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शीशराम ने किया देश का 'शीशÓ ऊंचा

Surendra Kumar Chaturvedi

Publish: Aug 13, 2019 18:00 PM | Updated: Aug 13, 2019 18:00 PM

Karauli

शीशराम ने देश के लिए बलिदान देकर आंधियाखेड़ा गांव का शीश ऊंचा कर दिया। १५ अगस्त १९९९ को शहीद हुए शीशराम की सेना मुख्यालय से खबर आई तो पूरा गांव शोक की लहर में तो था ही लेकिन उनको अपने सपूत के बलिदान पर गर्व भी था। शहीद के पिता रामखिलाड़ी ने नम आंखों से बताया कि उसके बेटी के बलिदान पर उनको गर्वहै। मां हरपती देवी ने बताया कि बेटे को खोने का गम तो है लेकिन शहीद होने के बाद वह देश का सपूत हो गया।

गुढ़ाचंद्रजी. पूरा देश जब हर्षोल्लास के साथ स्वतंत्रता दिवस मना रहा था, तब गांव के लाल शीशराम गुर्जर कारगिल की पहाडिय़ों में दुश्मनों से लोहा लेते हुए भारतमाता के लिए अपना बलिदान दे दिया। शीशराम ने देश के लिए बलिदान देकर आंधियाखेड़ा गांव का शीश ऊंचा कर दिया। १५ अगस्त १९९९ को शहीद हुए शीशराम की सेना मुख्यालय से खबर आई तो पूरा गांव शोक की लहर में तो था ही लेकिन उनको अपने सपूत के बलिदान पर गर्व भी था। शहीद के पिता रामखिलाड़ी ने नम आंखों से बताया कि उसके बेटी के बलिदान पर उनको गर्वहै। मां हरपती देवी ने बताया कि बेटे को खोने का गम तो है लेकिन शहीद होने के बाद वह देश का सपूत हो गया।
शहीद की विरागंना कमोद देवी ने बताया कि विवाह के तीन माह बाद ही पति के शहीद होने की खबर मिली तो ऐसा लगा मानो सांसे थम गई। उन्होंने बताया कि कारगिल में युद्ध की रणभेरी गूंजने पर शीशराम भारत माता की खातिर नई नवेली दुल्हन सहित घर-परिवार को छोड़कर रवाना हो गए। उनकी शहादत को दो दशक बीत गए। फौज की वर्दी में दीवारों पर टंगी उनकी तस्वीरों को देखकर व उनके साथ बिताए कुछ पलों की यादें आज भी जिंदा है, जो दिल की पोटली में संजोकर रखी हैं। उन्ही यादों के सहारे तो लंबा अरसा कटा है।
पत्रिका की राशि से बनवाया शहीद स्मारक
शहीद के भाई धीरसिंह ने बताया कि राज्य व केन्द्र सरकार की ओर से शहीद पैकेज मिला था। इसके अलावा राजस्थान पत्रिका ने भी विपदा की घड़ी में साथ देते हुए ५० हजार रुपए की सहायता राशि का चैक दिया था। उस राशि से उन्होंने गांव में घर के समीप ही शहीद स्मारक बनवाया था। पत्रिका का यह सहयोग जीवनभर याद रहेगा।
स्मारक पर है पानी-बिजली का टोटा
शहीद शीशराम के स्मारक पर बिजली के अभाव में अंधेरा छाया रहता है। साथ ही पानी का भी इंतजाम नहीं होने से इसके आसपास लगे पौधे विकसित नहीं हो पाते हैं। हालाकि शहीद परिवार के नाम पर गांव तक सड़क, विद्यालय का नामकरण, गैस एजेन्सी आदि मिल चुके है।