्धारण का मामला १० माह से है अटका

Surendra Kumar Chaturvedi

Publish: Sep 11, 2019 12:15 PM | Updated: Sep 11, 2019 12:15 PM

Karauli

करौली. कैलादेवी अभयारण्य क्षेत्र के ईको सेंसेटिव जोन निर्धारण का मामला १० माह से केन्द्रीय वन-पर्यावरण मंत्रालय में अटका पड़ा है। इससे इलाके की अर्थव्यवस्था, रोजगार और विकास बाधित है। विशेष तौर पर यहां का खनिज व्यवसाय प्रभावित है जिससे हजारों लोगों का रोजगार छिनने के साथ आर्थिक व्यवस्था चरमराने की
नौबत आई है।

करौली. कैलादेवी अभयारण्य क्षेत्र के ईको सेंसेटिव जोन निर्धारण का मामला १० माह से केन्द्रीय वन-पर्यावरण मंत्रालय में अटका पड़ा है। इससे इलाके की अर्थव्यवस्था, रोजगार और विकास बाधित है। विशेष तौर पर यहां का खनिज व्यवसाय प्रभावित है जिससे हजारों लोगों का रोजगार छिनने के साथ आर्थिक व्यवस्था चरमराने की नौबत आई है।


वर्तमान में राष्ट्रीय हरित प्राधिकरण (एनजीटी) के आदेश की अनुपालना में वन विभाग ने कैलादेवी अभयारण्य सीमा से १० किलोमीटर परिक्षेत्र में खनिज गतिविधियों पर रोक लगाई हुई है। इस कारण से इलाके में अधिकांश सैण्ड स्टोन, सिलिका सैण्ड की खदानें, बनास से बजरी की निकासी, क्रेशर आदि बंद हैं। कुछ संचालित भी हैं तो वे जल्दी बंद होने के कगार पर हैं। इसका कारणहै कि अभयारण्य सीमा के १० किमी. परिधि में संचालित खनिज गतिविधियों के लिए प्रदूषण बोर्ड द्वारा अप्रेल माह से पर्यावरण सम्मति देना बंद कर दिया है।

प्रत्येक लीज होल्डर को ३ वर्ष में प्रदूषण बोर्डसे इस सम्मति का नवीनीकरण कराना होता है। इसके बिना खनिज उत्पादन नहीं किया जा सकता। अभयारण्य क्षेत्र की १० किलोमीटर की परिधि में लगभग अलग-अलग किस्म की १२५ खनिज लीज दी हुई हैं। इनमें से कुछ तो पहले से बंद हैं और कुछ अब प्रदूषण बोर्ड की सम्मति नहीं मिलने से बंद होती जा रही हैं। भरतपुर में प्रदूषण मंडल में ५ हेक्टेयर क्षेत्र की लगभग २० पत्रावली लंबित चल रही है। ५ हेक्टेयर से अधिक एरिया की लगभग इतनी पत्रावली जयपुर मुख्यालय में बताई।
रोजी-रोटी का संकट और सरकार को चपत
करौली, कैलादेवी, सपोटरा, मण्डरायल इलाके में खनिज व्यवसाय लोगों के रोजगार और अर्थचक्र का प्रमुख आधार है। यूं तो अभयारण्य सीमा और उसके आसपास के इलाके में गैर-वानिकी गतिविधियां २००६ से प्रतिबंधित हैं। लेकिन इसको लेकर शुरू में सख्ती नहीं रही। पिछले कुछ वर्षोसे विशेष सख्ती होने के कारण यहां के खनिज व्यवसाय के चौपट होने के हालात बने हैं। इससे लोगों के लिए रोजी-रोटी का संकट आ खड़ा हुआ है। इसका कारण है कि क्षेत्र में खनिज उत्पादन से अर्थ चक्र जुड़ा है।

खनिज व्यवसायियों के अलावा, खनन मजदूर, खनिज परिवहन से जुड़े हजारों लोग इससे प्रभावित हो रहे हैं। सरकारी सूत्र बताते हैं कि इलाके में खनिज उत्पादन में चल रहे मंदी के दौर से राज्य सरकार को भी खनिज रॉयल्टी, जीएसटी सहित अन्य टैंक्सों से लगभग २० करोड़ रुपए प्रतिवर्ष के राजस्व का नुकसान हो रहा है।


प्रस्ताव के अनुमोदन से मिलेगी राहत
ऐसे हालातों के बीच अभयारण्य क्षेत्र को लेकर ईको सेंसेटिव जोन के निर्धारण की मांग प्रमुखता से उठाई जा रही है। राज्य सरकार ने इस दिशा में कार्रवाईकरते हुए अभयारण्य के ईको सेंसेटिव जोन निर्धारण का प्रस्ताव केन्द्र सरकार को नवम्बर २०१८ में
भेजा हुआ है। इस प्रस्ताव में अभयारण्य सीमा से लगभग एक किमी, की परिधि में ईको सेंसटिव जोन का निर्धारण किया गया है।

केन्द्र सरकार को इस प्रस्ताव का अनुमोदन करके ईको सेंसेटिव एरिया अधिसूचना जारी करनी है। ऐसा होने पर अभयारण्य सीमा से केवल एक किलोमीटर की परिधि में गैर-वानिकी गतिविधि बंद रहेंगी। अभी १० किमी. परिक्षेत्र में खनिज उत्पादन ठप है। खनिज व्यवसायी पप्पू पचौरी के अनुसार ऐसा होने पर सैण्ड स्टोन, सिलिका सैण्ड, तथा बजरी निकासी की १२५ लीजों का कामकाज बाधित होने की जो स्थिति बनी है उससे राहत मिल सकेगी।
करेंगे प्रयास
कैलादेवी अभयारण्य क्षेत्र का ईको सेंसेटिव जोन निर्धारण करने का मामला केन्द्र सरकार स्तर पर अटका होने तथा इससे हो रहे नुकसान की जानकारी पत्थर व्यवसायियों ने दी है। केन्द्रीय वन-पर्यावरण मंत्रालय में राज्य सरकार से भेजे गए प्रस्ताव के जल्द अनुमोदन कराने के प्रयास किएजाएंगे।